Monday, 27 February 2012

जनता का स्वयंवर

आसिफ इकबाल
लोकतंत्र के जश्न की चुनावी धुन पर सभी मगन हैं। क्या छोटे, क्या बड़े सभी उत्साह से एक ही लाइन में बटन दबाने के लिए खड़े। वोटिंग के लिए उत्साह इतना कि लाइन की धक्का मुक्की से आपस में ही लड़े। इसके बाद पीछे से सुरक्षाबलों के डंडे भी झेलने पड़े। घर आने पर वहीं पुराने भाषण सुनने पड़े, क्या मिला तुम्हें वहां खड़े-खड़े? बर्बाद हो गए इस चक्कर में बड़े-बड़े। अब साफ करो बर्तन जो सुबह से हैं गंदे पड़े। अब वो नेता कहां रहे भाई? आजादी के बाद बापू जो सादगी, ईमानदारी, टोपी, चश्मा और डंडा देश के नेताओं को दे गए थे, तो सादगी देश के विकास में देखने को मिलती है और ईमानदारी स्विस बैंक में सेफ है। टोपी तो नेताओं ने जनता को पहना रखी है और चश्मे पर भ्रष्टाचार की कालिख पुत गई है। बचा डंडा, तो उसे आम आदमी की सेवा में लगा रखा है। कुछ नौजवान नेता अन्ना की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को चीटिंग मान इसकी खिलाफत कर रहे हैं। उनका कहना है कि जब देश को लूटने का उनका नंबर आया, तो अन्ना भ्रष्टाचार पर पाबंदी लगाने के लिए आंदोलन करने बैठ गए। भई मामला थोड़ा टेलीविजन टाइप का है। जैसे राखी सावंत ने टेलीविजन में स्वयंवर रचाकर अपने लिए दुनिया का सबसे सुंदर, सुशील, संस्कारी और धनी वर का चुनाव करके ये साबित किया था कि उन्हें दुनिया का सबसे योग्य वर मिल गया है। लेकिन कुछ ही दिनों बाद वहीं सुंदर, सुशील, संस्कारी और अमीर अचानक 'सुंदर से बंदर', 'सुशील से जलील', 'संस्कारी से व्याभिचारी' और 'अमीर से फकीर' हो गया। फिर किस्मत ने मारी लात, तो उछल पड़ी बारात। बात को अन्ना के आंदोलन की तरह लंबा न खींचते हुए मुद्दे पर आता हूं। दरअसल, यूपी में चुनावी बयार बह रही है। प्रदेश की स्थिति कुछ राखी सावंत के स्वयंवर की तरह हो गई है। यहां जनता बनी है राखी सावंत और सरकार बनी है भावी वर। जनता इस चुनावी स्वयंवर के जरिए अपने भावी पति का चुनाव हर तरह से ठोक-बजाकर कर रही है। सभी दलों ने अपने उम्मीदवार रूपी दागी दूल्हों को काले धन की तरह खोपचे में छिपा दिया है और नौजवान, सुंदर, सुशील, संस्कारी दूल्हों को इस स्वयंवर में जनता रूपी दुल्हन को अपने आगोश में लेने के लिए उतार दिया है। जनता को पूरी उम्मींद है कि भावी पति उसकी अच्छी तरह से देखभाल करेगा, उसका भविष्य सुधारेगा। खैर अभी तो स्वयंवर टेलीविजन के एपीसोड की तरह चल रहा है। कुछ दिन बाद जनता वोटमाला पहनाकर अपना दूल्हा चुन लेगी। कुछ दिनों, महीनों या सालों बाद जनता को पता चलेगा कि उसने जिस पति में दुनिया की सारी खूबी देखीं, वो तो उसकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा है। राखी सावंत ने कुछ ही दिनों में सगाई के बाद वर में बुराई देखकर रिश्ता तोड़ लिया था, लेकिन राखी रूपी जनता को अगले पांच साल तक इंसाफ करने का मौका नहीं मिलेगा। फिर कौन करेगा 'राखी का इंसाफ?' पांच साल तक तो उसे सरकार रूपी पति की मनमानी को अन्ना के मौन व्रत की तरह चुपचाप रहकर सहना पड़ेगा। बेचारी जनता तो राखी की तरह बेशर्म है नहीं, जो मीडिया भी उसकी बात रख सके। जनता अपनी वोटमाला उसी वर के गले में डाले,जो उसका उसी तरह ख्याल रख सके,जैसे किसी दल की सरकार होने पर इंसान से ज्यादा जानवरों (हाथियों) का रखा जाता है।



Saturday, 25 February 2012

किस्सा इडियट बॉक्स का


रात को पति की नींद अचानक खुल गई। ऐसा लगा कि कहीं कोई औरत रो रही है। डरते-डरते पति देव ने लाइट जलाई तो देखा कि पत्नी की आंखों से गंगा-जमना कि तरह दो धाराएं बह रही हैं। पति ने पत्नी के कुछ बोलने से पहले सुबह से लेकर शाम तक की अपनी गतिविधियों को स्कैन कर डाला कि कहीं उसने जाने-अंजाने में पत्नी को कुछ बोल तो नहीं दिया। आखिरकार जब पत्नी से रोने की वजह पूछी तो पत्नी की जवाब था कि फला चैनल पर आने वाले फला धारावाहिक की फला औरत का पति कई दिनों से लापता है। क्या वो वापस घर आ पाएगा? इनकों अपने से ज्यादा दूसरों की फिक्र है। भई ये हाल है हमारे देश में टीवी का। टीवी वालों को भी चैन नहीं है कि वो किसी को चैन से सोने दें। घर की शांति व्यवस्था को भंग करने में टीवी ने विश्व कीर्तिमान स्थापित कर रखा है।

 घर मे सुख शान्ति बनाए रखने के लिए एक सिस्टम होता है। पत्नी वित्तमंत्री है, सास रक्षामंत्री है, ससुर विदेशमंत्री और साली लोक सम्पर्क मंत्री होती है। अब सभी का सोचना ये होता है कि पति प्रधानमंत्री होता होगा, लेकिन बेचारा पति प्रधानमंत्री नहीं, जनता होता है। जिसकी घर में एक नहीं चलने वाली होती है। एक तो दिन भर गधे जैसा काम करे और रात में जैसे ही टीवी के सामने थोड़ा मनोरंजन करने के लिए बैठे तो पीछे से आवाज आती है कि सुनिए जरा फला चैनल लगाना, आज उसमें फला का बेटा, फला को लेकर भागने वाला है। लो फिर भैंस गई पानी में। पति महोदय को टीवी पर चल रहे मैच में देखना है कि लोगों को बेसब्री से अपने शतकों के शतक का प्रशाद भगवान सचिन कब देंगे, लेकिन अगर चैनल चेंज नहीं किया तो पता चला कि प्रशाद के चक्कर में घर में खाना ही नहीं मिला। कहने को तो हमारे देश को पुरुष प्रधान कहा जाता है, पर दुनिया में इसकी छवि महिला प्रदान देश की है।

देश को महिला प्रधान बनाने का पूरा श्रेय टीवी यानी इडियट बॉक्स को जाता है। जिसने सभी को इडियट बना रखा है। कौन कहता है कि हमारे देश की महिलाएं अबला हैं। आज टीवी में प्रसारित होने वाले धारावाहिकों में महिलाएं क्या नहीं कर रही हैं। सारे के सारे धारावाहिक महिला प्रधान होते हैं। घर के मर्द आराम फरमाते हैं और महिलाएं उनके दुश्मनों से पंगा लेकर पूरा बिजनेस संभालती हैं। मजाल है कि घर का मर्द उनके सामने कुछ बोल जाए। ये भी एक बहुत बड़ा कारण है मर्दों का सीरियल पसंद न करने का। कुछ महिलाएं तो ऐसी है, जिन्हें देखकर मरहूम अमरीश पुरी की आत्मा भी कांप जाती है। धारावाहिकों में कुछ महिलाएं तो ऐसी हैं, जिनसे पूरा गांव-शहर थर्राता है। दरअसल महिलाओं के टीवी से चिपकने के कई जायज कारण हैं। सास इसलिए टीवी से चिपकी रहती हैं कि बहु को कैसे काबू में किया जाए और बहु इसलिए कि सास को कैसे काबू में किया जाए। एक दूसरे को फंसाने के नए-नए कॉपीराइट आइडिए धारावाहिकों से ही कॉपी किए जाते हैं। पाकिस्तान में भारतीय धारावाहिकों के हिट होने में पता चला है कि वहां के मर्द और औरतें दोनों ही यहां के धारावाहिकों को पसंद करते हैं। क्योंकि वहां के आतंकी इन धारावाहिकों की खलनायिकाओं से खतरनाक आइडियों को आत्मसात कर रहे हैं। कुछ किरदारों को तो उन्होंने अपना आदर्श बना लिया है। धारावाहिकों का सबसे गहरा सदमा घर के मर्द को झेलना पड़ता है।

धारावाहिकों में किराए के कपड़े और ज्वैलरी पहनने वाली महिलाओं को देखकर पत्नी की डिमांड बढ़ जाती है। शादियों में भी महिलाओं में चर्चा का विषय यही होता है कि देखा फला सीरियल में उसने क्या किया, उसका क्या हुआ। धारावाहिक में अगर प्रेमिका अपने प्रेमी के साथ भागती है, तो यही महिलाएं वाह-वाह करती है, लेकिन अगर पड़ोस की कोई लड़की अपने प्रेमी संग फुर्र हो जाए तो उसके चाल चलन पर अंगुलियां उठने लगती हैं। भला है कि घर की महिलाएं ही सीरियल पसंद कर रही हैं, क्या होगा जब मर्द भी टीवी से चिपक जाएंगे?

Friday, 24 February 2012

हमें दुश्मन का पता है



आसिफ इकबाल
देश की राजधानी दिल्ली से जुड़े  एक शहर में लड़की की उसके नौकर समेत हत्या कर दी जाती है। केस खुला हुआ होता है, पर उस  केस को सुलझाने में हमारी पुलिस को कई सालों बाद सफलता मिलती है। दिल्ली में इजरायली दूतावास के पास कार में विस्फोट होता है। इसकी जांच करने के लिए इजरायल से विशेष जांच दल आता है। और हमारे देश की सुरक्षा एजेंसी उनकी फाइल पकड़ के खड़ी रहती हैं। जांच के नाम पर अमेरिकी कुत्ते भी भारत के महापुरुषों की समाधि में आकर टांग उठाकर मूत जाते हैं। और हमारे देश की सुरक्षा एजेंसी के काबिल सिपाही कुत्ते के मूत की जांच में जुट जाते हैं कि इनके कुत्ते क्या खाते हैं, जो हमसे ज्यादा अच्छी तरह से जानकारी जुटा लेते हैं। इनका बस चले तो ये विदेशी सुरक्षा एजेंसियों से ये कहने लगें कि इन कुत्तों के गले का पट्टा हमारे गले में क्यों नहीं डाल देते। हमारे गले में तो वैसे भी सत्ता का पट्टा डला होता है। आप के पास तो दुनिया की सत्ता का पट्टा है। आप तो कई देशों के गले में पट्टा डाले हुए हैं। किसी की मजाल जो आपके सामने भौंक जाए।

विदेशी जांच दल में आए एक अमेरिकी अधिकारी ने देसी सुरक्षा एजेंसी के अधिकारी से सवाल किया, तुम्हारे रहते हमें तुम्हारे देश में क्यों आना पड़ता है। देसी अधिकारी:, दरअसल हमारे पास और भी बहुत से काम हैं। हम आपकी तरह फ्री नहीं रहते हैं। अब यही देखिए, 9/11 के बाद से आपके लिए काम का टोटा हो गया है। न तो आपके यहां कोई बड़ी आतंकी घटना हुई और न ही कोई बड़ा घोटाला हुआ, जबकि हमारे पास तो इतना काम है कि इसे निपटाने के लिए आप जैसे लोगों को काम देना पड़ता है ताकि आपके भी बच्चे पलते रहें। हमारे देश के रहनुमा काफी दयालु स्वभाव के हैं। आपके राष्ट्रपति जी तो खुद आए थे नौकरी मांगने यहां। अब हमारे यहां नौकरी तो हैं नहीं, इसी प्रकार आपकी मदद कर देते हैं। यहां आपके लायक काम करने की पूरी गांरटी है। अब यहीं देखिए कि जहां आप खड़े हैं, पता नहीं कब यहां भी विस्फोट हो जाए। और आपकी जांच करने के लिए कोई दूसरा दल विदेश से रवाना कर दिया जाए। विदेशी जांच दल का अधिकारी छिटक के दूर खड़ा हो जाता है। देसी अधिकारी: अरे साहब डरिए नहीं, जिस जांच के लिए आप यहां तशरीफ लाए हैं, वो हमें पता है कि ये विस्फोट किसने करवाया है। हमारा सबसे बड़ा सहयोगी मीडिया है, जो विस्फोट के दस मिनट के अंदर पूरी दुनिया को ये बात बता देता है कि घटना में किसका हाथ है। फिर हमें बोलने की कोई जरूरत ही नहीं होती है। विदेशी अधिकारी:, सुना है आपकी सीआईडी बहुत तेजी से केस को सॉल्व कर देती है। देसी अधिकारी:, अरे आप भी लगता है मेरी बीवी की तरह टीवी के नशेड़ी हैं। आपके पास कोई काम नहीं है, तो दिन भर टीवी से चिपके रहते होगे। और इसी वजह से आपने टीवी वाली सीआईडी को देख लिया होगा। भला आप ही बताइए, एक घंटे में कहीं केस सॉल्व किया जाता है क्या? हम पूरी तरह से केस को स्टडी करने के बाद ही किसी नतीजे में पहुंचते हैं। अब समझ में आया कि लादेन को मारने में आप लोगों को इतना टाइम क्यों लगा। आपके पास भी तो जेम्स बांड था, तो पकड़ लेते दो घंटे में पिक्चर की तरह। ऐसे तो हमारे पास शक्तिमान, क्रिश और रॉ-वन भी हैं, जो पलक झपकते ही दुश्मनों को ढेर कर देते हैं। सबसे बड़ा हथियार साउथ के सुपर स्टार रजनीकांत हैं, जो असंभव को संभव करने के लिए जाने जाते हैं और अभी तक उनके इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं पड़ी। बात करते हैं आप भी। चलिए आप जांच करिए, हमें और भी बहुत से काम हैं, नेताजी का फोन आया है कि किसी नेता को पार्टी से निकाल दिया है और उन्हें शक है कि उसने अपने पद में रहकर बहुत माल कमाया है। हमारे देश में तो जांच का सबसे बड़ा विषय यही है भैया। विदेशी अधिकारी जाते हुए देसी अधिकारी का मुंह ताकता रह गया और अपनी कार्यप्रणाली की जांच करने लगा। जय हिंद!


Monday, 20 February 2012

गाड़ी डरा रही है



गाड़ी बुला रही है, सीटी बजा रही है। लेकिन बेचारा झम्मनलाल गाड़ी की सीटी सुनकर परेशान हो जाता है। सीटी की आवाज सुनकर किसी सस्पेंस फिल्म की तरह सोच में पड़ जाता है कि क्या वो अपने दोस्त की शादी में इंदौर पहुंच पाएगा। दरअसल, तीन महीने बाद इंदौर में उसके दोस्त की शादी है। पिछले हफ्ते झम्मन ने अखबार में खबर पढ़ी कि रेलवे ने किराया बढ़ाने का मन बना लिया है। रेलवे का तर्क है कि यात्रियों की सुरक्षा और बढ़ती रेल दुर्घटनाओं को देखते हुए यह कदम उठाना जरूरी हो गया है। अब घर के सामान की खरीददारी में अठन्नी-चवन्नी बचाने वाले झम्मन के ऊपर किराए का अतिरिक्त बोझ बढ़ जाने से गंतव्य तक पहुंचने में संकट खड़ा हो रहा है। झम्मन का तर्क है कि जिस मंत्रालय के मंत्री ने आईआईएम जैसे अति विशिष्ट संस्थान के छात्रों को मैनेजमेंट का पाठ पढ़ाया, उसका ही विभाग अपना मैनेजमेंट खुद क्यों नहीं बना पाया। आखिर उन्होंने अपने कार्यकाल में ऐसा क्या किया कि दूसरा मंत्री आते ही अचानक रेलवे ब्लेड लेकर यात्रियों की जेब काटने पर उतारू हो गया। अगर इनका बस चलता, तो पटना से दिल्ली, मुंबई, चेन्नई तक के लिए लोकल ट्रेन की व्यवस्था कर देते। रेल मंत्रालय को ये बात सुनिश्चित करनी चाहिए कि ट्रेन समय से स्टेशनों में पहुंचेंगी। क्योंकि रेलवे ट्रैक पर आत्महत्या करने वाला मरने के इंतजार में भूख से मर जाएगा, पर गाड़ी टाइम से नहीं आएगी। रेल मंत्रालय को ये भी सुनिश्चित करना चाहिए कि यात्रियों की सुविधाओं की कमी नहीं होगी, खाना अच्छी क्वालिटी का होगा, स्टेशनों में उचित दामों में सामान मिलेगा, वहां साफ-सफाई होगी, जेब कतरे जेल में आराम करेंगे और यात्रियों को बैठने के लिए सीट मिलेगी। क्योंकि लोगों की भीड़ को देखते हुए कुछ ट्रेनों का नाम गाय-भैंस एक्सप्रेस होना चाहिए। अगर यूपी की मुख्यमंत्री रेल मंत्री होतीं, तो गाड़ियों के नाम क्या होते इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। हो सकता है गरीब रथ एक्सप्रेस, हाथी रथ एक्सप्रेस बन जाती। लेकिन झम्मन को अभी तक एक बात समझ में नहीं आ रही है कि रेलवे अभी तक जो किराया यात्रियों से वसूलता था, वो किस बात का था। उसमें क्या ये सब सुविधाएं देने का वादा नहीं था। अब झम्मन को डर लग रहा है कि अगर किसी भी संगठन ने रेलवे द्वारा बढ़ाए जा रहे किराए का विरोध किया और किराया नहीं बढ़ा तो उसके जानमाल के खतरे की जिम्मेदारी कौन लेगा। फिर तो यात्रियों की सुरक्षा राम भरोसे हो जाएगी। अगर भविष्य में कभी रेल दुर्घटना होती है, तो रेल मंत्रालय ये कहकर अपना पल्ला झाड़कर एक तरफ खड़ा होकर कहेगा कि हमने तो पहले ही कहा था कि अपनी सुरक्षा के लिए अलग से दक्षिणा चढ़ानी होगी। आप जितने पैसे से टिकट खरीदते हैं, वो तो मंत्रियों की ही जेबें नहीं भर पाता है, यात्रियों की सुरक्षा कहां से हो। जो लोग किराया बढ़ाने की दलील दे रहे हैं, उनके लिए तो सरकार फ्री में एसी के टिकट मुहैया कराती है। लेकिन रेल में सबसे ज्यादा सफर झम्मनलाल जैसे लोग करते हैं, जिन्हें अपनी हिफाजत के लिए सरकार को अतिरिक्त धन देना होगा। वाह रे झम्मनलाल ...आसिफ इकबाल


Sunday, 19 February 2012

राष्ट्रीय शर्म



कितने शर्म की बात है कि दिल्ली में कोई पटाखा फोड़ गया। प्रधानमंत्री की तरफ से बयान आया कि कितनी शर्मनाक बात है। वैसे अपने देश में ऐसी कई घटनाएं हो जाती हैं, जो राष्ट्रीय शर्म का कारण बनती हैं। हमने अपने अंदर से  शर्मीला स्वभाव इस तरह से निकाल दिया है, जैसे मुलायम सिंह ने अमर सिंह को। देश में कुपोषण और भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, इस पर भी प्रधानमंत्री कहते हैं कि कितने शर्म की बात है। कितने भी बड़े आतंकवादी हमले हो जाए, बयान एक ही होता है, कितने शर्म की बात है। शर्म भी ये बात सुन-सुनकर बोर हो गई है कि जब लोगों को शर्म नहीं आती है, तो बार-बार उस पर आरोप लगाकर उसे बदनाम क्यों किया जा रहा है। शर्म ने भी कोर्ट में अर्जी दाखिल करने का मन बना लिया है कि हर घटना राष्ट्रीय शर्म की बात क्यों होती है। करता कोई और है और आरोप शर्म पर लगाए जाते हैं। मेरा सबसे ज्यादा नुकसान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ने किया है। मुझे दरकिनार करके इसका सहारा लेकर कुछ भी बोल और कर दिया जाता है। कर्नाटक की विधानसभा में मंत्री पोर्न फिल्म देखते हैं और आरोप शर्म पर मढ़ दिया जाता है। आज जो शर्म की जो बात की जा रही है, असल में वो अब रही कहां। किसी लड़की को कोई लड़का छेड़ता है, तो उसका कहना होता है कि शर्म नहीं आती। इसी तरह नेताओं को झूठे वादे करने में शर्म नहीं आती, बालिकाओं को अधनंगे कपड़े पहनने में शर्म नहीं आती, सरकार को जनता का धन अपनी दानवकद मूर्तियां लगवाने में शर्म नहीं आती, प्रशासन को बिगड़ती सामाजिक व्यवस्था देखकर शर्म  नहीं आती और पुलिस को बढ़ते अपराध देखकर शर्म नहीं आती। शर्म का तर्क है कि जब मैं किसी के साथ जुड़ी नहीं हूं, तो मुझे खामखा बदनाम क्यों किया जा रहा है। प्रधानमंत्री या किसी भी मंत्री को बोलने से पहले ये सोच लेना चाहिए कि यहां पर सभी ने ये मुहावरा आत्मसात कर रखा है, 'जिसने की शर्म, उसके फूटे कर्म'। मुझे तो लगता है कि मेरा नाम शर्म है, इसलिए मेरे कर्म ज्यादा फूटे हैं। जब सब बेशर्म हो गए हैं तो शर्म का क्या काम। मैं तो वैसे भी दुनिया से विलुप्त होती जा रही हूं। मेरे संरक्षण की किसी को भी फिक्र नहीं है। देश में टाइगर को बचाने की मुहिम चल रही है, कन्याओं को बचाने की मुहिम चल रही है और न जाने किसे-किसे बचाने की मुहिम चल रही है, लेकिन मुझे बचाने की किसी को भी फिक्र नहीं है। ये भी एक राष्ट्रीय शर्म की बात हो सकती है। देखा जाए तो देश से क्या पूरी दुनिया से शर्म पतली गली से निकल ली है। जहां आतंकियों को कहीं भी विस्फोट करने में शर्म नहीं है, तो एटमी हथियार का हव्वा खड़ा करके, किसी भी देश में कब्जा जमाने में अमेरिका को शर्म नहीं आती है। इतना सबकुछ ये दुनिया वाले करते हैं और फिर कहते हैं कि ये एक राष्ट्रीय शर्म की बात है। शुक्र है यही दुनिया के रखवाले ही मुझे इलेक्शन में वोटर की तरह याद कर लेते हैं। वैसे मेरी जगह बेशर्मी ने ले ली है। जहां देखों वहां आपको बेशर्मी खड़ी मिल जाएगी, चाहे वो गली हो, गांव हो, शहर हो, शादी हो, पार्टी हो, मनोरंजन हो, राजनीति हो, खेल हो, जेल हो या फिर किसी आइटम की सेल हो। अब तो मुझे ही अपना दुखड़ा रोते-रोते शर्म आ गई। शायद मेरी व्यथा सुनने के बाद किसी को शर्म आ जाए।

हम सब कुत्ते हैं



आसिफ इकबाल
अक्सर लोग आवेश में आकर अपने दुश्मनों को बद्दुआ दे देते हैं कि कुत्ते की मौत मरेगा। इसी तरह से कुछ मुहावरे भी कुत्तों के सम्मान को ठेस पहुंचाते हुए आम इंसानों द्वारा बनाए गए हैं। मसलन, कुत्ते की तरह क्यों भौंक रहा है, कुत्ते की नस्ल वगैरह, वगैरह...। भले ही किसी जमाने में कुत्ते को कुत्ते की नजर से देखा जाता हो, पर आज के दौर में कुत्ते ने देश में बढ़ते भ्रष्टाचार की तरह तेजी से तरक्की की है। इंसानों ने कुत्ते की आदतों को काफी हद तक आत्मसात करना शुरू कर दिया है। और हो भी क्यों न। आजकल कुत्ते अच्छा खा रहे हैं, बड़ी-बड़ी महंगी गाड़ियों में घूम रहे हैं। हसीन महिलाओं की गोद में खेलते कुत्ते जवान इंसानों के अरमानों पर पानी फेरते नजर आते हैं। बडेÞ-बड़े अफसरों के पास लोगों से मिलने का टाइम नहीं है, पर कुत्ते में अपने लाडले बच्चे का अक्स देखकर पूरा टाइम देते है। पूरी फैमिली इस कुत्ते के आगे कुत्ता बनी रहती है। धार्मिक ग्रंथों से ज्यादा लोग कुत्ता पालने के साहित्य में रुचि दिखा रहे हैं। लगता है यही कुत्ता इनका उद्धार करने वाला है। दरअसल, कुत्ता पालने के पीछे भी एक राज है। मालिक और कुत्ते की कहानी तो जगजाहिर है। मौजूदा परिवेश में कुत्ते की वफादारी से काफी सबक लिया जा रहा है। बॉस कुत्ता इसलिए पाल रहा है कि वो अपने नीचे के कर्मचारियों के नेचर के बारे में जान सके, उसकी वफादारी को पहचान सके। कर्मचारी इसलिए कुत्ता पाल रहा है कि वो अपने बॉस के प्रति किस तरह से वफादार बने, इसका पता लगा सके।
समय के साथ-साथ कुत्ते को भी अकल आई और उसने अपने नेचर में बदलाव किया। इंसानों पर कई सालों की रिसर्च के बाद उसने पाया कि किस तरह इनके घर में घुसा जा सकता है। कुत्ते ने इंसानों की संस्कृति को आत्मसात किया, अपनी नस्ल के कुत्तों के अलावा अपने मालिक के घर की तरफ आंख उठाने वाले पर भौंकना शुरू कर दिया। आखिर उसे भी तो अपनी वफादारी का सबूत मालिक को पेश करना है। ऐसे कुत्ते की ऊंची शान को देखते हुए, गली के कुत्तों को ईर्ष्या होना स्वाभाविक है। वो भी हर ऊंचे रसूखदार इंसान को देखकर भौंकने के बजाए पूंछ हिलाने लगे। शायद इन गली छाप कुत्तों को ये नहीं पता कि जो कुत्ता इतनी ठाठ-बाट से रह रहा है, वो कोई ऐसा-वैसा कुत्ता नहीं । उसको ऐशो-आराम विरासत में मिला है। उसके पूर्वज भी इस सुख को भोगते रहे हैं। आज भी उनकी नस्लों का ऐशो आराम की जिंदगी पर एकछत्र राज है। तुम ठहरे गली के कुत्ते, अगर अभी भी तुम्हें अकल नहीं आई, तो तुम्हारी नस्लें आगे भी गली के कुत्ते की तरह रहेंगी। अब गली का कुत्ता सोच में पड़ गया कि किस तरह से बदलाव लाया जाए, जो उसकी आने वाली नस्लें सुकून से ऐशो-आराम की जिंदगी जी सकें।