कोलकाता टेस्ट में •ाारत की शर्मनाक हार से पूरा देश स्तब्ध है। विश्व विजेता का ताज अपने सिर में सजाकर घूम रही टीम इंडिया, अंग्रेज बल्लेबाजों के संयम के सामने नौसिखिओं की तरह जूझती नजर आई। मनमानी पिच के बावजूद •ाी धोनी के धुरंधर पानी •ारते नजर आए। अपनी धरती, अपना अंबर होते हुए अब और क्या चाहिए टीम इंडिया को देशवासियों के लिए एक अदद जीत नसीब कराने के लिए। घर के शेर, घर में ही ढेर हो गए। एक तरफ कप्तान धोनी हार का ठीकरा बल्लेबाजों के सिर फोड़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ बीसीसीआई सीनियर गेंदबाजों को अलविदा कहकर अपनी नाक बचा रहा है। किसको सही माना जाए, धोनी या बीसीसीआई को। अगर मैदान में खड़े धोनी ने बल्लेबाजों को कोसा, तो बीसीसीआई ने गेंदबाजों को क्यों निकाला या ये कहा जाए कि बीसीसीआई बल्लेबाजों को निकालना ही नहीं चाहता, चाहे बल्लेबाज कितना •ाी टीम का बेड़ा गर्क करते रहें। क्रिकेट की टेÑनिंग लेने वाला बच्चा •ाी बता सकता है कि जिस पिच पर अंग्रेज बल्लेबाजों ने पांच सौ से ऊपर स्कोर पहुंचाया, वही पिच •ाारतीय बल्लेबाजों के लिए बंजर हो गई। बात साफ है कि दो टेस्ट मैचों में लगातार हार से नई चयन समिति की •ाी इज्जत दांव पर लग गई है। •ाला हो मीडिया का कि अ•ाी तक उसकी नजर चयन समिति से दूर है। बीसीसीआई द्वारा युद्ध स्तर पर जहीर खान, हर•ाजन सिंह और युवराज को बाहर करना कहीं न कहीं ये दर्शाता है कि इन्हें बलि का बकरा बनाकर, दूसरे बल्लेबाजों की पेशानी में पड़ते बलों को सीधा किया है। चयन समिति ने इन खिलाड़ियों को निकालकर कुछ नया नहीं किया है। खराब फॉर्म से जूझ रहे जहीर को तो इस टेस्ट के बाद बाहर होना ही था, हर•ाजन •ाी काफी दिनों बाद वापसी के बावजूद असर नहीं दिखा पाए। रही बात युवराज की, तो कहीं न कहीं उनको अन्य बल्लेबाजों से कमतर आंका गया। आखिर कब तक बीसीसीआई बूढ़े शेरों को रिकॉर्ड के नाम पर टीम में ठूंसती रहेगी। क्यों करीबियों को टीम के करीब रखा जाता है। आईसीसी की ताजा टेस्ट रैंकिंग के अनुसार कोई •ाी •ाारतीय बल्लेबाज टॉप टेन में जगह नहीं बना पाया है। •ाारतीय बल्लेबाजों की शुरुआत 19वें पायदान से सचिन तेंदुलकर करते हैं। इसके बाद 21वें पर सहवाग और 23वें पर चेतेश्वर पुजारा हैं, जबकि बॉलिंग में प्रज्ञान ओझा एकमात्र •ाारतीय गेंदबाज हैं, जो रैंकिंग में पांचवें पायदान पर हैं। मतलब साफ है कि जिन बल्लेबाजों को बीसीसीआई सजावट के तौर पर टीम में रखकर शो•ाा बढ़ा रहा है, उनमें से एक •ाी टॉप टेन की सूची में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में नाकाम रहा है, जबकि गेंदबाजों की नाक रखते हुए प्रज्ञान टॉप टेन में बरकरार हैं। वर्तमान में चल रहे रणजी मैचों पर यदि गौर फरमाया जाए, तो कई ऐसे बल्लेबाज मिल जाएंगे, जो दोहरा शतक लगाकर शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं। फॉर्म में चल रहे ये बल्लेबाज •ाी बीसीसीआई की चयन समिति की अनदेखी के कारण रणजी तक ही सीमित रह जाते हैं। देश के हालात ऐसे हैं कि राजनीति एक खेल है और खेल में राजनीति है, जिसे आम इंसान सिर्फ जीत-हार तक ही समझ पाता है। इससे ज्यादा नहीं। बीसीसीआई को अपने स्तर और विवेक से फैसले लेने चाहिए। मीडिया की खबरों, किसी खास खिलाड़ी या रिकॉर्ड बनवाने के लिए चयन नहीं होना चाहिए। रिकॉर्ड किसी एक खिलाड़ी की जागीर नहीं होते। ये तो एक निरंतर प्रक्रिया है, जो सिर्फ बदलाव के साथ ही एक-दूसरे से आगे निकलते हैं और बदलाव प्रकृति का नियम हैं।
Monday, 10 December 2012
यहां अपना-पराया कोई नहीं
कोलकाता टेस्ट में •ाारत की शर्मनाक हार से पूरा देश स्तब्ध है। विश्व विजेता का ताज अपने सिर में सजाकर घूम रही टीम इंडिया, अंग्रेज बल्लेबाजों के संयम के सामने नौसिखिओं की तरह जूझती नजर आई। मनमानी पिच के बावजूद •ाी धोनी के धुरंधर पानी •ारते नजर आए। अपनी धरती, अपना अंबर होते हुए अब और क्या चाहिए टीम इंडिया को देशवासियों के लिए एक अदद जीत नसीब कराने के लिए। घर के शेर, घर में ही ढेर हो गए। एक तरफ कप्तान धोनी हार का ठीकरा बल्लेबाजों के सिर फोड़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ बीसीसीआई सीनियर गेंदबाजों को अलविदा कहकर अपनी नाक बचा रहा है। किसको सही माना जाए, धोनी या बीसीसीआई को। अगर मैदान में खड़े धोनी ने बल्लेबाजों को कोसा, तो बीसीसीआई ने गेंदबाजों को क्यों निकाला या ये कहा जाए कि बीसीसीआई बल्लेबाजों को निकालना ही नहीं चाहता, चाहे बल्लेबाज कितना •ाी टीम का बेड़ा गर्क करते रहें। क्रिकेट की टेÑनिंग लेने वाला बच्चा •ाी बता सकता है कि जिस पिच पर अंग्रेज बल्लेबाजों ने पांच सौ से ऊपर स्कोर पहुंचाया, वही पिच •ाारतीय बल्लेबाजों के लिए बंजर हो गई। बात साफ है कि दो टेस्ट मैचों में लगातार हार से नई चयन समिति की •ाी इज्जत दांव पर लग गई है। •ाला हो मीडिया का कि अ•ाी तक उसकी नजर चयन समिति से दूर है। बीसीसीआई द्वारा युद्ध स्तर पर जहीर खान, हर•ाजन सिंह और युवराज को बाहर करना कहीं न कहीं ये दर्शाता है कि इन्हें बलि का बकरा बनाकर, दूसरे बल्लेबाजों की पेशानी में पड़ते बलों को सीधा किया है। चयन समिति ने इन खिलाड़ियों को निकालकर कुछ नया नहीं किया है। खराब फॉर्म से जूझ रहे जहीर को तो इस टेस्ट के बाद बाहर होना ही था, हर•ाजन •ाी काफी दिनों बाद वापसी के बावजूद असर नहीं दिखा पाए। रही बात युवराज की, तो कहीं न कहीं उनको अन्य बल्लेबाजों से कमतर आंका गया। आखिर कब तक बीसीसीआई बूढ़े शेरों को रिकॉर्ड के नाम पर टीम में ठूंसती रहेगी। क्यों करीबियों को टीम के करीब रखा जाता है। आईसीसी की ताजा टेस्ट रैंकिंग के अनुसार कोई •ाी •ाारतीय बल्लेबाज टॉप टेन में जगह नहीं बना पाया है। •ाारतीय बल्लेबाजों की शुरुआत 19वें पायदान से सचिन तेंदुलकर करते हैं। इसके बाद 21वें पर सहवाग और 23वें पर चेतेश्वर पुजारा हैं, जबकि बॉलिंग में प्रज्ञान ओझा एकमात्र •ाारतीय गेंदबाज हैं, जो रैंकिंग में पांचवें पायदान पर हैं। मतलब साफ है कि जिन बल्लेबाजों को बीसीसीआई सजावट के तौर पर टीम में रखकर शो•ाा बढ़ा रहा है, उनमें से एक •ाी टॉप टेन की सूची में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में नाकाम रहा है, जबकि गेंदबाजों की नाक रखते हुए प्रज्ञान टॉप टेन में बरकरार हैं। वर्तमान में चल रहे रणजी मैचों पर यदि गौर फरमाया जाए, तो कई ऐसे बल्लेबाज मिल जाएंगे, जो दोहरा शतक लगाकर शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं। फॉर्म में चल रहे ये बल्लेबाज •ाी बीसीसीआई की चयन समिति की अनदेखी के कारण रणजी तक ही सीमित रह जाते हैं। देश के हालात ऐसे हैं कि राजनीति एक खेल है और खेल में राजनीति है, जिसे आम इंसान सिर्फ जीत-हार तक ही समझ पाता है। इससे ज्यादा नहीं। बीसीसीआई को अपने स्तर और विवेक से फैसले लेने चाहिए। मीडिया की खबरों, किसी खास खिलाड़ी या रिकॉर्ड बनवाने के लिए चयन नहीं होना चाहिए। रिकॉर्ड किसी एक खिलाड़ी की जागीर नहीं होते। ये तो एक निरंतर प्रक्रिया है, जो सिर्फ बदलाव के साथ ही एक-दूसरे से आगे निकलते हैं और बदलाव प्रकृति का नियम हैं।
Thursday, 11 October 2012
मलाला से डरता तालिबान
हजरत मुहम्मद (सल.) ने फरमाया कि एक विद्वान के कलम की स्याही एक शहीद के खून से •ाी ज्यादा पाक होती है और इल्म हासिल करना हर मुसलिम औरत व मर्द पर फर्ज (जरूरी) है। फिर पाक कलमा लिखा झंडा लेकर चलने वाले तालिबान ने उस 14 साल की छात्रा मलाला युसुफजई को अपनी गोली का शिकार क्यों बनाया,जो सिर्फ इल्म और बुनियादी हक को हासिल करना चाहती थी। मलाला को उस वक्त गोली का शिकार बनाया गया जब वो अपनी साथी लड़कियों के साथ स्कूल वैन से घर वापस आ रही थी। हमलावर ने बस को रुकवाकर पहले तो मलाला की पहचान की, फिर उसे सिर और पेट में गोली मार दी। फिलहाल मलाला का पेशावर के अस्पताल में इलाज चल रहा है और डॉक्टर उसे खतरे से बाहर बता रहे हैं। इस वक्त पूरा पाकिस्तान इस बहादुर लड़की की सलामती के लिए दुआ कर रहा है और पाकिस्तानी हुकूमत ने पाकिस्तानी एयर लाइंस के एक एंबुलेंस विमान को पूरी तरह से तैयार रखा है ताकि किसी •ाी आपातकाल में मलाला को विदेशी इलाज के लिए •ोजा जा सके। मलाला का कसूर सिर्फ इतना था कि उसने 2009 में पाकिस्तान के स्वात इलाके में फैले आतंकी संगठन तहरीके तालिबान पाकिस्तान द्वारा जारी किए गए फरमान पर अमल नहीं किया था। जब मलाला सिर्फ 11 साल की थी तब तालिबान ने फरमान जारी किया था कि कोई •ाी लड़की स्कूल या कॉलेज पढ़ने नहीं जाएगी। अगर कोई •ाी लड़की ऐसा करती है तो उसके चेहरे पर तेजाब डाल दिया जाएगा। उस वक्त मलाला ने फरमान की परवाह ना करते हुए स्कूल जाना जारी रखा और अपनी साथी लड़कियों को •ाी प्रोत्साहित किया कि वो इस फरमान की खिलाफत करें। तब मलाला और साथी छात्राएं सादे कपड़ों में शॉल के नीचे किताबें छुपाकर स्कूल जाती थीं। इसके बाद मलाला ने बीबीसी के लिए उर्दू डायरी लिखी और स्वात में हो रहे तालिबानी अत्याचार के बारे में तफ्सील से लिखा। तालिबान के खिलाफ इस कदम को उठाने के बाद मलाला को पाकिस्तान में राष्ट्रीय शांति पुरस्कार से नवाजा गया और 2011 में अंतरराष्ट्रीय बाल शांति पुरस्कार के लिए •ाी मलाला का नाम शामिल किया गया। इस तरह मलाला पहली पाकिस्तानी लड़की बनीं, जिन्हें ये रुतबा हासिल हुआ। बताया जा रहा है कि त•ाी से मलाला के पिता जियाउद्दीन युसुफजई और खुद मलाला तालिबानियों के निशाने पर थे, लेकिन मलाला को तालिबानियों ने पहले शिकार बनाया। मलाला के पिता बताते हैं कि जब मलाला का जन्म हुआ था तो हमने अपनी बेटी का नाम अफगानिस्तान की बहादुर नायिका मलालई के नाम पर रखा था, जिन्होंने अफगानिस्तान-ब्रिटिश युद्ध के दौरान अपनी बहादुरी से दुश्मन के दांत खट्टे कर दिए थे। जियाउद्दीन आगे बताते हैं कि आज लगता है कि उनका अपनी बेटी का नाम मलाला रखना सही फैसला था और उन्हें अपनी बेटी पर फख्र हैं। तालिबान का मतलब विद्यार्थी होता है, लेकिन मलाला और इन विद्यार्थियों में काफी फर्क है। एक विद्यार्थी (मलाला) जो समाज में शांति व औरतों की तरक्की के लिए कलम का हथियार उठा रही है, तो दूसरी तरफ ये कैसे विद्यार्थी (तालिबान) हैं, जो बंदूक की जबान से इस्लाम में बताए गए औरतों के हुकूकों पर पाबंदी का फैसला कर रहे हैं। अब यहां ये कहना मुश्किल हो जाएगा कि कौन इस्लाम में दिए गए हुकूकों (अधिकारों) को नि•ााने और अमल करने की कोशिश कर रहा है? बहरहाल, पाकिस्तानी सेना और अमेरिका के संयुक्त अ•िायान के तहत स्वात से खदेड़े जा रहे तालिबान कुछ •ाी करने को तैयार हैं। वो औरतों को शिक्षा से महरूम रखना चाहते हैं, ताकि आने वाली नस्लें अशिक्षित होकर उनकी (तालिबान) राह पर कुर्बान होती रहें।
Friday, 3 August 2012
राजनीति के कीचड़ में फेंका पत्थर
आसिफ इकबाल
•ा्रष्टाचार के खिलाफ अ•ाी तक मुहिम 'आंदोलन' के जरिए चल रही थी, लेकिन अब टीम अन्ना ने 'राजनीति' में उतरने की इच्छा जाहिर की है। उस राजनीति में, जिसके खेल में आत्मसम्मान, ईमानदारी, समाजसेवा, देश सेवा बगैराह दांव पर लगाने पड़ते हैं। अन्ना ने देशवासियों से राजनीतिक दल बनाने की राय मांगी है। अब जनता के बहुमत से टीम अन्ना, 'अन्ना पार्टी' में तब्दील होने जा रही है। सवाल ये उठता है कि क्या अन्ना पार्टी देश की गंदी राजनीति में उतरकर •ा्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल को पारित करा सकती है। क•ाी-क•ाी गंदगी को साफ करने के लिए गंदगी में उतरना पड़ता है। ठीक उसी तरह टीम अन्ना ने गंदी राजनीति में उतरने की इच्छा जाहिर की। लेकिन क्या अन्ना पार्टी राजनीति के कायदे कानून या खेल की चालों को अपने हिसाब से चल पाएगी। कहते हैं राजनीति में 'सबकुछ' जायज है, लेकिन अन्ना पार्टी 'सबकुछ' वाला मंत्र नहीं अपना सकती है। धनबल और बाहुबल की राजनीति में अन्ना पार्टी अपने आप को कहा खड़ा पाती है। लोकपाल, •ा्रष्टाचार व कालेधन को अपना मुद्दा बनाकर राजनीति में उतरने के बाद अन्ना को दूसरे राजनीतिक दलों से कड़ा सामना करना पड़ सकता है। •ा्रष्टाचार और •ा्रष्ट नेताओं की बात करने वाले अन्ना के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी फंड की होगी, जो उन्हें ईमानदार लोगों से जमा करना होगा। किसी •ाी ऐसी फर्म या कंपनी का पैसा पार्टी के लिए हराम होगा जो दागी व्यक्ति से आए। वैसे अन्ना ने आम जनता से चंदा इकट्ठा करने की गुजारिश की है। इसके अलावा पार्टी के उम्मीदवारों का चुनाव किस प्रकार किया जाएगा। टीम अन्ना अपने उम्मीदवार को ईमानदारी का सर्टिफिकेट कैसे देगी। ईमानदारी कोई पत्थर की मूर्ति नहीं, जो एक बार बना दी तो ताउम्र के लिए फुरसत। ये इंसानी फितरत की एक क्रिया है, जो वक्त के साथ इंसान को ईमानदार से बेइमान बना सकती है। ऐसे में अन्ना पार्टी क्या करेगी, जब उसका ही नेता अगर •ा्रष्ट निकल गया। राजनीति में जातिवाद और क्षेत्रवाद ने अच्छी पकड़ बना रखी है। क्या अन्ना का •ा्रष्टाचार का मुद्दा वहां काम कर पाएगा। हमारे देश की जनता विकास पर कम जाति और क्षेत्र के नाम पर निजाम बनाती है। •ाले ही बड़े शहरों में अन्ना पार्टी को सफलता हासिल हो जाए, लेकिन गांवों, कस्बों में •ा्रष्टाचार मुद्दे को समझने वाले बहुत ही कम लोग हैं। ये आबादी ज्यादातर अपने क्षेत्र और जाति को देखकर वोट करती है। यही वजह है कि अन्ना पार्टी को सबसे ज्यादा नुकसान क्षेत्रीय दलों से उठाना पड़ सकता है। अन्ना पार्टी का अहम इम्तिहान सरकार बनाने के दौरान होगा। किसी •ाी दल को बहुमत न मिलने की दशा में अन्ना पार्टी क्या करेगी। किसे देगी अपना समर्थन, क्योंकि उसके अनुसार हर दल •ा्रष्ट और हर नेता •ा्रष्टाचारी है। फिर कैसे अन्ना पार्टी अपने आप को संसद में मजबूत कर पाएगी। अन्ना हजारे ने कहा है कि वो कहीं से •ाी चुनाव नहीं लड़ेंगे, लेकिन उनका सपोर्ट पार्टी के साथ रहेगा। एक टीवी चैनल को दिए गए ताजा बयान में कुमार विश्वास, मनीष सिसोदिया और अरविंद केजरीवाल ने •ाी पार्टी बनाने के पक्ष में हाथ उठाए हैं पर चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है। ऐसे में पार्टी की कमान कौन सं•ाालेगा, किसे बनाया जाएगा पार्टी का नेता। अन्ना के राजनीतिक दल बनाने के फैसले से ही इस आंदोलन में दोफाड़ हो गए हैं। आंदोलन में शामिल आम आदमी के बीच कानाफूसी होने लगी है। कुछ राजनीतिक दल बनाने व कुछ न बनाने के पक्ष में हैं। अन्ना के आंदोलन में लोगों का जनसैलाब देखने को मिला। लाखों हाथों में तिरंगे झंडे लहराते दिखे। अ•ाी तक अन्ना के आंदोलन और केंद्र सरकार को कोसने वाली जनता की अग्निपरीक्षा अब शुरू होने वाली है। अब अन्ना को संसद में मजबूत करने के लिए देश के लोगों को उनका सहयोग करना होगा। वरना माना जाएगा कि जनता का आंदोलनों में बेहिसाब इकट्ठा होकर नारे लगाना, महज एक दिखावा था। राजनीतिक दल बनाने की मंशा के बीच अब ये देखना होगी कि अन्ना के सहयोगी बाबा रामदेव को कहां जगह मिलती है। कहीं ऐसा तो नहीं कि अन्ना पार्टी के साथ-साथ रामदेव पार्टी •ाी खड़ी हो जाए। अन्ना के इस फैसले पर देश के स•ाी राजनीतिक दलों ने खुशी जाहिर की है। उनका कहना है कि राजनीति में उतरने के बाद अन्ना को पता चल जाएगा कि राजनीति क्या है और देश को कैसे चलाया जाता है। खैर, अन्ना ने गंदी राजनीति में पत्थर फेंका है, आगे देखते हैं कि क्या होता है।
Saturday, 21 July 2012
क्रिकेट ही क्यों
आसिफ इकबाल
26 नवंबर 2008, मुंबई के ताज होटल पर आतंकियों का हमला और पाकिस्तान से हर तरह से •ाारत ने रिश्ते खत्म कर लिए, जिसमें से खेल •ाी शामिल है। जैसा कि अटकलें लगाई जा रही थीं, उसके अनुसार बीते सोमवार को बीसीसीआई ने घोषणा की कि पाकिस्तानी खिलाड़ी दिसंबर में तीन एकदिवसीय और दो टी-20 मैच खेलने के लिए •ाारत की सरजमीं पर कदम रखेंगे। क्रिकेट के शौकीन लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई कि दुनिया के सबसे रोमांचक मुकाबले को एक बार फिर उनकी आंखे देखेंगी। बीसीसीआई की घोषणा के साथ ही पूर्व क्रिकेटर सुनील गावस्कर का इस श्रृंखला को लेकर विरोध सामने आया। सुनील गावस्कर, जिनका क्रिकेट जगत में आला मर्तबा है, का कहना है कि जबतक मुंबई हमले का मामला हल नहीं हो जाता, तबतक पाकिस्तान को खेलने के लिए •ाारत नहीं बुलाना चाहिए। बेशक गावस्कर का बयान पूरी तरह से जायज है, पर सवाल ये उठता है कि एक क्रिकेटर ने क्रिकेट का विरोध क्यों किया?, जबकि आजतक •ाारत-पाक क्रिकेट संबंधों को लेकर किसी •ाी •ाारतीय या पाकिस्तानी खिलाड़ी ने नकारात्मक टिप्पणी नहीं की है। तो फिर ऐसे में गावस्कर का इस सीरीज का विरोध करना किस दिशा की ओर संकेत देता हैं। कहीं गावस्कर को सचिन, अजहर, सिद्ध्नू , कीर्ति आजाद खिलाड़ियों की तरह संसद •ावन तो नहीं दिख रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि गावस्कर ने •ाी मौके को •ाुनाते हुए, इस तरह का राजनीतिक बयान देकर राजनीति की दुनिया में दस्तक देनी चाही हो। गावस्कर ने कहा कि मुंबईकर होने के नाते मैं ये कहना चाहूंगा कि जब तक ताज हमले में पाकिस्तान कोई कार्रवाई नहीं करता, •ाारत को पाक के साथ क्रिकेट नहीं खेलना चाहिए। गावस्कर •ाारतीय से अचानक मुंबईकर कैसे हो गए। शायद गावस्कर को मुंबईकरों का आसरा चाहिए, क्योंकि हो सकता है •ाविष्य में उनको मुंबईकरों की जरूरत पड़ जाए। दरअसल सचिन तेंदुलकर के राज्यस•ाा सदस्य बनने के साथ ही खिलाड़ियों में राजनीति में उतरने की उत्सुकता बढ़ गई है। जो कुछ •ाी खिलाड़ियों में राजनीति को लेकर हिचकिचाहट थी वो खत्म हो रही है। संसद •ावन पर हमले के बाद •ाी पाकिस्तान कई बार •ाारत का दौरा कर चुका है। तब गावस्कर ने विरोध नहीं किया, लेकिन अब अचानक गावस्कर का विरोधी स्वर क्यों मुखर हो गया। नि:संदेह हमें पाकिस्तान से हर तरह के संबंध खत्म कर देने चाहिए। लेकिन अगर खेल में संबंध खत्म करने की बात आती है तो सिर्फ क्रिकेट और हॉकी को ही क्यों बलि का बकरा बनाया जाता है। बाकी खेल वैसे ही होते हैं। कुश्ती, कबड्डी, बॉक्सिंग, टेनिस व दूसरे खेलों पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जाता है। इनकी •ाी पाकिस्तानी टीमें •ाारत नहीं आनी चाहिए। टेनिस में •ाारत के महेश •ाूपति और पाकिस्तान के ऐसामुल हक की जोड़ी नहीं बननी चाहिए। दरअसल शुरू से ही दोनों देशों के लोगों ने कला, संस्कृति और खेल को राजनीति और दुश्मनी से अलग रखा है। जिस तरह से संगीत के क्षेत्र में •ाारत के लोगों ने पाकिस्तानी गायकों आतिफ असलम, राहत फतेह अली खान, नुसरत फतेह अली खान, मेहदी हसन, गुलाम अली को जैसे फनकारों को पलकों पर बिठाया है, ठीक उसी तरह जगजीत सिंह, किशोर कुमार, मोहम्मद रफी, बिस्मिल्लाह खान, लता मंगेशकर, देवानंद जैसे फनकारों को इज्जत दी। सचिन तेंदुलकर को पाकिस्तान में सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है। पाकिस्तान के पूर्व कप्तान वसीम अकरम पाकिस्तान में कम और •ाारत में ज्यादा नजर आते हैं, बल्कि वो तो कोलकाता नाइट राइडर्स के बॉलिंग कोच •ाी हैं। उनपर अंगुली क्यों नहीं उठाई जाती। बेशक पाकिस्तान हमारे लिए मुश्किल पैदा करता है, लेकिन दोनों सरहदों के पार एक आम इंसान रूहानी सुकून चाहता है, जो सिर्फ खेल और संगीत से उसको मिलता है। •ाारत-पाक क्रिकेट मैच का रोमांच दुनिया में सबसे जुदा होता है, जिसपर दुनिया के स•ाी देश अपनी नजर गड़ाए रहते हैं। •ाले ही पूर्व क्रिकेटर, सांसद कार्ति आजाद ने गावस्कर की हां में हां मिलाई हो, लेकिन सच तो ये है कि किसी •ाी क्रिकेट खिलाड़ी ने क•ाी •ाी क्रिकेट का विरोध नहीं किया, चाहे वो •ाारत-पाक के बीच क्रिकेट मुकाबला हो या किसी अन्य देश का। •ाारत को पाकिस्तान से हर तरह के रिश्ते खत्म कर लेने चाहिए, लेकिन इसमें सिर्फ क्रिकेट को ही न चुना जाए।
Wednesday, 11 July 2012
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