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Saturday, 6 October 2018

मेरे मौला मेरे पास आ जा सुन ले मेरी भी कभी कभी

मेरे मौला मेरे पास आ जा 
सुन ले मेरी भी कभी कभी
थाम ले हाथ ज़रा मेरा
छूट गया हूं तन्हा कहीं
चला था साथ किसी के
वो बीच राह कहीं खो गया
दूर-दूर तलक ख़ामोशी 
रस्ता सूना सा हो गया
न कोई आहट न कोई आवाज़
हवाओं ने बदल रखा है मिजाज़
किधर जाऊं रूठीं राह सभी
मेरे मौला मेरे पास आ जा 
सुन ले मेरी भी कभी कभी
सोचा न था साथ ऐसे छूटेगा
लुटेरा वक्त मेरा सबकुछ लूटेगा
करूंगा इंतज़ार मैं ताउम्र वहीं
भले मर जाऊं पर थकूंगा नहीं
मेरे मौला मेरे पास आ जा 
सुन ले मेरी भी कभी कभी







1 comment:

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