Tuesday, 29 August 2017

न जाने क्या चाहता है ये दिल

न जाने क्या चाहता है ये दिल
जिद करता है, मचलता है, मजबूर करता है

कितना भी रोकने की कोशिश करूं
तेरी ओर ख़्यालों के क़दम बढ़ जाते हैं

तुम्हारी आंखों, तुम्हारी बातों ने
जैसे कोई साज़िश की हो 'अरमान'

वरना ये मौसम ख़ामख़ाह नहीं बदलता
बेवजह नहीं छा जाते ख्वाबों के बादल

पलकों की टहनी में झूलते हुए ख़्वाब
सोचता हूं पत्थर मारके गिरा लूं इन्हें

पर डरता हूं कहीं टूटकर बिखर न जाएं
ये झूलते हुए ही अच्छे लगते हैं,
पलकों की टहनी पर...

Saturday, 17 June 2017

आओ ज़रा मिलकर ख़ुशियां ढूंढते हैं

आओ ज़रा मिलकर ख़ुशियां ढूंढते हैं
तुम इधर देखो, मैं उधर देखता हूं
यहीं कहीं आसपास होंगीं
बस नज़र ही तो नहीं आतीं
बिखरी-बिखरी सी मिलती हैं ये
एकमुश्त कभी नहीं दिखतीं
कितनी भी मिलें उठा लेना
दोनों की मिलाकर बड़ी कर लेंगे
ज़रा एहतिहात से थामना 
हाथ से फिसलते देर नहीं लगती
जितनी जल्दी हो सके
मल लेना तन-बदन में
वक़्त के साथ इनका बड़ा याराना है
वक़्त आएगा और इन्हें ले जाएगा
गर न मिले तो बिल्कुल मत घबराना
एक-दूसरे को ही अपनी ख़ुशी बनाना

तन्हाइयों ने कुछ इस क़दर जगह बना ली है

तन्हाइयों ने कुछ इस क़दर जगह बना ली है
आइने में अक्स देखूं तो आइना भी ख़ाली है

गिला किससे करें किससे करें शिकवा
मोहब्बत ने ये अजीब सी आदत डाली है

शिकार करती हैं मुझे दिन रात तेरी यादें
बड़े नाज़ों से मैंने जी जान से जो पाली हैं

वजूद अपना तो पहले ही खो चुके थे हम
फिर किस बात की ये दुश्मनी निकाली है

अंधेरा घना है, आओगे लौट के इक दिन
बस इस उम्मीद से रौशनी जला ली है

देखकर हैरान न हो जाना हमारी महफ़िल को
चांद-तारों से सजी क़ायनात बुला ली है

कोई बेवजह की चीज़ नहीं मेरे 'अरमान'
बड़ी हसरतों से तेरी चाहतें संभाली हैं....

Friday, 9 June 2017

तेरा चेहरा है या कोई मर्ज़ की शिफ़ा

तेरा चेहरा है या कोई शिफ़ा

देखते ही रंगत बदल जाती है

तेरा चेहरा है या कोई मर्ज़ की शिफ़ा

देखते ही मिज़ाज की रंगत बदल जाती है

झील सी आंखे हैं या कोई समंदर

डूबने को तबियत मचल जाती है

सुकुन मिलता है तुझे देखकर कुछ ऐसे

जैसे तपते रेत पे सर्द हवा चल जाती है

न कोई चर्चा तेरा न कोई ज़िक्र तेरा

न जाने क्यों तेरी फिर बात निकल आती है

सोचता हूं छुपा लूं इस ज़माने से तुझे

ये दुनिया है, बात-बात पे बदल जाती है

भले मिले न मिले एक पल का साथ तेरा

इन ख़्यालों से सुबह-शाम ढल जाती है

ज़मीं पे रहता है एक चांद और भी

अक्सर सितारों में भी बात चल जाती है

किसी हूर के नूर की क्या बात करें

तेरी आब देखके शमा भी जल जाती है

अरमान है बरकार रहे तेरे चेहरे की रौनक

हर दुआ,  इसी दुआ में बदल जाती है...

Thursday, 11 May 2017

ख़्वाब का क्या... ख़्वाब हैं

ख़्वाब का क्या... ख़्वाब हैं
 चलो आज बिखरे हुए ख्वाब इकट्ठे किए जाएं
कुछ टूटे, कुछ फूटे,कुछ चकनाचूर ख़्वाब
जो कभी देखे थे बंद और खुली आंखों से
 समेट कर उनमें से कुछ काम के निकाले जाएं

कुछ अधूरे हैं, कुछ धुंधले हैं
कुछ ज़रा से रह गए पूरे होने को
 फिर झाड़ पोछ के इन्हें देखा जाए
शायद एक आध हों ऐसे
जिनको मंज़िल तक पहुंचाया जाए

उम्मीद कम है किसी के सलामत होने की
मेहनत का रंग तो आज भी वैसा है
पर वक्त का मिजाज़॒ रंगीन किया जाए

ख़्वाब का काम ही है टूटकर बिखर जाना
और चुभते रहना हमेशा-हमेशा के लिए
आंखों में
'अरमान' हैं जो हार नहीं मानते इनके बिखरने से
और समेट लेते हैं इन्हें दोबारा फिर टूटने के लिए...
..........अरमान.....

Monday, 8 May 2017

कभी कभी सोचता हूं...

कभी कभी सोचता हूं
कई चीज़े बेअसर बेज़ार हो गई हैं
कोई मोल नहीं रहा इनका
बेवजह से लगने लगीं हैं

एक ज॒ज़्बात हैं जो किसी काम के नहीं
लेकिन फिर भी मचलते हैं
रोज़ क़त्ल करता हूं
पर बड़ी बेशर्मी से ज़िंदा हो जाते हैं
मानों किसी ने कसम दी हो न मरने की

कुछ बेहिसाब ख़याल भी हैं
बेहयाई के साथ मंडराते हैं
चील की तरह नोचने के लिए
बेजान से जिस्म को

सुकून भी इनसे कुछ कम नहीं
होता है कहीं आसपास मौजूद
लेकिन कभी मिलता नहीं
मुद्दत हुई मुलाकात हुए

हां मोहब्बत को कई बार बोला है
कि अब तो चली जाओ
कि तुम्हारा पुरसाहाल लेने वाला कोई नहीं
मगर क्या करूं ऐसी वफादार मोहब्बत है
कि जाने का नाम नहीं लेती

सोचता हूं एक दिन सबको साथ लेके
कहीं लगता हो बाज़ार इनका
तो कर दूं ख़रीद फरोख्त
कुछ जज़्बात बेचूं, कुछ सुकून खरीदूं और मोहब्बत को कहीं भीड़ में छोड़कर चला आऊं...लावारिस...

Thursday, 4 May 2017

चलो आज थोड़ा वक्त सा हो जाऊं

कभी ख़ुद को पाऊं कभी खो जाऊं
चलो आज थोड़ा वक्त सा हो जाऊं
इन लम्हों को कर दूं ज़रा आवारा
थोड़ा सा हंस लूं थोड़ा रो जाऊं

चलता रहूं दिन रात
करता रहूं बातों में बात
कहां ठहरूं कहां सो जाऊं
चलो आज थोड़ा वक्त सा हो जाऊं

सफ़र में मेरे संग होते बहुत हैं
किसको रोकूं सब खोते बहुत हैं
यादों के दरिया में ख़ुद को डुबो जाऊं
चलो आज थोड़ा वक्त सा हो जाऊं

कुछ अरमां ,कुछ  सपने साथ चलते हैं
कुछ बनते हैं मिसाल, कुछ हाथ मलते हैं
कहीं आसमां तो कहीं ज़मीं हो जाऊं
चलो आज थोड़ा वक्त सा हो जाऊं...