www.hamarivani.com

Sunday, 5 November 2017

किसी के घर उजाले ही उजाले हैं

किसी के घर उजाले ही उजाले हैं
किसी की छत तले अंधेरे काले हैं
ये कैसी तक्सीमात तेरी मौला
किसे के पैर हवाओं में 
किसे के पैर में छाले हैं

भूख से सिसकती है ज़िंदगी कहीं
कहीं थाली में शाही निवाले हैं
किसी के महलों में बिखरी रौनक
कहीं खंडहर में मकड़ियों जाले हैं

ग़म बचकर निकलते हैं कहीं
कहीं मुस्तकिल डेरा डाले हैं
ख़रीद ली जाती हैं सांसें कहीं
कहीं ज़िंदगी मौत के हवाले है

फटे लिबास हैं शौक कहीं
कहीं बदन पे चुनरी के लाले हैं
'अरमान' हो रहे हैं पूरे कहीं
कहीं ना-उम्मीदी के नाले हैं

देख रहा है तो इंसाफ़ कर मौला
क्यों ख़ामख़ा में दुनिया संभाले है...

Saturday, 4 November 2017

सवाल का ही तो सवाल है

सवाल का ही तो सवाल है,
सवाल पर ही बवाल है
जवाब नहीं,पर सवाल है
सवाल पर वो लाल है
सवाल का नहीं ख़याल है
सवाल जी का जंजाल है
सवाल से बुरा हाल है
सवाल पर मलाल है
जब किसी ने पूछा सवाल है
सवाल पर उठा दिया सवाल है
'अरमान' का भी एक सवाल है
उठे क्यों इतने यहां सवाल हैं...


सियाह रात में रौशनी जलाएं तो जलाएं कैसे

सियाह रात में रौशनी जलाएं तो जलाएं कैसे
बेचैन से दिल को बहलाएं तो बहलाएं कैसे
नींद ने मोड़ ली हैं इस गली से नज़रें
हो गईं पत्थर आंखें सुलाएं तो सुलाएं कैसे

हर तरफ सुकून ओ ख़ामोशी है छाई
तेरी याद मुझे फिर छेड़ने है आई
बड़ी नादां है समझाएं तो समझाएं कैसे
सियाह रात में रौशनी जलाएं तो जलाएं कैसे

चलो आसमां को भी परेशां किया जाए
रात को भी चांद से जुदा किया जाए
तारों को ज़मीं पर बुलाएं तो बुलाएं कैसे
सियाह रात में रौशनी जलाएं तो जलाएं कैसे

कोई बाज़ार हो तो बताना ज़रा
कोई क़ीमत हो तो लगाना ज़रा
'अरमान' की बोली लगाएं तो लगाएं कैसे
सियाह रात में रौशनी जलाएं तो जलाएं कैसे...

#अरमान

Tuesday, 29 August 2017

न जाने क्या चाहता है ये दिल

न जाने क्या चाहता है ये दिल
जिद करता है, मचलता है, मजबूर करता है

कितना भी रोकने की कोशिश करूं
तेरी ओर ख़्यालों के क़दम बढ़ जाते हैं

तुम्हारी आंखों, तुम्हारी बातों ने
जैसे कोई साज़िश की हो 'अरमान'

वरना ये मौसम ख़ामख़ाह नहीं बदलता
बेवजह नहीं छा जाते ख्वाबों के बादल

पलकों की टहनी में झूलते हुए ख़्वाब
सोचता हूं पत्थर मारके गिरा लूं इन्हें

पर डरता हूं कहीं टूटकर बिखर न जाएं
ये झूलते हुए ही अच्छे लगते हैं,
पलकों की टहनी पर...

Saturday, 17 June 2017

आओ ज़रा मिलकर ख़ुशियां ढूंढते हैं

आओ ज़रा मिलकर ख़ुशियां ढूंढते हैं
तुम इधर देखो, मैं उधर देखता हूं
यहीं कहीं आसपास होंगीं
बस नज़र ही तो नहीं आतीं
बिखरी-बिखरी सी मिलती हैं ये
एकमुश्त कभी नहीं दिखतीं
कितनी भी मिलें उठा लेना
दोनों की मिलाकर बड़ी कर लेंगे
ज़रा एहतिहात से थामना 
हाथ से फिसलते देर नहीं लगती
जितनी जल्दी हो सके
मल लेना तन-बदन में
वक़्त के साथ इनका बड़ा याराना है
वक़्त आएगा और इन्हें ले जाएगा
गर न मिले तो बिल्कुल मत घबराना
एक-दूसरे को ही अपनी ख़ुशी बनाना

तन्हाइयों ने कुछ इस क़दर जगह बना ली है

तन्हाइयों ने कुछ इस क़दर जगह बना ली है
आइने में अक्स देखूं तो आइना भी ख़ाली है

गिला किससे करें किससे करें शिकवा
मोहब्बत ने ये अजीब सी आदत डाली है

शिकार करती हैं मुझे दिन रात तेरी यादें
बड़े नाज़ों से मैंने जी जान से जो पाली हैं

वजूद अपना तो पहले ही खो चुके थे हम
फिर किस बात की ये दुश्मनी निकाली है

अंधेरा घना है, आओगे लौट के इक दिन
बस इस उम्मीद से रौशनी जला ली है

देखकर हैरान न हो जाना हमारी महफ़िल को
चांद-तारों से सजी क़ायनात बुला ली है

कोई बेवजह की चीज़ नहीं मेरे 'अरमान'
बड़ी हसरतों से तेरी चाहतें संभाली हैं....

Friday, 9 June 2017

तेरा चेहरा है या कोई मर्ज़ की शिफ़ा

तेरा चेहरा है या कोई शिफ़ा

देखते ही रंगत बदल जाती है

तेरा चेहरा है या कोई मर्ज़ की शिफ़ा

देखते ही मिज़ाज की रंगत बदल जाती है

झील सी आंखे हैं या कोई समंदर

डूबने को तबियत मचल जाती है

सुकुन मिलता है तुझे देखकर कुछ ऐसे

जैसे तपते रेत पे सर्द हवा चल जाती है

न कोई चर्चा तेरा न कोई ज़िक्र तेरा

न जाने क्यों तेरी फिर बात निकल आती है

सोचता हूं छुपा लूं इस ज़माने से तुझे

ये दुनिया है, बात-बात पे बदल जाती है

भले मिले न मिले एक पल का साथ तेरा

इन ख़्यालों से सुबह-शाम ढल जाती है

ज़मीं पे रहता है एक चांद और भी

अक्सर सितारों में भी बात चल जाती है

किसी हूर के नूर की क्या बात करें

तेरी आब देखके शमा भी जल जाती है

अरमान है बरकार रहे तेरे चेहरे की रौनक

हर दुआ,  इसी दुआ में बदल जाती है...