अन्ना हजारे जन्म 15 जून। अरविंद केजरीवाल, जन्म 16 जून। अ अक्षर से शुरू होने वाले इन दो नामों की जन्मतिथि की निकटता के अलावा अ शब्द से ही शुरू होता है आंदोलन। अन्ना, अरविंद और आंदोलन अब एक दूसरे के पूरक हो गए हैं। देश में कहने को तो सवा अरब से ज्यादा लोग रहते हैं, लेकिन सिर्फ ये दो नाम ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुनाई दे रहे हैं। जो काम विपक्ष को करना चाहिए , वो काम 75 साल के अन्ना और 44 साल के अरविंद कर रहे हैं। कुछ तो बात होगी इन बंदों में जिसकी वजह से प्रतिष्ठित पत्रिका टाइम ने दुनिया के प्रभावशाली लोगों में भारत से सिर्फ अरविंद केजरीवाल को ही चुना। अमेरिका के वार्टन इंडिया इकोनॉमिक फोरम ने लेक्चर के लिए केजरीवाल को आमंत्रित किया। भले ही सरकार को भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन कर रहे अन्ना हजारे गलत नजर आ रहे हों, लेकिन यही भारत सरकार उन्हें पद्मश्री व पद्म भूषण सम्मान से नवाज चुकी है। दरअसल मौजूदा हालात में सरकार अन्ना और केजरीवाल से पूरी तरह घबराई हुई नजर आ रही है।
23 मार्च से दिल्ली में बिजली-पानी के बढ़े बिल के खिलाफ केजरीवाल सविनय अवज्ञा आंदोलन कर रहे हैं। दिल्ली सरकार भले ही इसे 'फ्लॉप शो' मान रही हो, लेकिन लगभग आठ लाख लोगों का इस आंदोलन से जुड़ना व पौने तीन सौ आॅटो रिक्शा में आठ लाख चिट्ठियां ले जाया जाना इस बात की गवाही देता है कि दिन ब दिन सरकार की मुसीबतें बढ़ती जा रही हैं। इसी
क्रम में दिल्ली पुलिस का इन आंदोलनकारियों को गुमराह करके शीला दीक्षित के निवास से दूर करना ये दर्शाता है कि सरकार केजरीवाल से दहशत में है। केजरीवाल ने जिस अंदाज में शीला दीक्षित को चुनौती देते हुए कहा कि सरकार उन्हें रोकने की कोशिश न करे, शायद सरकार को ये नहीं पता कि हम किस मिट्टी के बने हुए हैं, उससे तो यही लगता है कि वो किसी भी तरह के समझौते के मूड में नहीं हैं। दिल्ली सरकार भी अब दोराहे पर खड़ी है, अगर केजरीवाल की बातों को मान लिया गया, तो दिल्ली की जनता की सहानुभूति उनकी आम आदमी पार्टी को मिलेगी, जो दिल्ली में कांग्रेस को नुकसान पहुंचा सकती है। दूसरी ओर, यदि आंदोलन के दौरान केजरीवाल को कुछ हो गया तब भी सरकार मुसीबत में पड़ सकती है। दूसरी ओर अन्ना ने भी भ्रष्टाचार विरोधी जनआंदोलन के तहत पंजाब से देशव्यापी जनतंत्र यात्रा शुरू कर दी है।
यह यात्रा भी केंद्र व राज्य सरकारों के लिए मुसीबत बन सकती है और इतिहास गवाह है कि जो आंदोलन अन्ना ने चलाए हैं, उनमें चाहे राज्य हो या केन्द्र सरकार, दोनों को झुकना पड़ा है, चाहे 1991 का महाराष्ट्र भ्रष्टाचार विरोधी जन आंदोलन हो या सूचना का अधिकार कानून। बहरहाल, सरकार लोकसभा चुनाव से पहले अन्ना व केजरीवाल को कोई भी ऐसा मौका देना नहीं चाहती कि इसका असर उनकी सत्ता की दावेदारी पर पड़े। दूसरी ओर इन दो योद्धाओं ने देश की राजनीतिज्ञों से अकेले ही लड़ने का एक बार फिर मन बना लिया है।
Tuesday, 2 April 2013
Friday, 15 March 2013
मजबूत इरादों की जरूरत
पाकिस्तानी सेना के जवानों ने भारतीय जवानों के सिर काट लिए, श्रीलंका ने भारतीय मछुआरों को कैद कर लिया, चीन का भारत पर साइबर अटैक और सैंकड़ों मील जमीन पर कब्जा करना, नेपाल के रास्ते भारत में हो रहा आतंकियों का प्रवेश, सीमा जमीन समझौते के तहत बांग्लादेश का 600 एकड़ भारतीय जमीन हथियाना, मछुआरों की हत्या के गुनाहगार इटली के मरीन्स का अपने देश में जाकर बैठ जाना और फिर इटली के राजदूत का माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश को न मानना, दर्शाता है कि विश्व पटल पर हमारे देश की क्या छवि बन रही है। पहले तो हमारे पड़ोसी देश ही गीदड़ भभकी देते थे, लेकिन अब इटली भी भारत को एक कमजोर देश की नजर से देख रहा है। सवाल यहां यह नहीं उठता है कि भारत का प्रधानमंत्री या राजनीति कैसी है, सवाल ये है कि हम समय के साथ क्यों नहीं चल रहे हैं।
हमारे अंतरराष्ट्रीय संबंध कैसे हैं? क्या तेजी से बनते महाशक्ति भारत को सोची समझी साजिश के तहत विश्व समुदाय कमजोर करना चाहता है। यहां तक कि अफजल की फांसी पर कश्मीरी अलगाववादी नेता यासीन मलिक पाकिस्तान में धरने पर बैठ जाते हैं और हमारे हुक्मरानों की इतनी हिम्मत नहीं होती कि उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सके। भारत के अपने पड़ोसी देश नेपाल से बेहतर संबंध माने जाते हैं, लेकिन माओवादी सरकार आते ही चीन के इशारे पर भारत विरोधी लहर मुखर होने लगती है। बिना पासपोर्ट के कोई भी पाकिस्तानी आतंकवादी भारत में आराम से दाखिल हो सकता है। आखिर नेपाल से आने-जाने पर हम बंदिश क्यों नहीं लगा सकते हैं।
आज भारत को उन छोटे-छोटे देशों से सबक लेना चाहिए जो तमाम प्रतिबंधों को झेलते हुए अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंडता को बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। जिस प्रकार से वर्तमान में दुनिया चल रही है, भारत को उसी प्रकार से चलना होगा। ईरान व उत्तरी कोरिया जैसे छोटे-छोटे देश अमेरिका की दादागीरी का जवाब उसी की भाषा में दे रहे हैं। इराक को तहस-नहस करने वाला अमेरिका भले ही ईरान व उत्तरी कोरिया पर हमले के लिए विश्व समुदाय को अपनी तरफ खींचने का प्रयास कर रहा हो, पर किसी भी तरह का हमला करने के लिए उसकी हिम्मत नहीं पड़ रही है। वजह ये है कि खुलेआम ईरान और उत्तरी कोरिया की सरकारें अमेरिका को ललकारने में पीछे नहीं हटती हैं। भारत को भी इन छोटे देशों से सबक लेते हुए अपने पड़ोसी देशों को सबक सिखाना चाहिए। भारत को डिफेंसिव नहीं, बल्कि अटैकिंग बनना पड़ेगा। हमें पहले उनके सैनिकों के सिर काटने पड़ेंगे, हमें उनकी जमीन पर पहले कब्जा करना होगा, दक्षिण एशिया में हमारी दबंगई चलनी चाहिए, क्योंकि भारत इन देशों में सबसे बड़ा और शक्तिशाली है।
अरबों रुपये क्यों खर्च होते हैं देश की सुरक्षा पर, क्यों विदेशी हथियार और हेलीकॉप्टर खरीदे जाते हैं? इनका पूरी तरह से इस्तेमाल होना चाहिए। इन्हें शो पीस बनाकर देश में न रखा जाए। आज उन देशों की ओर किसी भी देश की आंख उठाने की हिम्मत नहीं होती, जो दबंगई के बल पर अपनी सशक्त छवि दुनिया में बनाए हुए हैं। 1971 के युद्ध में भारत कहीं ज्यादा गरीब और कमजोर था, लेकिन मजबूत इरादों की धनी इंदिरा गांधी ने अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन को पाकिस्तान के समर्थन के खिलाफ खुली चुनौती दे डाली थी ौर अमेरिका हाथ मलता रह गया था।
Thursday, 21 February 2013
उसके हाथों में तकदीर किसकी थी
अगर मेरेहाथों में उसकी तकदीर लिखी थी
तो उसके हाथों में तकदीर किसकी थी
मोहब्बत से भरे दो दिलों को जोड़ न पाई
उल्फत से बनी वोह ज़ंजीर किसकी थी
मतलब समझ में आ रहा है हर एक बहाने का
तुम्हे तो दर भी नहीं था नफरत -ए-ज़माने का
उन बेमतलब खूबसूरत लम्हों की तस्वीर किसकी थी
ज़रा ज़रा सी बात पर नाराज़ हो जाते थे
छोटी सी चोंट पर परेशां हो जाते थे
मेरे ज़ख्मों पर चलाई शमशीर किसकी थी
कहाँ ले जाऊं दिले नादाँ को
फूँक देना चाहता हूँ इस जहाँ को
बेवजह क्यूँ पाली पीर उसकी थी
कसमे वादे शीशे की तरह तोड़ देना
साथ चलते चलते रुख मोड़ लेना
'अरमान' कुछ ऐसी ही नजीर उसकी थी
अरमान आसिफ इकबाल
Thursday, 14 February 2013
इश्क के इम्तेहान से डरते हैं
उस चौखट को देखें जहां हजारों दम निकलते हैं
जरा कमजोर हैं तालीम-ए-मोहब्बत में अरमान
बस यही सोचकर तो इश्क के इम्तेहान से डरते हैं
मन लगाकर पढ़ा है उसकी आंखों को
जेहन में रखा है उसकी बातों को
उसकी आदतों की भी नकल दिन रात करते हैं
बस यही सोचकर तो इश्क के इम्तेहान से डरते हैं
बस्ते में पड़ी रहती है हर पल की किताबढूंढते रहते हैं उसमें हर सवाल का जवाब
पन्नों के मुह से भी कहीं अल्फाज निकलते हैं
बस यही सोचकर तो इश्क के इम्तेहान से डरते हैं
इस मदरसे में उल्फत का उस्ताद कोई नहीं
जो लिख दिया, जो पढ़ लिया बस वही सही
यहां से नाकामी की डिग्रियां लेकर ही सब निकलते हैं
बस यही सोचकर तो इश्क के इम्तेहान से डरते हैं।।।
- अरमान आसिफ इकबाल
Tuesday, 12 February 2013
एक नजम लिखते हैं
चलो हम तुम मिलकर एक नजम लिखते हैं
शब के कोयले से दीवार-ए-वादों पर कसम लिखते हैं
वक्त की बारिश भी धो न पाये इस इबारत को
कुछ ऐसी ही त्वारीख इस जनम लिखते हैं
फलक से समेट लेते हैं चांद तारों को
हर एक पर नाम-ए-सनम लिखते हैं
ख्वाहिशों की पतंग खूब ढील देके तानो
ऐसे खुले आसमान किस्मत से कम मिलते हैं
अश्कों को डाल आएं गहरे समंदर में
गमों के दरिया भी जाकर वहीं मिलते हैं
वफाओं की पोशाक से होगी हिफाजत हमारी
इश्क की वादी में मौसम भी रुख बदलते हैं
कहीं कलम न हो जाए मोहब्बत से खाली अरमान
यही तो सोचकर जवाब में नफरतें कम लिखते हैं
- अरमान आसिफ इकबाल
Monday, 11 February 2013
कुंभ हादसा
चंद घंटों पहले माहौल में श्रद्धा का उद्घोष था
हुक्मरानों की कमी से अब कोई हलाक तो कोई बेहोश था
नन्हा बच्चा अपनी मृत मां को जगा रहा था
एक सभ्य पेशेवर तबका इससे अपनी रेटिंग बढ़ा रहा था
पुलिस हादसे की कड़ी से कड़ी खोज रही थी
बद्इंतजामी से मासूम जिंदगिंया दम तोड़ रही थीं
सुरक्षा के नाम पर हथियार डाल रहे थे
पीड़ितों को मुआवजा देकर बात टाल रहे थे
हम तो मुफलिसी में भी कुंभ नहाकर दुनिया छोड़ जाएंगे
अपने पाप धोने को हुक्मरान कब गंगा में डुबकी लगाएंगे।।।
- अरमान आसिफ इकबाल
Thursday, 7 February 2013
मोहब्बत की राह को कुछ इस तरह गुलज़ार करते हैं
अनजानी मंजिल को ख्वाबों से तैयार करते हैं
भले वो फेर लें हमे देखकर मुह अपना
हम तो उनकी बेरुखी से भी प्यार करते हैं
पता चला है के वो शरमों -ओ -हया के हैं कायल
वरना हम भी दिल -ए -ख्वाहिशें हज़ार रखते है
रुख से ज़रा नकाब आहिस्ता से हटाना
ज़मानेवाले भी दिल बेकरार रखते हैं
यकीं न आये तो किसी से ये पूछ लो जाकर
भला जवाब भी कभी खुद सवाल करते हैं
सीख रहा हूँ उल्फत के दाँव -पेच 'अरमान'
नाज़ुक 'गुलाब' ही काँटों से वार करते हैं ...अरमान आसिफ इकबाल
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