Thursday, 21 February 2013

उसके हाथों में तकदीर किसकी थी


अगर  मेरेहाथों में उसकी तकदीर लिखी थी
तो  उसके  हाथों  में  तकदीर  किसकी  थी
मोहब्बत  से  भरे  दो  दिलों  को  जोड़  न  पाई
 उल्फत  से  बनी  वोह  ज़ंजीर  किसकी  थी

 मतलब समझ में आ रहा है हर एक बहाने का
तुम्हे  तो  दर  भी  नहीं  था  नफरत  -ए-ज़माने  का
उन बेमतलब खूबसूरत  लम्हों  की  तस्वीर  किसकी  थी

ज़रा ज़रा सी बात पर नाराज़ हो जाते थे
छोटी सी चोंट पर परेशां हो जाते थे
मेरे ज़ख्मों पर चलाई शमशीर किसकी थी

कहाँ ले जाऊं दिले नादाँ को
फूँक देना चाहता हूँ इस जहाँ को
बेवजह क्यूँ पाली पीर उसकी थी

कसमे वादे शीशे की तरह तोड़ देना
साथ चलते चलते रुख मोड़ लेना
'अरमान' कुछ ऐसी ही नजीर उसकी थी
                      अरमान आसिफ इकबाल





Thursday, 14 February 2013

इश्क के इम्तेहान से डरते हैं


इजहार-ए-मोहब्बत की हिम्मत चलो हम भी करते हैं
उस चौखट को देखें जहां हजारों दम निकलते हैं
जरा कमजोर हैं तालीम-ए-मोहब्बत में अरमान
बस यही सोचकर तो इश्क के इम्तेहान से डरते हैं

मन लगाकर पढ़ा है उसकी आंखों को
जेहन में रखा है उसकी बातों को
उसकी आदतों की भी नकल दिन रात करते हैं
बस यही सोचकर तो इश्क के इम्तेहान से डरते हैं

बस्ते में पड़ी रहती है हर पल की किताब
ढूंढते रहते हैं उसमें हर सवाल का जवाब
पन्नों के मुह से भी कहीं अल्फाज निकलते हैं
बस यही सोचकर तो इश्क के इम्तेहान से डरते हैं

इस मदरसे में उल्फत का उस्ताद कोई नहीं
जो लिख दिया, जो पढ़ लिया बस वही सही
यहां से नाकामी की डिग्रियां लेकर ही सब निकलते हैं
बस यही सोचकर तो इश्क के इम्तेहान से डरते हैं।।।
- अरमान आसिफ इकबाल


Tuesday, 12 February 2013

एक नजम लिखते हैं


चलो हम तुम मिलकर एक नजम लिखते हैं
शब के कोयले से दीवार-ए-वादों पर कसम लिखते हैं

वक्त की बारिश भी धो न पाये इस इबारत को
कुछ ऐसी ही त्वारीख इस जनम लिखते हैं

फलक से समेट लेते हैं चांद तारों को
हर एक पर नाम-ए-सनम लिखते हैं

ख्वाहिशों की पतंग खूब ढील देके तानो
ऐसे खुले आसमान किस्मत से कम मिलते हैं

अश्कों को डाल आएं गहरे समंदर में
गमों के दरिया भी जाकर वहीं मिलते हैं

वफाओं की पोशाक से होगी हिफाजत हमारी
इश्क की वादी में मौसम भी रुख बदलते हैं

कहीं कलम न हो जाए मोहब्बत से खाली अरमान
यही तो सोचकर जवाब में नफरतें कम लिखते हैं
- अरमान आसिफ इकबाल

Monday, 11 February 2013

कुंभ हादसा



चंद घंटों पहले माहौल में श्रद्धा का उद्घोष था
हुक्मरानों की कमी से अब कोई हलाक तो कोई बेहोश था

नन्हा बच्चा अपनी मृत मां को जगा रहा था
एक सभ्य पेशेवर तबका इससे अपनी रेटिंग बढ़ा रहा था

पुलिस हादसे की कड़ी से कड़ी खोज रही थी
बद्इंतजामी से मासूम जिंदगिंया दम तोड़ रही थीं

सुरक्षा के नाम पर हथियार डाल रहे थे
पीड़ितों को मुआवजा देकर बात टाल रहे थे

हम तो मुफलिसी में भी कुंभ नहाकर दुनिया छोड़ जाएंगे
अपने पाप धोने को हुक्मरान कब गंगा में डुबकी लगाएंगे।।।
- अरमान आसिफ इकबाल

Thursday, 7 February 2013


मोहब्बत  की  राह  को  कुछ  इस  तरह  गुलज़ार  करते  हैं
अनजानी  मंजिल  को  ख्वाबों  से  तैयार  करते  हैं

भले  वो  फेर  लें  हमे  देखकर  मुह  अपना
हम  तो उनकी  बेरुखी से भी प्यार  करते  हैं

पता  चला  है  के  वो  शरमों -ओ -हया  के  हैं  कायल
वरना  हम  भी  दिल -ए -ख्वाहिशें  हज़ार  रखते  है

रुख  से  ज़रा  नकाब  आहिस्ता  से  हटाना
ज़मानेवाले  भी  दिल  बेकरार  रखते  हैं

यकीं  न  आये  तो  किसी  से  ये  पूछ  लो  जाकर
भला  जवाब  भी  कभी  खुद  सवाल  करते  हैं

सीख  रहा   हूँ  उल्फत  के  दाँव -पेच  'अरमान'  
नाज़ुक  'गुलाब' ही  काँटों  से  वार  करते  हैं ...अरमान आसिफ इकबाल