Saturday, 21 July 2012

क्रिकेट ही क्यों


क्रिकेट ही क्यों


आसिफ इकबाल
26 नवंबर 2008, मुंबई के ताज होटल पर आतंकियों का हमला और पाकिस्तान से हर तरह से •ाारत ने रिश्ते खत्म कर लिए, जिसमें से खेल •ाी शामिल है। जैसा कि अटकलें लगाई जा रही थीं, उसके अनुसार बीते सोमवार को बीसीसीआई ने घोषणा की कि पाकिस्तानी खिलाड़ी दिसंबर में तीन एकदिवसीय और दो टी-20 मैच खेलने के लिए •ाारत की सरजमीं पर कदम रखेंगे। क्रिकेट के शौकीन लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई कि दुनिया के सबसे रोमांचक मुकाबले को एक बार फिर उनकी आंखे देखेंगी। बीसीसीआई की घोषणा के साथ ही पूर्व क्रिकेटर सुनील गावस्कर का इस श्रृंखला को लेकर विरोध सामने आया। सुनील गावस्कर, जिनका क्रिकेट जगत में आला मर्तबा है, का कहना है कि जबतक मुंबई हमले का मामला हल नहीं हो जाता, तबतक पाकिस्तान को खेलने के लिए •ाारत नहीं बुलाना चाहिए। बेशक गावस्कर का बयान पूरी तरह से जायज है, पर सवाल ये उठता है कि एक क्रिकेटर ने क्रिकेट का विरोध क्यों किया?, जबकि आजतक •ाारत-पाक क्रिकेट संबंधों को लेकर किसी •ाी •ाारतीय या पाकिस्तानी खिलाड़ी ने नकारात्मक टिप्पणी नहीं की है। तो फिर ऐसे में गावस्कर का इस सीरीज का विरोध करना किस दिशा की ओर संकेत देता हैं। कहीं गावस्कर को सचिन, अजहर, सिद्ध्नू , कीर्ति आजाद खिलाड़ियों की तरह संसद •ावन तो नहीं दिख रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि गावस्कर ने •ाी मौके को •ाुनाते हुए, इस तरह का राजनीतिक बयान देकर राजनीति की दुनिया में दस्तक देनी चाही हो। गावस्कर ने कहा कि मुंबईकर होने के नाते मैं ये कहना चाहूंगा कि जब तक ताज हमले में पाकिस्तान कोई कार्रवाई नहीं करता, •ाारत को पाक के साथ क्रिकेट नहीं खेलना चाहिए। गावस्कर •ाारतीय से अचानक मुंबईकर कैसे हो गए। शायद गावस्कर को मुंबईकरों का आसरा चाहिए, क्योंकि हो सकता है •ाविष्य में उनको मुंबईकरों की जरूरत पड़ जाए। दरअसल सचिन तेंदुलकर के राज्यस•ाा सदस्य बनने के साथ ही खिलाड़ियों में राजनीति में उतरने की उत्सुकता बढ़ गई है। जो कुछ •ाी खिलाड़ियों में राजनीति को लेकर हिचकिचाहट थी वो खत्म हो रही है। संसद •ावन पर हमले के बाद •ाी पाकिस्तान कई बार •ाारत का दौरा कर चुका है। तब गावस्कर ने विरोध नहीं किया, लेकिन अब अचानक गावस्कर का विरोधी स्वर क्यों मुखर हो गया। नि:संदेह हमें पाकिस्तान से हर तरह के संबंध खत्म कर देने चाहिए। लेकिन अगर खेल में संबंध खत्म करने की बात आती है तो सिर्फ क्रिकेट और हॉकी को ही क्यों बलि का बकरा बनाया जाता है। बाकी खेल वैसे ही होते हैं। कुश्ती, कबड्डी, बॉक्सिंग, टेनिस व दूसरे खेलों पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जाता है। इनकी •ाी पाकिस्तानी टीमें •ाारत नहीं आनी चाहिए। टेनिस में •ाारत के महेश •ाूपति और पाकिस्तान के ऐसामुल हक की जोड़ी नहीं बननी चाहिए। दरअसल शुरू से ही दोनों देशों के लोगों ने कला, संस्कृति और खेल को राजनीति और दुश्मनी से अलग रखा है। जिस तरह से संगीत के क्षेत्र में •ाारत के लोगों ने पाकिस्तानी गायकों आतिफ असलम, राहत फतेह अली खान, नुसरत फतेह अली खान, मेहदी हसन, गुलाम अली को जैसे फनकारों को पलकों पर बिठाया है, ठीक उसी तरह जगजीत सिंह, किशोर कुमार, मोहम्मद रफी, बिस्मिल्लाह खान, लता मंगेशकर, देवानंद जैसे फनकारों को इज्जत दी। सचिन तेंदुलकर को पाकिस्तान में सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है। पाकिस्तान के पूर्व कप्तान वसीम अकरम पाकिस्तान में कम और •ाारत में ज्यादा नजर आते हैं, बल्कि वो तो कोलकाता नाइट राइडर्स के बॉलिंग कोच •ाी हैं। उनपर अंगुली क्यों नहीं उठाई जाती। बेशक पाकिस्तान हमारे लिए मुश्किल पैदा करता है, लेकिन दोनों सरहदों के पार एक आम इंसान रूहानी सुकून चाहता है, जो सिर्फ खेल और संगीत से उसको मिलता है। •ाारत-पाक क्रिकेट मैच का रोमांच दुनिया में सबसे जुदा होता है, जिसपर दुनिया के स•ाी देश अपनी नजर गड़ाए रहते हैं। •ाले ही पूर्व क्रिकेटर, सांसद कार्ति आजाद ने गावस्कर की हां में हां मिलाई हो, लेकिन सच तो ये है कि किसी •ाी क्रिकेट खिलाड़ी ने क•ाी •ाी क्रिकेट का विरोध नहीं किया, चाहे वो •ाारत-पाक के बीच क्रिकेट मुकाबला हो या किसी अन्य देश का। •ाारत को पाकिस्तान से हर तरह के रिश्ते खत्म कर लेने चाहिए, लेकिन इसमें सिर्फ क्रिकेट को ही न चुना जाए।

Wednesday, 11 July 2012

सम्पादकीय पर आमिर


सम्पादकीय पर आमिर


आसिफ इकबाल
आमिर खान। हिंदुस्तान के लिए कोई अनजाना नाम नहीं है। शायद ही कोई होगा, जो आमिर को न जानता हो। हिंदी फिल्मों के मिस्टर 'परफैक्शनिस्ट' अब अखबारों के सम्पादकीय पन्ने पर नजर आ रहे हैं। शायद ही कोई •ाारतीय इतिहास में अ•िानेता हो, जिसने अखबारों के सम्पादकीय पेज पर जगह बनाने में कामयाबी हासिल की हो। हमेशा मीडिया से दूरी बनाए रहने वाला ये सुपर स्टार अचानक मीडिया से कैसे जुड़ गया, इस राज को तो बखूबी आमिर के अलावा और कोई नहीं जानता। एक फिल्म करने के लिए 40 करोड़ का मेहनताना लेने वाला शख्स देश•ार के शहरों की खाक छानने लगा। आज आमिर के लग•ाग हर प्रतिष्ठित अखबार में कॉलम आना ये बताता है कि आमिर रुपहले पर्दे के कलाकार ही नहीं, वरन एक अच्छे लेखक •ाी बनते जा रहे हैं। स्टार प्लस के धारावाहिक सत्यमेव जयते से छोटे पर्दे पर कदम रखने के साथ ही आमिर को सराहना के साथ-साथ विरोध का •ाी सामना करना पड़ा। विरोध ऐसा कि प्रतिष्ठित मेडिकल संस्था आईएमए ने आमिर के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का मन बना लिया, लेकिन आमिर ने संस्था से माफी मांगने से इनकार कर दिया। सत्यमेव जयते के पहले एपीसोड से ही आमिर की आलोचना शुरु हो गई। आलोचकों का कहना था कि •ाले ही आमिर ने सत्यमेव जयते के स्लोगन को ले लिया हो, पर सच्चाई तो ये है कि आमिर कोई समाजसेवा नहीं कर रहे हैं। वो तो सिर्फ पैसे कमाने के लिए सत्यमेव जयते जैसे •ाावनात्मक स्लोगन का सहारा ले रहे हैं। बात •ाी सही हैं। आमिर ने समाजसेवा का ठेका थोड़ी ले रखा है। आमिर •ाी इस देश के आम नागरिकों में से एक हैं। समाजसेवा का काम तो नेताआों, अधिकारियों का होता है, जो देश की आजादी के बाद से जनता की किस तरह से सेवा कर रहे हैं, वो बखूबी दिखाई देता है। रही बात सत्यमेव जयते से पैसे कमाने की, तो सरकार को •ाी जनहित में कोई सूचना देने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ते हैं, जिनमें नेताओं और संबंधित अधिकारियों का कमीशन •ाी शामिल होता है। आमिर को अगर पैसा ही कमाना था, तो वो फिल्म निर्माण और एक्टिंग के अलावा विज्ञापन से करोड़ों की कमाई कर सकते हैं। एक वेबसाइट के अनुसार आमिर की वार्षिक आय 12 मिलियन डॉलर है। आमिर ने एक टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में खुलासा किया था कि सत्यमेव जयते की शूटिंग की वजह से इन्होंने बहुत से विज्ञापनों को छोड़ दिया, जिनसे उन्हें सत्यमेव जयते के निर्माण में लगने वाली रकम से कई गुना ज्यादा कमाई हो सकती थी। सवाल ये उठता है कि आमिर को अगर कमाई ही करनी थी, तो वो छोटे पर्दे पर इस तरह के धारावाहिक पर पैसा लगाने के बजाए, बिग बॉस, रोडीज, इमोशनल अत्याचार, सच का सामना या लोगों को रातोंरात करोड़पति बना देने वाले धारावाहिकों में निवेश कर सकते थे। वैसे •ाी दर्शकों और आलोचकों में इस तरह के धारावाहिकों पर आलोचना करने लायक कुछ नहीं मिलता है। लोगों की धड़कने बढ़ाने वाले और पैसे जिताने वाले एंकर्स की कोई आलोचना नहीं करता है। शायद ऐसे कार्यक्रम देश व संस्कृति को चुनौती नहीं देते हैं। सालाना15 मिलियन डॉलर कामने वाले शाहरुख, 13.5 मिलियन डॉलर कमाने वाले अक्षय कुमार, 6 मिलियन डॉलर कमाने वाले वाले सलमान खान और 3 मिलियन डॉलर कमाने वाले अमिता•ा बच्चन को ऐसा क्यों नहीं लगता है कि सत्यमेव जयते जैसे धारावाहिक बनाने पर अच्छी खासी रकम को खींचा जा सकता है। दरअसल किसी •ाी अ•िानेता के पास इतना वक्त नहीं है कि वो देश •ार में घूमकर अपना कीमती वक्त बर्बाद कर सके। •ाले ही आमिर की कुछ लोग आलोचना कर रहे हों, पर सच्चाई तो ये है कि देश का हर पीड़ित खासो-आम इंसान आमिर की प्रशंसा कर रहा है। आमिर खान ने आलोचकों की परवाह किए बगैर सत्यमेव जयते को जारी रखा है। सत्यमेव जयते को लेकर मीडिया ने आमिर का •ारपूर साथ दिया और आमिर •ाी अब हर हफ्ते अपने लेखों के जरिए वि•िान्न अखबारों के संपादकीय पन्ने पर नजर आ रहे हैं, जो ये बताता है कि सत्यमेव जयते के जरिए ही आमिर ने अखबारों के मुख्य पृष्ठ तक जगह बनाई।