जो दिन सी जागती थी
वो रात सी सोयी
जो हवा सी चलती थी
वो बरसात सी रोयी
जो पाना था उसको
वो चीज़ उसने खोयी
ज़िंदगी किसी ने उसकी
क्यों है अश्क़ में डुबोई...
#अरमान
जो दिन सी जागती थी
वो रात सी सोयी
जो हवा सी चलती थी
वो बरसात सी रोयी
जो पाना था उसको
वो चीज़ उसने खोयी
ज़िंदगी किसी ने उसकी
क्यों है अश्क़ में डुबोई...
#अरमान
चार आंखें
दो छतें
दो नज़रें
एक मोहब्बत,
उन पर लगीं
हज़ार नज़रें
दो आंखें
गुम हुईं,
दो नज़रें
करती रहीं
इंतज़ार
दो नज़रें भी
गुम हुईं,
अब कोई नज़र
नज़र नहीं आती
बची दो छतें
दोनों ख़ाली,
करती हैं
किसी नज़र का
इंतज़ार.....
और हज़ार नज़रें
अब ख़ाली छतों
को देखती हैं...
#अरमान
बड़ी-बड़ी अंखियों में
रात का काजल लगा दूं
खिले-खिले चेहरे पे
दिन का सूरज जगा दूं
गोरी-गोरी बाहों में
चांद का कंगन पवा दूं
काली-काली ज़ुल्फ़ों को
सुरमई घटा से सजा दूं
झुकी-झुकी नज़रों को
शर्म ओ हया से उठा दूं
हौले-हौले आंचल को
शोख़ हवा से उड़ा दूं
धीरे-धीरे चुपके से
राज़ की बात बता दूं
खोए-खोए इस दिल के
'अरमान' आज जता दूं...
#अरमान
ऐ दुनिया तुझे किस बात का नशा तारी है
मेरी आंख के आंसू मेरे जिस्म से भारी हैं
ख़ुशनसीब हो जो मिल गया सबकुछ तुम्हें
न जाने किसने बख़्शी पैदाइशी लाचारी है
ये महफ़िलें, ये दावतें, ये रौनकें तुम्हारी
मेरे हिस्से में तो बस भूख और बीमारी है
मत कर घमंड इस क़दर ऐ 'अरमान'
आज मेरी तो कल तेरी भी बारी है...
#अरमान
इक शहर है अंजाना सा
मेरे मन में बसता है
इक चेहरा है चंदा सा
परदे में हंसता है
इक बात है अनकही सी
हर तरफ़ गूंजती है
इक नज़र है पगली सी
किसी खोए को ढूंढती है
इक रात है काली सी
जो ख़त्म नहीं होती
एक झील है गहरी सी
दिन रात है डुबोती
इक गली है धुंधली सी
जो सूनी सी है रहती
इंतज़ार में किसी के
खोई सी है रहती
इक ख़ामोशी है लंबी सी
न सुनता न कोई कहता है
अंजान इस शहर में
इक शख़्स अकेला रहता है..
#अरमान
न जाने क्या दिन-रात सोचता है
मुझको ये शहर पल-पल नोचता है
दौड़ता फिरता है किसकी तलाश में
जागता रहता है क्यों नहीं सोता है
ज़िंदगी जीने के लिए गांव छोड़ आए
मां-बाप के दुआओं भरे हाथ छोड़ आए
ख़्वाब लेकर आ गए पर नींद छोड़ आए
ख़ुद को पाने के लिए क्या-क्या खोता है
जागता रहता है क्यों नहीं सोता है
न दिखते चौखट पे कोई रंग न रंगोली
न आती नज़र मोहल्ले की हंसी ठिठोली
न दिखती खेतों की वो सूरत भोली
आंख में रह-रह कर नश्तर चुभोता है
जागता रहता है क्यों नहीं सोता है
छत तो मिल गई पर घर कहां है
बुज़ुर्गों की गाली का डर कहां है
मिल जाए जितना उसमें सबर कहां हैं
हो ज़रूरत तो कोई पास कहां होता है
जागता रहता है क्यों नहीं सोता है...
#अरमान
तेरा सफ़र, मेरा सफ़र
चलते रहें यूं बेख़बर
किस बात का हमको हो डर
कैसी भी हो अपनी डगर
मेरे हाथ में तेरा हाथ हो
मंज़िल तलक ये साथ हो
कदमों के हों इक ही निशां
जैसे ज़मी और आसमां
बातों में भी तेरा ज़िक्र हो
किस बात की फिर फिक्र हो
थामो मुझे गिर जाऊं जो
खो जाऊं मैं न पाऊं तो
बस इक यही अरमान हो
हम दो बदन इक जान हों...