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Wednesday, 11 July 2012

सम्पादकीय पर आमिर


आसिफ इकबाल
आमिर खान। हिंदुस्तान के लिए कोई अनजाना नाम नहीं है। शायद ही कोई होगा, जो आमिर को न जानता हो। हिंदी फिल्मों के मिस्टर 'परफैक्शनिस्ट' अब अखबारों के सम्पादकीय पन्ने पर नजर आ रहे हैं। शायद ही कोई •ाारतीय इतिहास में अ•िानेता हो, जिसने अखबारों के सम्पादकीय पेज पर जगह बनाने में कामयाबी हासिल की हो। हमेशा मीडिया से दूरी बनाए रहने वाला ये सुपर स्टार अचानक मीडिया से कैसे जुड़ गया, इस राज को तो बखूबी आमिर के अलावा और कोई नहीं जानता। एक फिल्म करने के लिए 40 करोड़ का मेहनताना लेने वाला शख्स देश•ार के शहरों की खाक छानने लगा। आज आमिर के लग•ाग हर प्रतिष्ठित अखबार में कॉलम आना ये बताता है कि आमिर रुपहले पर्दे के कलाकार ही नहीं, वरन एक अच्छे लेखक •ाी बनते जा रहे हैं। स्टार प्लस के धारावाहिक सत्यमेव जयते से छोटे पर्दे पर कदम रखने के साथ ही आमिर को सराहना के साथ-साथ विरोध का •ाी सामना करना पड़ा। विरोध ऐसा कि प्रतिष्ठित मेडिकल संस्था आईएमए ने आमिर के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का मन बना लिया, लेकिन आमिर ने संस्था से माफी मांगने से इनकार कर दिया। सत्यमेव जयते के पहले एपीसोड से ही आमिर की आलोचना शुरु हो गई। आलोचकों का कहना था कि •ाले ही आमिर ने सत्यमेव जयते के स्लोगन को ले लिया हो, पर सच्चाई तो ये है कि आमिर कोई समाजसेवा नहीं कर रहे हैं। वो तो सिर्फ पैसे कमाने के लिए सत्यमेव जयते जैसे •ाावनात्मक स्लोगन का सहारा ले रहे हैं। बात •ाी सही हैं। आमिर ने समाजसेवा का ठेका थोड़ी ले रखा है। आमिर •ाी इस देश के आम नागरिकों में से एक हैं। समाजसेवा का काम तो नेताआों, अधिकारियों का होता है, जो देश की आजादी के बाद से जनता की किस तरह से सेवा कर रहे हैं, वो बखूबी दिखाई देता है। रही बात सत्यमेव जयते से पैसे कमाने की, तो सरकार को •ाी जनहित में कोई सूचना देने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ते हैं, जिनमें नेताओं और संबंधित अधिकारियों का कमीशन •ाी शामिल होता है। आमिर को अगर पैसा ही कमाना था, तो वो फिल्म निर्माण और एक्टिंग के अलावा विज्ञापन से करोड़ों की कमाई कर सकते हैं। एक वेबसाइट के अनुसार आमिर की वार्षिक आय 12 मिलियन डॉलर है। आमिर ने एक टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में खुलासा किया था कि सत्यमेव जयते की शूटिंग की वजह से इन्होंने बहुत से विज्ञापनों को छोड़ दिया, जिनसे उन्हें सत्यमेव जयते के निर्माण में लगने वाली रकम से कई गुना ज्यादा कमाई हो सकती थी। सवाल ये उठता है कि आमिर को अगर कमाई ही करनी थी, तो वो छोटे पर्दे पर इस तरह के धारावाहिक पर पैसा लगाने के बजाए, बिग बॉस, रोडीज, इमोशनल अत्याचार, सच का सामना या लोगों को रातोंरात करोड़पति बना देने वाले धारावाहिकों में निवेश कर सकते थे। वैसे •ाी दर्शकों और आलोचकों में इस तरह के धारावाहिकों पर आलोचना करने लायक कुछ नहीं मिलता है। लोगों की धड़कने बढ़ाने वाले और पैसे जिताने वाले एंकर्स की कोई आलोचना नहीं करता है। शायद ऐसे कार्यक्रम देश व संस्कृति को चुनौती नहीं देते हैं। सालाना15 मिलियन डॉलर कामने वाले शाहरुख, 13.5 मिलियन डॉलर कमाने वाले अक्षय कुमार, 6 मिलियन डॉलर कमाने वाले वाले सलमान खान और 3 मिलियन डॉलर कमाने वाले अमिता•ा बच्चन को ऐसा क्यों नहीं लगता है कि सत्यमेव जयते जैसे धारावाहिक बनाने पर अच्छी खासी रकम को खींचा जा सकता है। दरअसल किसी •ाी अ•िानेता के पास इतना वक्त नहीं है कि वो देश •ार में घूमकर अपना कीमती वक्त बर्बाद कर सके। •ाले ही आमिर की कुछ लोग आलोचना कर रहे हों, पर सच्चाई तो ये है कि देश का हर पीड़ित खासो-आम इंसान आमिर की प्रशंसा कर रहा है। आमिर खान ने आलोचकों की परवाह किए बगैर सत्यमेव जयते को जारी रखा है। सत्यमेव जयते को लेकर मीडिया ने आमिर का •ारपूर साथ दिया और आमिर •ाी अब हर हफ्ते अपने लेखों के जरिए वि•िान्न अखबारों के संपादकीय पन्ने पर नजर आ रहे हैं, जो ये बताता है कि सत्यमेव जयते के जरिए ही आमिर ने अखबारों के मुख्य पृष्ठ तक जगह बनाई।

Tuesday, 10 April 2012

अपनी हिफाजत

आप सभी को अवगत कराना चाहता हूं कि इस व्यंग्य को मैंने तब लिखा था जब जनरल वीके सिंह सेना अध्यक्ष थे और रियारमेंट से पहले बोल रहे थे कि हमारी सेना के पास उच्च कोटि के हथियार नहीं हैं. चौकीदार-वीके सिंह चौधरी - अमेरिका प्रधान मंनमोहन सिंह (तत्कालीन प्रधानमंत्री)



गांव के लोगों में खुसर-पुसर मची थी। स•ाी गफलत में थे कि आखिर गांव में चल क्या रहा है। पूरा गांव झम्मनलाल को ढूंढ रहा था। इतने में झम्मनलाल कंधे पर कई लाठियां लादकर देश की अर्थव्यवस्था की तरह डगमगाता चला आ रहा था। लोगों ने झम्मन का अफवाहों की तरह स्वागत किया। क्योंकि हमारे गांव के लोग अफवाहों को हाथोंहाथ लेते हैं। झम्मनलाल ने इससे पहले क•ाी इतना सम्मान नहीं पाया था। घसीटे ने झम्मन के कंधों से लाठियां उतारीं और पूछा: क्या बात है झम्मन, इतनी सारी लाठियां लेकर क्यों आ रहे हो? 

झम्मन: अबे पहले पानी पिला, प्यास से गला सूख रहा है। तुम्हें तो अपनी जान की फिकर है नहीं, और जो तुम्हारी जान-माल की हिफाजत के लिए  ये सब कर रहा है, उसे मार डालो प्यासा। घसीटे ने तुरंत झम्मन को पानी का गिलास पकड़ाते हुए कहा: आखिर माजरा क्या है? 

झम्मन: क्या माजरा-माजरा करते हो। कहीं माजरा के चक्कर में तुम सब की मजार न बन जाए। तुम्हें तो पता है कि हमारे पड़ोसी गांव हमसे कितना चिढ़ते हैं। जहां देखते हैं तरी, वहीं बिछा लेते हैं दरी। गांव के कितने खेतों में उनके बिजूका खड़े होकर हमारे जानवरों को डरा रहे हैं। हमारे गांव के प्रधान ऐसे हैं कि वो खुद  बिजूका बनकर हमे डराते हैं। वो गांव का चौकीदार पता नहीं क्या-क्या बोलता फिर रहा है। 
घसीटे: तुमने मजार की बात कर दी, अब मुझे डर लग रहा है। अब झम्मन बता •ाी दो क्या बात है। झम्मन: दरअसल बात है हमारे गांव के चौकीदार की। घसीटे: अरे वो चौकीदार जो बोल रहा था कि वो हमाए लल्ला से छोटा है। सबने कह तो दिया था कि हां •ााई तुम छोटे हो। अब क्या ये बोल रहा है कि मुझे दोबारा जनम लेना है?

 झम्मन : हां, हां वही। उसने प्रधान को चिट्ठी लिखी थी कि गांव में सुरक्षा के इंतजाम ठीक नहीं हैं। उसकी लाठी को महंगाई की वजह से तेल नहीं मिल पाया। जिसकी वजह से वो कमजोर हो गई है। रात को पहरा देने के लिए लालटेन में •ाी तेल नहीं है। कुल मिलाकर झेलो मुसीबत। वो चिट्ठी प्रधान तक पहुंचने से पहले अपने गांव के काबिल लेखू पत्रकार के पास पहुंच गई और उसने गांव की समस्याओं के साथ-साथ इस समस्या को •ाी अखबार में छाप दिया। बात पड़ोसी गांवों को •ाी पता चल गई। मैं जा रहा था शहर, तो मैंने रास्ते में देखा कि पड़ोसी गांव के लोग अपनी लाठी को तेल पिला रहे थे, नए-नए बिजूके खड़े कर रहे थे। उन्हें पता चल गया है कि हमारा चौकीदार अगर ये बात बोल रहा है तो सही होगी। नाश हो इस चौकीदार का। इतने साल से चौकीदारी कर रहा है, पहले कुछ नहीं बोला। जब जाने वाला है तो अचानक इसे गांव की सुरक्षा व्यवस्था खराब लगने लगी। 

घसीटे ने सहमकर कहा: तो चलो सरपंच ननकू से शिकायत करते हैं पड़ोसियों की। एक वही हैं जो हमारी फरियाद ध्यान से सुनते हैं।

 झम्मन: नाम मत लो ननकू का। कल की बात सुनी तुमने, पहले तो ननकू बोले कि जो आदमी हमारे गांव में आग लगा गया था और  पड़ोसी गांव में छिपा बैठा है, उसका पता बताने वाले को ईनाम दिया जाएगा। जब उस आदमी ने बोल दिया कि मैं तुम्हारी औकात जानता हूं। अपने निर्णय को बदलो, वरना तुमसे लाठियां खरीदना बंद। तुम्हें तो पता है कि सरपंच लाठियां बेचकर ही अपना काम चलाते हैं। तो आज वो हमसे बोल रहे हैं कि हमने उसके अपराध के सबूत लाने के लिए ईनाम घोषित किया है। और तुम्हें तो पता है कि हमारे सबूतों का इन पर कितना असर होता है। अपने गांव के माननीय जब इनके गांव जाते हैं तो कपड़े उतरवाकर चेक करके सबूत मांगते हैं। हम सूखे से जूझ रहे हैं। एक गांव से पानी की नहर लानी थी तो सरपंच ने बोल दिया कि तुम्हारे गांव के खेत सूखते हैं, तो सूखने दो। तुम उस गांव से नहर नहीं निकाल सकते। क्योंकि वो गांव सरपंच पर लाठी ताने खड़ा है। •ाइया दुनिया •ार में लाठियां चल रही हैं। इसलिए चौकीदारों के •ारोसे मत रहो और अपनी हिफाजत खुद करो। 

Monday, 2 April 2012

ये कैसी है खुजली


आसिफ इकबाल
गर्मी की चिलचिलाती धूप में झम्मनलाल बरगद के पेड़ के नीचे लेटा अपनी पीठ खुजला रहा था। घसीटे  ने अचानक नारद मुनि की तरह प्रकट होकर झम्मन की चारपाई पर अपनी तशरीफ रखते हुए सवाल दागा, ''अरे झम्मन क्या हुआ, पाीठ में कोई तकलीफ है क्या?'' झम्मन ने करवट लेकर घसीटे की जामुन की तरह काली शक्ल देखी और बोला, ''गर्मी की वजह से पीठ में खुजली हो रही थी, तो खुजला रहा था। वैसे इस खुजली का अपना मजा है। जब होती है, तो इसे खुजलाने में जन्नत का मजा आता है। वैसे •ाी जब आदमी के पास कोई काम-धाम न हो तो उसे खुजली होना लाजमी है।'' घसीटे ने माथे पर बल डालते हुए पूछा, ''मतलब। '' झम्मन, ''अरे यार घसीटे त•ाी कहता हूं मेंटॉस खा और दिमाग की बत्ती जला, क्योंकि अपने गांव में बिजली की कमी है, तो लोगों के दिमाग कमजोर हो गए हैं।'' ''ओह, तो अब समझ में आया कि आपका दिमाग चाचा चौधरी की तरह कम्प्यूटर से •ाी ज्यादा तेज क्यों है। ये सब मेंटॉस का कमाल है। वैसे तुम खुजली की बात कर रहे थे।'' घसीटे ने झम्मन की याद्दाश्त बढ़ाते हुए कहा।

 झम्मन, ''अरे हां, देखो घसीटे, खुजली कई प्रकार की होती है।'' घसीटे ने बीच में बात काटते हुए कहा, ''मुझे पता है दाद, खाज, खुजली।'' झम्मन, ''मैं जानता हूं कि तुमने बीसी में बीएससी की है।'' घसीटे, ''ये बीसी क्या होता है?'' झम्मन, ''बीसी मतलब •ााईचारा। जैसे हमारा और तुम्हारा •ााईचारा है। अब बचे-खुचे दिमाग को ज्यादा खर्च मत करों, वरना आगे की सोच खत्म हो जाएगी।'' झम्मन ने अपनी बात को जारी रखा और बोला, ''खुजली कई प्रकार की होती है, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक।'' ''तो झम्मन •ाइया तुम्हें कौन सी खुजली है।'' घसीटें ने पूछा। झम्मन, ''अब मेरे हाथ में खुजली हो रही है। चुपचाप बात सुन वरना, अपनी खुजली मिटाऊं फिर...'' घसीटे, ''ठीक है झम्मन बोलो। मैं समझ गया तुम्हें शारीरिक खुजली है।'' झम्मन ने झल्लाते हुए कहा, ''चुप हो जा मेरे दादा। तेरे मुंह में बहुत खुजली है।'' घसीटे ने अपने मुंह में लगाम लगा ली। झम्मन आगे बोला, '' शारीरिक खुजली का मतलब, जो खुजली हमारे बदन के किसी •ााग में होती है। आर्थिक खुजली का मतलब धन-दौलत से है। जब हाथ में खुजली होती है, तो लोग कहते हैं कि या तो धन आएगा या फिर जाएगा। ये खुजली नेताओं और अधिकारियों को ज्यादा होती है। '' घसीटे ने बात को फिर काटते हुए पूछा, ''अ•ाी तो तुम बोल रहे थे कि चुप हो जा, वरना मेरे हाथ में खुजली होने लगेगी। तो क्या हिंसा •ाी आर्थिक खुजली में आती है।''

झम्मन ने अपने गुस्से पर काबू पाते हुए कहा, ''जैसे तुझे समझने में सुविधा हो, वैसे समझता जा। इसके बाद मानसिक खुजली। मानसिक खुजली इंसान को तब होती है, जब वो किसी समस्या को सुलझाने का •ारसक प्रयास करता है। अपने देश में ऐसे लोगों की तादाद सबसे ज्यादा है। इसे दिमागी खुजली के नाम से •ाी जाना जाता है। जब कोई समस्या सुलझ जाती है, तो दिमागी खुजली अपने-आप मिट जाती है। इसके बाद नंबर आता है सामाजिक खुजली का। इससे पीड़ित व्यक्ति किसी काम का नहीं होता है। जिसे प्यार से पुकारा जाता है, न काम का, न काज का दुश्मन अनाज का।'' घसीटे बीच में बोल पड़ा, ''जैसे तुम। कल तुम्हारी अम्मा •ाी तो यही बोल रही थीं।''

झम्मन को गुस्सा तो आया, पर कड़वी दवा की तरह उसे निगलकर बात को जारी रखा, ''ऐसे इंसान के पास कोई काम नहीं होता है, तो उसे खुजली होती है कि फालतू में बैठने से पहले कुछ किया जाए। जैसे अपने गांव के चौकीदार को देख लो। उसके पास कुछ काम तो है नहीं। दिन•ार सोता रहता है और रात को •ाी। कल गांव के प्रधान से रोना रो रहा था कि हमारे पास अच्छी लाठी नहीं है। रात में पहरा देने के लिए लालटेन नहीं है। कैसे करें गांव की सुरक्षा? फिर क्या था, पड़ोस के गांव वालों ने सुन ली वो बात और होने लगी उनके दिमागी खुजली के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक खुजली। और तुम्हें तो पता है कि जब तक खुजली न मिटे, चैन नहीं पड़ता है। पिछले चार साल से चौकीदारी कर रहा है, तब न दिखी उसे गांव पर खतरा। अब जब प्रधान ने एक दिन उसकी जगह दूसरे चौकीदार को रखने की बात कही, तो गांव पर संकट आ गया। अब इस बात को लेकर गांव में राजनीतिक खुजली होने लगी है। अब तुम्हें राजनीतिक खुजली के बारे में बताने की जरूरत नहीं है। ये खुजली न तो क•ाी मिटी है और न ही क•ाी मिटेगी। अब चल जरा मेरी पीठ खुजा। बहुत खुजली हो रही है।'' झम्मन ने घसीटे से उम्मीद •ारे स्वर में कहा।

Saturday, 24 March 2012

बेरोजगारी की लट्ठमार होली



आसिफ इकबाल 

घसीटे गुस्से में ऐसे बड़बड़ाता चला जा रहा था, जैसे सीधे जाकर कोई नई क्रांति लिख देगा। वैसे घसीटे के लिए ये कोई नई बात नहीं थी, ये तो उसकी खानदानी आदत है। इसके पिता भी सामाजिक जंगी थे। सोशल सिस्टम से इतनी जंग लड़ी कि घर के सामानों में ज़ंग लग गई। बेचारे घसीटे के पिता लोटेलाल नई क्रांति लिखते-लिखते सरकारी अस्पताल के मृत्यु पंजीकरण रजिस्टर में अपना नाम लिखा बैठे। गए थे सरकारी अस्पताल की बदहाल व्यवस्था पर धरना देने, अस्पताल में पानी इतना भरा था कि पैर फिसला और खुद ही धरे रह गए। सिर पर टूटी दीवार का एक पत्थर लगा और उनके जिस्म की आक्सीजन बाहर आकर प्रदूषण बन गई। लगता है दिमाग की उसी चोट ने घसीटे के  दिमाग को प्रभावित कर रखा है। इसमें घसीटे को क्या दोष देना। चलो पूछा जाए आखिर माजरा क्या है जो घसीटे इतना गुस्सा है।


 ‘‘अरे घसीटे, क्यों भांप के इंजन की तरह हांफ रहे हो, आखिर माजरा क्या है मुझे भी तो बताओ?’’ घसीटे ने गुस्से से झम्मन की तरफ देखा और बोला, ‘‘देखो,  यार झम्मन एक तो वैसे भी मेरी चादर फटी पड़ी है और ऐसी फटी है कि उसकी रफू करने वाला कोई नहीं है। और तुम हो कि’’....झम्मन ने घसीटे के गुस्से को भांपते हुए अपने चेहरे को अपने जज्बातों से तुरंत डिस्कनेक्ट किया और गंभीर होकर पूछा, ‘‘आखिर बात क्या है? ’’ घसीटे: ‘‘क्या बताएं झम्मन, तुम्हें तो पता है कि मैंने कितनी मेहनत से पढ़ाई-लिखाई की, क्या-क्या नहीं किया डिग्री पाने के लिए। स्कूल में मस्टराइन की सब्जी लाता था, उनके बच्चे को सुसु कराता था। माट साब की साइकिल धोता था, राशन की लाइन में लगकर उनका मिट्टी का तेल भी मैं लाता था। दिन-दिन भर धोबी के गधे की तरह लगा रहता था और जब थोड़ा बहुत टाइम मिलता था, तो सो जाता था। पढ़ने का समय नहीं मिलता था फिर भी मैंने डिग्री हासिल कर ली। और इस डिग्री ने ऐसी गत बनाई कि पूरा बदन टूट रहा है।’’ झम्मन ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘घसीटे डिग्री का बदन टूटने से क्या ताल्लुक?’’ घसीटे ने चिल्लाते हुए कहा, ‘‘यार लगता है महंगाई बढ़ने से तुम्हारी रोटी के लाले पड़ गए हैं। तभी तुम फोकट में मेरा दिमाग खाकर अपना पेट भर रहे हो।’’ झम्मन ने माहौल को समझकर घसीटे को सम्मान देते हुए कहा, ‘‘घसीटे भाई, बात तो बताओ।’’ घसीटे: ‘‘क्या बताएं झम्मन, लखनऊ गए थे धरना-प्रदर्शन करने।’’ झम्मन: ‘‘फिर क्या हुआ?’’ घसीटे: ‘‘तो फिर होना क्या था, खेली गई लट्ठमार होली।’’


झम्मन: तो लखनऊ क्यों बोल रहे हो, लट्ठमार होली तो बरसाना में होती है!’’ घसीटे: तुम्हें तो पूरी कहानी निबंध में समझानी पड़ती है। अरे यार नौकरी के लिए कर रहे थे सरकार के खिलाफ धरना प्रदर्शन। तुम्हें तो पता है मैं अपने पिता से कितना प्रभावित हूं। मैं भी बढ़-चढ़कर अपनी आवाज माइक से बुलंद कर रहा था। फिर क्या था, चलवा दी सरकार ने पानी की बौछार के साथ लठ। बस फर्क इतना था कि होली के पानी में रंग होता है और ये पानी बेरंग होकर भी सरकार का रंग छोड़ रहा था। कोई कार के पीछे था, तो कोई दीवार फांदकर भाग रहा था। शहर को पानी की सप्लाई के लिए सरकार के पास पानी नहीं होता है, लेकिन जब हम गरीब आंदोलन करते हैं तो पता नहीं फालतू पानी बहाने के लिए कहां से आ जाता है। तुम्हें तो पता है कि मुझे पानी से कितना डर लगता है।


 इसी पानी की वजह से ही मेरे पिताजी खर्च हो गए थे। मैंने चिल्लाना शुरू कर दिया, जल ही जीवन है, जल ही जीवन है...जब इससे नहीं माने तो मैंने महात्मा गांधी की लाठी का सहारा लिया और भाषण देने लगा, महात्मा गांधी के पास भी तुम लोगों के जैसी लाठी थी, लेकिन उन्होंने हमेशा अंहिसा का पाठ पढ़ाया और तुम लोग इससे हिंसा फैला रहे हो। प्रशासन के लिए सरकार के आदेश से बड़ा कुछ नहीं होता है। सबने सोचा यही धरने का मुख्या नेता है. जमकर चली लाठी और खुलकर पड़ी बौछार, न पूर्व सरकार और न वर्तमान सरकार, अपने लिए तो सब बेकार, क्योंकि हम हैं  बेरोजगार, जो जिंदगी भर खाते रहेंगे सरकार की मार, अब चलता हूं यार, मां कर रही है घर में इंतजार’’...ये कहता हुआ घसीटे आगे बढ़ गया।

Friday, 16 March 2012

सुपरमैन न बैटमैन, सिर्फ कॉमनमैन



अरे दादा इतने परेशान क्यों दिख रहे हो? आखिर माजरा क्या है? क्या ममता दीदी ने वित्त मंत्री बदलने के लिए सरकरार  से सिफारिश की है? क्योंकि रेल बजट को पेश करने के बाद रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी के सिर पर तलवार लटक रही है। सुना है आपने भी ऐसा बजट पेश कर दिया कि लेने के देने पड़ गए। दादा ने माथे पर सवालिया निशान बनाते हुए पूछा: तुम्हें कैसे पता? झम्मनलाल: क्या बात करते हो दादा, नाम तो नहीं पता, लेकिन एक शायर ने क्या खूब कहा है कि इश्क और मुश्क छुपाए नहीं छुपते हैं। दादा: अब बजट से इश्क और मुश्क का क्या ताल्लुक? झम्मनलाल: हां, वो तो मुझे भी नहीं पता, लेकिन बोल दिया तो बोल दिया। और एक बार जो मैं बोल देता हूं तो....खैर छोड़िए आज सल्लू की वांटेड फिल्म देख ली, तो थोड़ा फिल्मी हो गया। जिस तरह आपने बजट पेश कर दिया तो कर दिया। अब चाहे वो किसी को समझ में आए या न आए। चलिए मजाक से हटकर बात करता हूं।

दरअसल जब मैं आपके पास आ रहा था तो मुझे एक कॉमनमैन मिला। बेचारा बड़ा दुखी था। दादा: अब ये कॉमनमैन कौन है? झम्मनलाल: अरे आप कॉमनमैन को नहीं जानते? दादा: नहीं, झम्मनलाल: लेव कर लेव बात। दुनिया में एक कॉमनमैन ही तो है, जो सुनने में लगता है कि ही-मैन, सुपरमैन, बैटमैन या स्पाइडरमैन की तरह बड़ा ताकतवर होगा, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। ये लोग तो संकट आने पर मोचक बन जाते हैं, लेकिन कॉमनमैन हमेशा संकट के लिए रोचक बन जाता है। संकट को कॉमनमैन काफी पसंद है। जब देखों तब कॉमनमैन के पीछे पड़ा रहता है। भौतिक सुख इसके लिए भूत की तरह होते हैं। अगर आपका कभी अपने वायुयान या मोटर कार से पैदल सड़क पर घूमने का इत्तेफाक पड़े, तो किसी भी राह चलते आदमी से बात कर लेना। उससे पूछना, कैसे हो भाई? वो बोलेगा: अब क्या बताएं कैसे हैं, इतनी कम इनकम में कैसे बच्चों की पढ़ाई लिखाई होगी, महंगाई ने कमर तोड़ रखी है। मतलब यह कि कॉमनमैन हमेशा रोता मिलेगा। परेशानी इसके दाएं और मुसीबत इसके बाएं खड़ी रहती है। आप बुरा मत मानना, हो सकता है ये सरकार को गाली भी दे दे। आप कॉमनमैन को क्या जानो। जब कुर्सी पर बैठने का समय आता है, तो ये बिना चश्मे के आपको स्टेचू आॅफ लिबर्टी की तरह दूर से दिखाई पड़ जाते हैं। लेकिन सत्ता का चश्मा लगने के बाद आपकी दूर और पास दोनों की नजर खराब हो जाती है। फिर तो आपको अपने दामन के दाग भी दिकाई नहीं देते। चलो अब कौन बनेगा करोड़पति खेलना बंद करता हूं और सवाल-जवाब पर विराम लगाते हुए बताता हूं कि ये कॉमनमैन कौन है। कॉमनमैन मतलब भटकती आत्मा और धरती का बोझ। दादा ने आश्चर्यचकित होकर पूछा: मतलब! झम्मनलाल हंसते हुए: हाहाहा...क्या बताएं दादा, मजाक की थोड़ी आदत मुझे पड़ गई है। कॉमनमैन को हिंदी में कहते हैं आम आदमी। इसकी ''आमदनी'' में न तो ये कभी आम खा पाता है और उधार की ''देनी'' हमेशा इसके साथ जुड़ी रहती है। जो देश में सबसे ज्यादा तादाद में होते हुए भी कुछ खास लोगों में आम बना रहता है। चुनिंदा लोगों को खास बनाने में ये बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है। और तो और खास बनाने के बाद अपनी परेशानी को भूलकर जश्न भी मनाता है। बिल्कुल उसी तरह से जैसे बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना। अब देखिए आपको भी तो इसने आम से खास बनाया है। शुक्र मनाइए कि आम आदमी की याद्दाश्त बहुत कमजोर होती है।

बड़ी जल्दी पिछली बातों को भूल जाती है। वरना आप भी अबतक खास से आम बन गए होते। सुना है आपने इसकी जेब काट ली। अब क्या ये भी काम शुरू कर दिया? दादा: किसने कहा यह? मैं क्यों किसी की जेब काटूंगा? झम्मनलाल: अरे ये मैं थोड़ी कह रहा हूं। ये तो बाहर एक कॉमनमैन चिल्लाता जा रहा था कि दादा बजट की अटैची में कैंची लेकर संसद भवन गए थे, जिससे कॉमनमैन की जेब काटी गई। इन्हीं बातों के दरमियां एक आदमी चिल्लाता निकला सचिन ने शतकों का शतक पूरा कर लिया, सचिन ने शतकों का शतक पूरा कर लिया...उस आदमी को देखकर झम्मनलाल बोला: चलो शुक्र है कि इस देश में रुलाने वालों के अलावा कुछ खास लोग खुशी देने वाले भी हैं...शुक्रिया सचिन

Friday, 9 March 2012

आवाम ने सपा को नहीं, अखिलेश को चुना है


स•ाी समीकरणों को धता बताते हुए समाजवादी पार्टी ने यूपी में पूर्णबहुमत से अपना परचम फहरा दिया। सपा की शानदार जीत और बसपा को मिली हार ने ये साबित कर दिया कि जनता को समझ पाना हर किसे के बस की बात नहीं। बसपा सुप्रीमों मायावती ने हार का ठीकरा पूरी तरह से कांग्रेस, •ााजपा, मीडिया और मुसलमान के ऊपर फोड़ा। जबकि सच्चाई तो ये है कि बसपा की हार की वजह खुद मायावती ही हैं। •ाले ही मायावती इनको कोस रही हों, लेकिन उत्तर प्रदेश की आवाम ने सपा को नहीं बल्कि युवा नेता अखिलेश यादव को वोट दिया है। सपा अपनी जीत पर जो इतना इतरा रही है, वो सिर्फ अखिलेश की मेहनती और बेदाग होना है। यूपी की आवाम ने समाजवादी पार्टी को नहीं, बल्कि अखिलेश यादव को वोट दिया है। क्योंकि जनता को किसी •ाी दल में ऐसा चेहरा नहीं दिखा, जो उनके प्रदेश के मुस्तकबिल को नई रौशनी दे सके। अखिलेश ही एकमात्र ऐसा चेहरा दिखा, जो •ा्रष्टाचार की कालिख से बेदाग था और जिसमें प्रदेश की आवाम से रूबरू होने की अजीब कला है।

चुनाव प्रचार के दौरान अखिलेश के बयानों में कोई •ाी ऐसी बात नहीं बोली गई, जिससे आवाम या चुनाव आयोग को कोई परेशानी हुई हो। इस बात से साफ जाहिर होता है कि अखिलेश ने कितनी कुशलता से एक परिपक्व नेता की मिसाल पेश की, जबकि सालों से राजनीति कर रहे उनसे दोगुनी उम्र के नेताओं को गलत बयानबाजी की वजह से मीडिया और चुनाव आयोग का कोप•ााजन बनना पड़ा। यहां तक कि मुलायम सिंह यादव को •ाी चुनाव प्रचार के दौरान गलत बयानबाजी की वजह से आवाम और चुनाव आयोग से माफी मांगनी पड़ी थी। राहुल गांधी को अखिलेश से बेहतर आंका जा रहा था। अखिलेश समझ चुके थे कि यदि जाति और धर्म के नाम पर सरकार बनती है, तो •ााजपा यूपी और देश में राज कर रही होती। पेट की •ाूख से बड़ी आवाम के लिए कोई चीज नहीं होती। जिस वजह से वो एक जमीनी कार्यकर्ता की तरह साइकिल से चलकर उत्तर प्रदेश की आावाम से मुखातिब हुए। देश •ार का मीडिया राहुल के ग्लैमर को कांग्रेस की जीत के रूप में देख रहा था। लेकिन राहुल •ाी राजनीति के खेल में कच्चे निकले और सरेआम सपा के घोषणापत्र को फाड़कर उन्होंने राजनीतिक समझ का बखूबी परिचय दे दिया। अखिलेश के बयानों में उत्तर प्रदेश के विकास के सिवा कुछ नहीं था, जबकि अन्य दलों ने जाति और धर्म के नीम पर आवाम को अपने हक में करना चाहा। मुलायम सिंह को अखिलेश पर पूरा •ारोसा था, इसलिए उन्होंने क•ाी •ाी उनकी बात को नहीं टाला। यहां तक कि विधानस•ाा चुनाव में टिकट के बंटवारे से लेकर दागियों को बाहर करने के फैसले पर •ाी उन्होंने पूरी तरह से चुप्पी साधे रखी और अपने चहेते साथी आजम खान के गुस्से का शिकार हुए। अखिलेश का चुनावी एजेंडा पहले से ही साफ था। इसका नमूना उन्होंने दागी नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाकर दे दिया था। सपा की गुंडाराज की छवि को बदलना उनका पहला मकसद था। सपा की जीत में अन्ना के •ा्रष्टाचार के खिलाफ जारी आंदोलन को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। अन्ना ने जो आंदोलन चला रखा है, उसका गहरा असर देश की जनता पर है। पिछले कुछ महीनों में •ा्रष्टाचार विरोध की जो आंधी चली, उसने देश के नौजवान से लेकर बूढ़े तक को सत्ता बदलने पर मजबूर कर दिया। जहां मायावती मीडिया और मुसलमानों को सपा की जीत और बसपा की हार का जिम्मेदार ठहरा रही हैं, वो पूरी तरह से गलत है।
 मीडिया ने पूरी तरह से राहुल गांधी की जमकर पब्ल्सिटी की। प्रियंका के चेहरे से कैमरा नहीं हटा। यहां तक कि उनके पति रॉबर्ट वाड्रा को •ाी •ाविष्य में यूपी के तारणहार के रूप में पेश कर दिया। रही बात अन्य लोगों की, तो मायावती अपने पिछले कार्यकाल को रिवर्स करके गौर फरमाएं तो उन्हें •ा्रष्टाचार और हत्याओं की तस्वीर साफ नजर आएगी। आवाम ने सपा को जिताया नहीं, बल्कि •ा्रष्टाचार को हराया है। पूरे उत्तर प्रदेश में खड़ी हाथियों व बसपा सुप्रीमों की मूर्तियां और एनआरएचएम घोटाला चीख-चीखकर •ा्रष्टाचार की गवाही दे रहा है। मुस्लिम वोट तो वैसे •ाी सपा का पारंपरिक वोट रहा है। जैसा कि कयास लगाए जा रहे हैं कि यूपी विधानस•ाा चुनाव ही लोकस•ाा चुनाव 2014 तस्वीर को संवारेंगे, एकदम सही है। •ा्रष्टाचार मुद्दे ने काम करना शुरू कर दिया है। लोगों को एक ऐसे नेता की तलाश है, जो पूरी तरह से पाक-साफ हो। और इसी का नतीजा है कि आवाम ने सपा को नहीं, अखिलेश को वोट दिया है। आवाम को सपा से नहीं, बल्कि अखिलेश से उम्मीदें हैं। इस जीत से सपा को खुशफहमी में रहने की जरूरत नहीं है। अगर आवाम ने उन्हें जिताया है, तो उसे अपनी गुंडाराज की छवि बदलकर, लोगों को यूपी को एक बेहतर प्रदेश की तस्वीर दिखानी होगी। सपा के पास यूपी में आगे •ाी राज करने का सुनहरा मौका है, उसके लिए उसे अखिलेश की सोच पर काम करना होगा।

Wednesday, 7 March 2012

मुर्गी नहीं, कुर्सी छीन ली


झम्मनलाल अपनी खचाड़ा साइकिल में बैठकर बाजार जा रहे थे कि अचानक उनकी नजर नुक्कड़ में उदास बैठी बहनजी पर पड़ी।  झम्मनलाल से रहा नहीं गया और वो पूछ बैठा, ''अरे बहनजी इतनी उदास क्यों बैठी हो? तुम्हारे चेहरे पर हमेशा हंसी की लाली रहती थी। वो कहां गुम हो गई। क्या मुंबई से सैंडल लेकर अ•ाी तक विशेष विमान नहीं आया क्या? ईरान ने पेट्रोल महंगा कर रखा है, कहीं रास्ते में विमान का ईंधन तो नहीं खत्म हो गया। आखिर माजरा क्या है? चेहरे पर क्यों उदासी छाई है, क्या तुम्हारी किसी ने मुर्गी चुराई है?''

 बहनजी ने उदासी •ारे लहजे में कहा, ''क्यों मजाक करते हो चाचा? किसी ने मेरी मुर्गी नहीं, बल्कि मेरी कुर्सी छीन ली है। क्या-क्या नहीं किया था, उस कुर्सी के लिए। कई लोगों को पकड़कर इंजीनियरों की एक टीम बनाई। इन्हीं इंजीनियरों ने खून-पसीना एक करके या ये कहें कि लोगों का खून पीकर इस कुर्सी को तैयार किया। जब ये कुर्सी बनकर तैयार हुई, तो सालों तक इसके न टूटने की गारंटी दी गई। पर पता नहीं कुर्सी को किसकी नजर लग गई। मैंने सोचा चलो कुछ विकास किया जाए। तेजी से विलुप्त हो रहे हाथियों को संरक्षित करने के लिए उनकी मूर्तियां खड़ी करवाईं, सोचा कि आने वाली नस्ले डायनासोर की तरह हाथियों को •ाी याद रखेंगी, लेकिन यहां के लोगों को •ाविष्य की बिल्कुल चिंता नहीं है।''

 झम्मनलाल, ''लगता है आपकी कुर्सी छीनने में इन हाथियों का बहुत बड़ा हाथ है। इन्हीं हाथियों ने तुम्हारी लुटिया डुबा दी। अरे कितना पैसा लगाया तुमने हाथियों की फौज खड़ी करने में, कितने नाजों से पाला इन्हें, दुनिया जमाने से बैर लिया, लेकिन सिला क्या मिला, छिनवा दी न कुर्सी। मैंने तो पहले ही कहा था कि कुत्ता पालो, बिल्ली पालो, घोड़ा पालो, रट्टू तोता यानी मिट्ठू बेटा पालों। क्योंकि ये सब वफादार प्राणी होते हैं। पर तुमने तो गलतफहमी के साथ-साथ हाथी पाल लिए। यहां राजेश खन्ना की फिल्म हाथी मेरा साथ थोड़ी चल रही है कि हाथी पे हाथी की फौज खड़ी करती चली जा रही हो। जितना पैसा नकली हाथियों पर खर्च कर दिया, उतना अगर असली हाथियों पर करतीं तो जिंदगी •ार उसी में बैठकर चुनावी प्रचार करतीं। इससे चुनाव प्रचार का खर्च •ाी बचता और हाथी •ाी संरक्षित हो जाते। अब जिसकी कुर्सी उसके हाथी। मुझे तो डर है कि अब बेचारे हाथियों का क्या होगा। तुमने अपनी •ाी तो मूर्तियां लगवाई हैं, क्या तुम्हें •ाी संरक्षण की आवश्यकता है? तुम्हें •ाी •ाविष्य में लोग टिकट खरीदकर देखने आएंगे। और तुम कुछ ज्यादा ही बोलती हो। दुनिया•ार में हाथियों की कीमत बढ़ाकर बताने की क्या जरूरत थी? खुला हाथी लाख का, ढंका हाथी सवा लाख का। अरे ये कंगाल लोग क्या जाने रुपये की अहमियत। लाख के सवा लाख ही तो किए थे, बताइए कुर्सी ही छिनवा दी।'' बहनजी, ''अरे झम्मनलाल, मेरे सिर पर हाथ रख।''

झम्मनलाल, ''अब कौन सी कसम खिलाने वाली हो सिर पर हाथ रखवाकर?, मैं अपना वोट दे चुका हूं।'' ''अरे नहीं, जरा मेरे माथे पर हाथ रखकर देख, कहीं बुखार तो नहीं है मुझे? झम्मनलाल, '' बहनजी तुम्हें तो बहुत तेज बुखार है। लगता है तुमने कुर्सी छिनने की घटना दिल पर ले ली है। चलो हकीम साहब के पास, देसी जड़ीबूटी की दवा दिलवा देता हूं। '' बहनजी, ''नहीं, मुझे हॉस्पिटल ले चलों।''

झम्मनलाल, ''इसके लिए तो सरकारी अस्पताल जाना पड़ेगा और मुझे वहां जाकर अपनी शामत थोड़ी बुलवानी है। वहां सुना है डॉक्टर नहीं, सीबीआई वाले सबका आॅपरेशन कर रहे हैं। पता चला है कि वहां के कई डॉक्टरों ने इतनी दवाई खा ली कि दुनिया से रुखसत हो गए। और ये दवा किसने खिलाई उसको ढूंढ रहे हैं। बहनजी, '' तो झम्मन, जहां तू चाहे मुझे ले चल।''

झम्मनलाल, '' ले तो चलूंगा, पर मेरे पास तो •ाई साइकिल है और इसमें तुम बैठोगी नहीं।'' बहनजी, '' अरे झम्मन, मुसीबत में तू किसी में •ाी बैठाएगा तो बैठ जाऊंगी, पर मुझे यहां से ले चल।''