Friday, 18 January 2013

यादों से कह दो कहीं और जाएं

यादों  से  कह दो कहीं और जाएं
इस मकां में अब और नहीं है जगह
खाली कर देना चाहता हूं दिल को तुमसे
नुक्कड़ में बेदर्द कुआं है
जिसने न जाने कितने रोते चेहरों को ले लिया आगोश में
तू भी क्यों नहीं समा जाती उसमें
शायद बहुत बड़ा है दिल उसका
तभी तो याद आयी थी हमीदा को उसकी
खुले आसमान के नीचे रात-रात भर रोती थी
दोनों हाथों को ऊपर उठाकर करती थी दुआ
पर न आया उसका बेटा वापस उस जहां से लौटकर 
पागल कहते, पत्थर मारते थे गांव वाले उसको
इन्हीं बेमुरव्वत यादों ने ही तो कर दिया था उसे दुनिया से गाफिल
एक कुआं ही तो था जो निकला उसका असली हमदर्द
सुला लिया अपनी नर्म गोद में सुकून के साथ
आखिर छोड़ क्यों नहीं देती मेरे जेहन के मकान को
क्यों इस कदर वफादार है मेरी तन्हाइयों की
मुफ्त में रखा था तुझे अपने पास
इतनी बेगैरत न बन एहसान को तो समझ
छोड़ दे मेरे जहन को, छोड़ दे मेरे जहन को।।।
                                                                  ...अरमान आसिफ इकबाल

Saturday, 12 January 2013

कानून-ए-मोहब्बत के भी अजीब से उसूल होते हैं,

कानून-ए-मोहब्बत के भी अजीब से उसूल होते हैं,
कत्ल हमारा होता है और कातिल भी हम ही होते हैं,

अब कौन चलाए इनके गुनाहों पर मुकदमा,
इस अदालत में यही वकील और यही जज होते हैं,

कहां से ढूंढकर लाएं एक अदद गवाह,
किसी को अपने जुर्म की खबर ही कहां देते हैं,

गर हौसला है तो सामने से आकर वार करो,
जंगों में लड़ने वाले पर्दों में कहां होते हैं,

मेरी सजा-ए-मौत का फैसला जरा हौले से सुनाना,
कहीं रुसवा न हो जाऊं , यहां दीवारों के भी कान होते हैं

क्यूं ऐसे जहां में रखते हो चाहत का ‘अरमान’
जहां हुस्नवाले करते हैं जुल्म और इश्कवाले रोते हैं।।।।
- अरमान आसिफ इकबाल

Thursday, 10 January 2013

रगों में पानी नहीं खून दौड़ना चाहिए ,


रगों   में  पानी  नहीं  खून  दौड़ना  चाहिए ,
वक़्त  है  दुश्मन  की  अब  गर्दन  मरोड़ना  चाहिए ,

बन्दूक  थमा  दी  हाथ  में , सरहदों  में  बिठा  दिया
दुश्मनों  को  घर  बुलाकर  महफिलों  को  सजा  दिया

उनकी  क्या  औकात  जो  हमसे  टकराएँगे
जोर  से  गर फूंक  दें  तो  तिनके  की  तरह  उड़  जाएँगे

हाथ  में  हथियार  हैं  पर  चलाने  की  पाबन्दी  है
देश  पर  जारी  हैं  हमले  सियासत  कितनी  गन्दी  है

मिलेगा  जिस  दिन  भी  मौका  तब  जलाल  कर  देंगे
दुश्मनों  की  ज़मीन  को  हम  सुर्ख  लाल  कर  देंगे

उस  दिन  तिरंगा  शान  से  पडोसी  मुल्क  में  लहराएगा
तब  कहीं  जाकर  शहीदों  को  सुकूं  मिल  पाएगा...
                             
                                             ...अरमान आसिफ इकबाल

Wednesday, 9 January 2013

हसरतों के प्याले में उम्मीदों का जाम भर दो


हसरतों के  प्याले  में  उम्मीदों  का  जाम  भर  दो
ऐ ज़ुल्म  करने  वाले  एक  नेकी  का  काम  कर  दो

और  कब  तक  आज़माओगे  सब्रवाले  को
खुदा  के  लिए  अब  इस  खेल  का  अंजाम  कर  दो

क्यों  नहीं  छीन  लेते  मेरा  चैन -ओ -करार
रातों  में  आओ  और  नींदें  हराम  कर  दो

गैरों  से  पता  चला  है  की  तुम्हे  चाहते  हैं
तुम  भी  कभी  इशारों  में  फैसला  कर  दो

पल -पल  को  खर्च  करके  बनाई  थी  ख्वाबों  की  हवेली
कम  से  कम  उसकी  ही  वसीयत  मेरे  नाम  कर  दो

बेजा  न  जाये  मेरी  मासूम  मोहब्बत
जो  कुछ  भी  बन  रहा  हो  मेरा  हिसाब  कर  दो .

                                               अरमान आसिफ इकबाल

Monday, 7 January 2013

क्यों ऐसे हालात बन जाते हैं

क्यों  ऐसे  हालात बन  जाते  हैं 
तुझे  सोचते  हैं  और  ख्वाब  बन  जाते  हैं,
वोह  एक  नज़र  ही  कमाल  होती  हैं,
जिन्हें  देखें  वोह नायाब  बन  जाते  हैं 
होगा  कोई  बादशाह  किसी  सल्तनत  का,
तुझे  देखकर  सब  ग़ुलाम  बन  जाते  हैं 
कोई  बात  तो  है  तुझमे, 
ऐसे  ही  नही  किस्से  तमाम  बन  जाते  हैं 
रुख  से  पर्दा  ज़रा  कम  ही  हटाया  करो, 
इंसान  भी  यहाँ  शैतान  बन  जाते  हैं 
सुना  है  वोह  लोगों  को  अजमाते  हैं, 
हम  भी  कोई  इम्तेहान  बन  जाते  हैं 
'अरमान' ज़रा  संभलकर  चलना  इस  राह  पर, 
अच्छे  अच्छे  उनके ज़ुल्म का  शिकार  बन  जाते  हैं.
   
                                                    अरमान आसिफ इकबाल 

Saturday, 5 January 2013

पुराना नीम का दरख़्त


ये गली  ये  मोहल्ला  कुछ  जाना  सा  लगता  है,
ये  शहर  कुछ  पहचाना  सा  लगता  है
पर  कहाँ  गया  वोह  सालों  पुराना  नीम  का  दरख़्त,
जो  देता  था  छाया  हर  वक़्त,
आंधी आये,  तूफ़ान  आए कोई  उसको  हिला  न पाए
फिर  क्या  ऐसी  बात हुई, दुर्घटना उसके  साथ  हुई,
मेरा  एक  साथी  बोला, भूतकाल  का  चिटठा  खोला
जब  भी  गर्मी  आती  थी, हमको  बहुत  सताती  थी
हम  सब  यहाँ  आया  करते  थे, निम्कोली  खाया  करते  थे
उसकी शाखों से  खेला  करते  थे,
लकड़ी फ़ेंककर  पकड़ा-पकड़ी करते थे
अचानक  ज़माना  बदलने  लगा,
नयी  पीढ़ी  पर  बैट -बल्ले  का  जूनून  चढ़ने  लगा ,
उन्हें  पुराने  खेल  रास  नही  आते ,
नीम  की  लकड़ी  काट-काट  के  बल्ले  और  विकेट  बनाते
जो  प्रकृति  न  कर  सकी  वो  उन  लड़कों  ने  कर  दिया
बीच  मैदान  में  खड़े  उस  दरख़्त  की  जड़ों  में  तेजाब  भर  दिया
शायद  उनको  मैदान  से  उसे  हटाना  था
अपनी  सीमा  रेखा  को  आगे और  बढ़ाना  था
तेजाब  अपना  रंग  दिखने  लगा , हरा  भरा  दरख़्त  मुरझाने  लगा
कुछ  दिन  बाद  वो  सूख  गया , सर्दी  में कोई आके  उसे  फून्ख  गया
मैंने  पूछा  उसमे  से  कितने  खिलाडियों  का  नाम  हुआ
किसी  का  नेशनल  या  इंटरनेशनल  लेवल  पर  काम  हुआ
वो  बोला  ऐसा  भी  कहीं  होता  है
दुःख  देके  भी  कोई  चैन  से  सोता  है
हर  कोई  धोनी , विराट  सहवाग  नही  बन  जाता
सब  खिलाडी  बन  जाते  तो  उन्हें  पानी  कौन  पिलाता
कुछ  चला  रहे  ठेला , कुछ  लगा  रहे  ठेला
कोई  भी  नामाकूल  डिस्ट्रिक्ट  लेवल  पर  भी  नही  खेला  
अपना  मन्नू क्रिकेटर  भी  तपती धूप में  ठेला  लगाता है
अब  उसे  वही  पुराना  नीम  का  दरख़्त  याद  आता  है
मैंने  कहा  क्यों  उस  अदने  से  दरख़्त  के  लिए लड़ते फिरते हो
वोह  बोला  अगर  वो  सिर्फ  एक  दरख़्त  था  तो  तुम  उसे  क्यों  याद  करते  हो ..
                                                                              अरमान आसिफ इकबाल

Wednesday, 2 January 2013

वो कहता गया मैं सुनता गया

वो कहता गया मैं  सुनता  गया
उसने  क्या  कहा , मैंने  क्या  सुना ,
कुछ  सुना  सुना  सा  लगता  है ,
वो  कहता  है  और  हँसता  है ,
शायद  कोई  साथी  नहीं  उसका ,
तनहा  तनहा  सा  लगता  है ,
जो  हम  सुन  नही  सकते ,
जाने  क्या  क्या  बकता  है
सब  पर  नज़र  है  उसकी ,
सबकी  खबर  वो  रखता  है
दूर  दूर  वो  रहता  है ,
पर  साथ  साथ  वो  चलता  है
आँखों  से  रहता  है  ओझल ,
हर  पल  रंग  बदलता  है .
जिसका  वो  साथी  बन  जाये
दुश्मन  देख  देख  फिर  जलता  है
यादों  को  रखता  है  जेबों  में
उम्मीदों  को  हाथ  में  रखता  है
थोडा  शर्माता  है  शायद,
इसलिए  पर्दा  करता  है,
इसको कोई  देख  न  पाया
'वक़्त-बेवक्त' निकलता  है...
               ......  आसिफ इकबाल


Tuesday, 1 January 2013

आओ लिखते हैं एक नई कहानी...

आओ लिखते हैं एक नई कहानी,
यादों के संदूक में भर दें पल पल की परेशानी।

उम्मीद खड़ी है बाहें खोले,
निराशा की आग में डाल दें चुल्लू भर पानी।

फिर देखते हैं कैसे करती है सफलता आने से आनाकानी,
मुसीबतों के पहाड़ पर हौसला ही साथी होता है।

अक्सर हिदायत देती रहती है किस्सों में नानी,
किस्मत को कोस मत क्योंकि ये किसी ने ना जानी।

हाथों की लकीरों का ऐतबार न कर,
हाथों से ही तो अपनी किस्मत है बनानी।

अगर देखने का नजरिया बदल लें,
तो नहीं होगा इस जमाने मे तुझसा कोई सानी।

हर गुनाह को करने से पहले याद रख,
हम सब को ले जाने के लिए मौत है एक दिन आनी।
- अरमान आसिफ इकबाल