Saturday, 24 March 2012

बेरोजगारी की लट्ठमार होली



आसिफ इकबाल 

घसीटे गुस्से में ऐसे बड़बड़ाता चला जा रहा था, जैसे सीधे जाकर कोई नई क्रांति लिख देगा। वैसे घसीटे के लिए ये कोई नई बात नहीं थी, ये तो उसकी खानदानी आदत है। इसके पिता भी सामाजिक जंगी थे। सोशल सिस्टम से इतनी जंग लड़ी कि घर के सामानों में ज़ंग लग गई। बेचारे घसीटे के पिता लोटेलाल नई क्रांति लिखते-लिखते सरकारी अस्पताल के मृत्यु पंजीकरण रजिस्टर में अपना नाम लिखा बैठे। गए थे सरकारी अस्पताल की बदहाल व्यवस्था पर धरना देने, अस्पताल में पानी इतना भरा था कि पैर फिसला और खुद ही धरे रह गए। सिर पर टूटी दीवार का एक पत्थर लगा और उनके जिस्म की आक्सीजन बाहर आकर प्रदूषण बन गई। लगता है दिमाग की उसी चोट ने घसीटे के  दिमाग को प्रभावित कर रखा है। इसमें घसीटे को क्या दोष देना। चलो पूछा जाए आखिर माजरा क्या है जो घसीटे इतना गुस्सा है।


 ‘‘अरे घसीटे, क्यों भांप के इंजन की तरह हांफ रहे हो, आखिर माजरा क्या है मुझे भी तो बताओ?’’ घसीटे ने गुस्से से झम्मन की तरफ देखा और बोला, ‘‘देखो,  यार झम्मन एक तो वैसे भी मेरी चादर फटी पड़ी है और ऐसी फटी है कि उसकी रफू करने वाला कोई नहीं है। और तुम हो कि’’....झम्मन ने घसीटे के गुस्से को भांपते हुए अपने चेहरे को अपने जज्बातों से तुरंत डिस्कनेक्ट किया और गंभीर होकर पूछा, ‘‘आखिर बात क्या है? ’’ घसीटे: ‘‘क्या बताएं झम्मन, तुम्हें तो पता है कि मैंने कितनी मेहनत से पढ़ाई-लिखाई की, क्या-क्या नहीं किया डिग्री पाने के लिए। स्कूल में मस्टराइन की सब्जी लाता था, उनके बच्चे को सुसु कराता था। माट साब की साइकिल धोता था, राशन की लाइन में लगकर उनका मिट्टी का तेल भी मैं लाता था। दिन-दिन भर धोबी के गधे की तरह लगा रहता था और जब थोड़ा बहुत टाइम मिलता था, तो सो जाता था। पढ़ने का समय नहीं मिलता था फिर भी मैंने डिग्री हासिल कर ली। और इस डिग्री ने ऐसी गत बनाई कि पूरा बदन टूट रहा है।’’ झम्मन ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘घसीटे डिग्री का बदन टूटने से क्या ताल्लुक?’’ घसीटे ने चिल्लाते हुए कहा, ‘‘यार लगता है महंगाई बढ़ने से तुम्हारी रोटी के लाले पड़ गए हैं। तभी तुम फोकट में मेरा दिमाग खाकर अपना पेट भर रहे हो।’’ झम्मन ने माहौल को समझकर घसीटे को सम्मान देते हुए कहा, ‘‘घसीटे भाई, बात तो बताओ।’’ घसीटे: ‘‘क्या बताएं झम्मन, लखनऊ गए थे धरना-प्रदर्शन करने।’’ झम्मन: ‘‘फिर क्या हुआ?’’ घसीटे: ‘‘तो फिर होना क्या था, खेली गई लट्ठमार होली।’’


झम्मन: तो लखनऊ क्यों बोल रहे हो, लट्ठमार होली तो बरसाना में होती है!’’ घसीटे: तुम्हें तो पूरी कहानी निबंध में समझानी पड़ती है। अरे यार नौकरी के लिए कर रहे थे सरकार के खिलाफ धरना प्रदर्शन। तुम्हें तो पता है मैं अपने पिता से कितना प्रभावित हूं। मैं भी बढ़-चढ़कर अपनी आवाज माइक से बुलंद कर रहा था। फिर क्या था, चलवा दी सरकार ने पानी की बौछार के साथ लठ। बस फर्क इतना था कि होली के पानी में रंग होता है और ये पानी बेरंग होकर भी सरकार का रंग छोड़ रहा था। कोई कार के पीछे था, तो कोई दीवार फांदकर भाग रहा था। शहर को पानी की सप्लाई के लिए सरकार के पास पानी नहीं होता है, लेकिन जब हम गरीब आंदोलन करते हैं तो पता नहीं फालतू पानी बहाने के लिए कहां से आ जाता है। तुम्हें तो पता है कि मुझे पानी से कितना डर लगता है।


 इसी पानी की वजह से ही मेरे पिताजी खर्च हो गए थे। मैंने चिल्लाना शुरू कर दिया, जल ही जीवन है, जल ही जीवन है...जब इससे नहीं माने तो मैंने महात्मा गांधी की लाठी का सहारा लिया और भाषण देने लगा, महात्मा गांधी के पास भी तुम लोगों के जैसी लाठी थी, लेकिन उन्होंने हमेशा अंहिसा का पाठ पढ़ाया और तुम लोग इससे हिंसा फैला रहे हो। प्रशासन के लिए सरकार के आदेश से बड़ा कुछ नहीं होता है। सबने सोचा यही धरने का मुख्या नेता है. जमकर चली लाठी और खुलकर पड़ी बौछार, न पूर्व सरकार और न वर्तमान सरकार, अपने लिए तो सब बेकार, क्योंकि हम हैं  बेरोजगार, जो जिंदगी भर खाते रहेंगे सरकार की मार, अब चलता हूं यार, मां कर रही है घर में इंतजार’’...ये कहता हुआ घसीटे आगे बढ़ गया।

Friday, 16 March 2012

सुपरमैन न बैटमैन, सिर्फ कॉमनमैन



अरे दादा इतने परेशान क्यों दिख रहे हो? आखिर माजरा क्या है? क्या ममता दीदी ने वित्त मंत्री बदलने के लिए सरकरार  से सिफारिश की है? क्योंकि रेल बजट को पेश करने के बाद रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी के सिर पर तलवार लटक रही है। सुना है आपने भी ऐसा बजट पेश कर दिया कि लेने के देने पड़ गए। दादा ने माथे पर सवालिया निशान बनाते हुए पूछा: तुम्हें कैसे पता? झम्मनलाल: क्या बात करते हो दादा, नाम तो नहीं पता, लेकिन एक शायर ने क्या खूब कहा है कि इश्क और मुश्क छुपाए नहीं छुपते हैं। दादा: अब बजट से इश्क और मुश्क का क्या ताल्लुक? झम्मनलाल: हां, वो तो मुझे भी नहीं पता, लेकिन बोल दिया तो बोल दिया। और एक बार जो मैं बोल देता हूं तो....खैर छोड़िए आज सल्लू की वांटेड फिल्म देख ली, तो थोड़ा फिल्मी हो गया। जिस तरह आपने बजट पेश कर दिया तो कर दिया। अब चाहे वो किसी को समझ में आए या न आए। चलिए मजाक से हटकर बात करता हूं।

दरअसल जब मैं आपके पास आ रहा था तो मुझे एक कॉमनमैन मिला। बेचारा बड़ा दुखी था। दादा: अब ये कॉमनमैन कौन है? झम्मनलाल: अरे आप कॉमनमैन को नहीं जानते? दादा: नहीं, झम्मनलाल: लेव कर लेव बात। दुनिया में एक कॉमनमैन ही तो है, जो सुनने में लगता है कि ही-मैन, सुपरमैन, बैटमैन या स्पाइडरमैन की तरह बड़ा ताकतवर होगा, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। ये लोग तो संकट आने पर मोचक बन जाते हैं, लेकिन कॉमनमैन हमेशा संकट के लिए रोचक बन जाता है। संकट को कॉमनमैन काफी पसंद है। जब देखों तब कॉमनमैन के पीछे पड़ा रहता है। भौतिक सुख इसके लिए भूत की तरह होते हैं। अगर आपका कभी अपने वायुयान या मोटर कार से पैदल सड़क पर घूमने का इत्तेफाक पड़े, तो किसी भी राह चलते आदमी से बात कर लेना। उससे पूछना, कैसे हो भाई? वो बोलेगा: अब क्या बताएं कैसे हैं, इतनी कम इनकम में कैसे बच्चों की पढ़ाई लिखाई होगी, महंगाई ने कमर तोड़ रखी है। मतलब यह कि कॉमनमैन हमेशा रोता मिलेगा। परेशानी इसके दाएं और मुसीबत इसके बाएं खड़ी रहती है। आप बुरा मत मानना, हो सकता है ये सरकार को गाली भी दे दे। आप कॉमनमैन को क्या जानो। जब कुर्सी पर बैठने का समय आता है, तो ये बिना चश्मे के आपको स्टेचू आॅफ लिबर्टी की तरह दूर से दिखाई पड़ जाते हैं। लेकिन सत्ता का चश्मा लगने के बाद आपकी दूर और पास दोनों की नजर खराब हो जाती है। फिर तो आपको अपने दामन के दाग भी दिकाई नहीं देते। चलो अब कौन बनेगा करोड़पति खेलना बंद करता हूं और सवाल-जवाब पर विराम लगाते हुए बताता हूं कि ये कॉमनमैन कौन है। कॉमनमैन मतलब भटकती आत्मा और धरती का बोझ। दादा ने आश्चर्यचकित होकर पूछा: मतलब! झम्मनलाल हंसते हुए: हाहाहा...क्या बताएं दादा, मजाक की थोड़ी आदत मुझे पड़ गई है। कॉमनमैन को हिंदी में कहते हैं आम आदमी। इसकी ''आमदनी'' में न तो ये कभी आम खा पाता है और उधार की ''देनी'' हमेशा इसके साथ जुड़ी रहती है। जो देश में सबसे ज्यादा तादाद में होते हुए भी कुछ खास लोगों में आम बना रहता है। चुनिंदा लोगों को खास बनाने में ये बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है। और तो और खास बनाने के बाद अपनी परेशानी को भूलकर जश्न भी मनाता है। बिल्कुल उसी तरह से जैसे बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना। अब देखिए आपको भी तो इसने आम से खास बनाया है। शुक्र मनाइए कि आम आदमी की याद्दाश्त बहुत कमजोर होती है।

बड़ी जल्दी पिछली बातों को भूल जाती है। वरना आप भी अबतक खास से आम बन गए होते। सुना है आपने इसकी जेब काट ली। अब क्या ये भी काम शुरू कर दिया? दादा: किसने कहा यह? मैं क्यों किसी की जेब काटूंगा? झम्मनलाल: अरे ये मैं थोड़ी कह रहा हूं। ये तो बाहर एक कॉमनमैन चिल्लाता जा रहा था कि दादा बजट की अटैची में कैंची लेकर संसद भवन गए थे, जिससे कॉमनमैन की जेब काटी गई। इन्हीं बातों के दरमियां एक आदमी चिल्लाता निकला सचिन ने शतकों का शतक पूरा कर लिया, सचिन ने शतकों का शतक पूरा कर लिया...उस आदमी को देखकर झम्मनलाल बोला: चलो शुक्र है कि इस देश में रुलाने वालों के अलावा कुछ खास लोग खुशी देने वाले भी हैं...शुक्रिया सचिन

Friday, 9 March 2012

आवाम ने सपा को नहीं, अखिलेश को चुना है


स•ाी समीकरणों को धता बताते हुए समाजवादी पार्टी ने यूपी में पूर्णबहुमत से अपना परचम फहरा दिया। सपा की शानदार जीत और बसपा को मिली हार ने ये साबित कर दिया कि जनता को समझ पाना हर किसे के बस की बात नहीं। बसपा सुप्रीमों मायावती ने हार का ठीकरा पूरी तरह से कांग्रेस, •ााजपा, मीडिया और मुसलमान के ऊपर फोड़ा। जबकि सच्चाई तो ये है कि बसपा की हार की वजह खुद मायावती ही हैं। •ाले ही मायावती इनको कोस रही हों, लेकिन उत्तर प्रदेश की आवाम ने सपा को नहीं बल्कि युवा नेता अखिलेश यादव को वोट दिया है। सपा अपनी जीत पर जो इतना इतरा रही है, वो सिर्फ अखिलेश की मेहनती और बेदाग होना है। यूपी की आवाम ने समाजवादी पार्टी को नहीं, बल्कि अखिलेश यादव को वोट दिया है। क्योंकि जनता को किसी •ाी दल में ऐसा चेहरा नहीं दिखा, जो उनके प्रदेश के मुस्तकबिल को नई रौशनी दे सके। अखिलेश ही एकमात्र ऐसा चेहरा दिखा, जो •ा्रष्टाचार की कालिख से बेदाग था और जिसमें प्रदेश की आवाम से रूबरू होने की अजीब कला है।

चुनाव प्रचार के दौरान अखिलेश के बयानों में कोई •ाी ऐसी बात नहीं बोली गई, जिससे आवाम या चुनाव आयोग को कोई परेशानी हुई हो। इस बात से साफ जाहिर होता है कि अखिलेश ने कितनी कुशलता से एक परिपक्व नेता की मिसाल पेश की, जबकि सालों से राजनीति कर रहे उनसे दोगुनी उम्र के नेताओं को गलत बयानबाजी की वजह से मीडिया और चुनाव आयोग का कोप•ााजन बनना पड़ा। यहां तक कि मुलायम सिंह यादव को •ाी चुनाव प्रचार के दौरान गलत बयानबाजी की वजह से आवाम और चुनाव आयोग से माफी मांगनी पड़ी थी। राहुल गांधी को अखिलेश से बेहतर आंका जा रहा था। अखिलेश समझ चुके थे कि यदि जाति और धर्म के नाम पर सरकार बनती है, तो •ााजपा यूपी और देश में राज कर रही होती। पेट की •ाूख से बड़ी आवाम के लिए कोई चीज नहीं होती। जिस वजह से वो एक जमीनी कार्यकर्ता की तरह साइकिल से चलकर उत्तर प्रदेश की आावाम से मुखातिब हुए। देश •ार का मीडिया राहुल के ग्लैमर को कांग्रेस की जीत के रूप में देख रहा था। लेकिन राहुल •ाी राजनीति के खेल में कच्चे निकले और सरेआम सपा के घोषणापत्र को फाड़कर उन्होंने राजनीतिक समझ का बखूबी परिचय दे दिया। अखिलेश के बयानों में उत्तर प्रदेश के विकास के सिवा कुछ नहीं था, जबकि अन्य दलों ने जाति और धर्म के नीम पर आवाम को अपने हक में करना चाहा। मुलायम सिंह को अखिलेश पर पूरा •ारोसा था, इसलिए उन्होंने क•ाी •ाी उनकी बात को नहीं टाला। यहां तक कि विधानस•ाा चुनाव में टिकट के बंटवारे से लेकर दागियों को बाहर करने के फैसले पर •ाी उन्होंने पूरी तरह से चुप्पी साधे रखी और अपने चहेते साथी आजम खान के गुस्से का शिकार हुए। अखिलेश का चुनावी एजेंडा पहले से ही साफ था। इसका नमूना उन्होंने दागी नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाकर दे दिया था। सपा की गुंडाराज की छवि को बदलना उनका पहला मकसद था। सपा की जीत में अन्ना के •ा्रष्टाचार के खिलाफ जारी आंदोलन को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। अन्ना ने जो आंदोलन चला रखा है, उसका गहरा असर देश की जनता पर है। पिछले कुछ महीनों में •ा्रष्टाचार विरोध की जो आंधी चली, उसने देश के नौजवान से लेकर बूढ़े तक को सत्ता बदलने पर मजबूर कर दिया। जहां मायावती मीडिया और मुसलमानों को सपा की जीत और बसपा की हार का जिम्मेदार ठहरा रही हैं, वो पूरी तरह से गलत है।
 मीडिया ने पूरी तरह से राहुल गांधी की जमकर पब्ल्सिटी की। प्रियंका के चेहरे से कैमरा नहीं हटा। यहां तक कि उनके पति रॉबर्ट वाड्रा को •ाी •ाविष्य में यूपी के तारणहार के रूप में पेश कर दिया। रही बात अन्य लोगों की, तो मायावती अपने पिछले कार्यकाल को रिवर्स करके गौर फरमाएं तो उन्हें •ा्रष्टाचार और हत्याओं की तस्वीर साफ नजर आएगी। आवाम ने सपा को जिताया नहीं, बल्कि •ा्रष्टाचार को हराया है। पूरे उत्तर प्रदेश में खड़ी हाथियों व बसपा सुप्रीमों की मूर्तियां और एनआरएचएम घोटाला चीख-चीखकर •ा्रष्टाचार की गवाही दे रहा है। मुस्लिम वोट तो वैसे •ाी सपा का पारंपरिक वोट रहा है। जैसा कि कयास लगाए जा रहे हैं कि यूपी विधानस•ाा चुनाव ही लोकस•ाा चुनाव 2014 तस्वीर को संवारेंगे, एकदम सही है। •ा्रष्टाचार मुद्दे ने काम करना शुरू कर दिया है। लोगों को एक ऐसे नेता की तलाश है, जो पूरी तरह से पाक-साफ हो। और इसी का नतीजा है कि आवाम ने सपा को नहीं, अखिलेश को वोट दिया है। आवाम को सपा से नहीं, बल्कि अखिलेश से उम्मीदें हैं। इस जीत से सपा को खुशफहमी में रहने की जरूरत नहीं है। अगर आवाम ने उन्हें जिताया है, तो उसे अपनी गुंडाराज की छवि बदलकर, लोगों को यूपी को एक बेहतर प्रदेश की तस्वीर दिखानी होगी। सपा के पास यूपी में आगे •ाी राज करने का सुनहरा मौका है, उसके लिए उसे अखिलेश की सोच पर काम करना होगा।

Wednesday, 7 March 2012

मुर्गी नहीं, कुर्सी छीन ली


झम्मनलाल अपनी खचाड़ा साइकिल में बैठकर बाजार जा रहे थे कि अचानक उनकी नजर नुक्कड़ में उदास बैठी बहनजी पर पड़ी।  झम्मनलाल से रहा नहीं गया और वो पूछ बैठा, ''अरे बहनजी इतनी उदास क्यों बैठी हो? तुम्हारे चेहरे पर हमेशा हंसी की लाली रहती थी। वो कहां गुम हो गई। क्या मुंबई से सैंडल लेकर अ•ाी तक विशेष विमान नहीं आया क्या? ईरान ने पेट्रोल महंगा कर रखा है, कहीं रास्ते में विमान का ईंधन तो नहीं खत्म हो गया। आखिर माजरा क्या है? चेहरे पर क्यों उदासी छाई है, क्या तुम्हारी किसी ने मुर्गी चुराई है?''

 बहनजी ने उदासी •ारे लहजे में कहा, ''क्यों मजाक करते हो चाचा? किसी ने मेरी मुर्गी नहीं, बल्कि मेरी कुर्सी छीन ली है। क्या-क्या नहीं किया था, उस कुर्सी के लिए। कई लोगों को पकड़कर इंजीनियरों की एक टीम बनाई। इन्हीं इंजीनियरों ने खून-पसीना एक करके या ये कहें कि लोगों का खून पीकर इस कुर्सी को तैयार किया। जब ये कुर्सी बनकर तैयार हुई, तो सालों तक इसके न टूटने की गारंटी दी गई। पर पता नहीं कुर्सी को किसकी नजर लग गई। मैंने सोचा चलो कुछ विकास किया जाए। तेजी से विलुप्त हो रहे हाथियों को संरक्षित करने के लिए उनकी मूर्तियां खड़ी करवाईं, सोचा कि आने वाली नस्ले डायनासोर की तरह हाथियों को •ाी याद रखेंगी, लेकिन यहां के लोगों को •ाविष्य की बिल्कुल चिंता नहीं है।''

 झम्मनलाल, ''लगता है आपकी कुर्सी छीनने में इन हाथियों का बहुत बड़ा हाथ है। इन्हीं हाथियों ने तुम्हारी लुटिया डुबा दी। अरे कितना पैसा लगाया तुमने हाथियों की फौज खड़ी करने में, कितने नाजों से पाला इन्हें, दुनिया जमाने से बैर लिया, लेकिन सिला क्या मिला, छिनवा दी न कुर्सी। मैंने तो पहले ही कहा था कि कुत्ता पालो, बिल्ली पालो, घोड़ा पालो, रट्टू तोता यानी मिट्ठू बेटा पालों। क्योंकि ये सब वफादार प्राणी होते हैं। पर तुमने तो गलतफहमी के साथ-साथ हाथी पाल लिए। यहां राजेश खन्ना की फिल्म हाथी मेरा साथ थोड़ी चल रही है कि हाथी पे हाथी की फौज खड़ी करती चली जा रही हो। जितना पैसा नकली हाथियों पर खर्च कर दिया, उतना अगर असली हाथियों पर करतीं तो जिंदगी •ार उसी में बैठकर चुनावी प्रचार करतीं। इससे चुनाव प्रचार का खर्च •ाी बचता और हाथी •ाी संरक्षित हो जाते। अब जिसकी कुर्सी उसके हाथी। मुझे तो डर है कि अब बेचारे हाथियों का क्या होगा। तुमने अपनी •ाी तो मूर्तियां लगवाई हैं, क्या तुम्हें •ाी संरक्षण की आवश्यकता है? तुम्हें •ाी •ाविष्य में लोग टिकट खरीदकर देखने आएंगे। और तुम कुछ ज्यादा ही बोलती हो। दुनिया•ार में हाथियों की कीमत बढ़ाकर बताने की क्या जरूरत थी? खुला हाथी लाख का, ढंका हाथी सवा लाख का। अरे ये कंगाल लोग क्या जाने रुपये की अहमियत। लाख के सवा लाख ही तो किए थे, बताइए कुर्सी ही छिनवा दी।'' बहनजी, ''अरे झम्मनलाल, मेरे सिर पर हाथ रख।''

झम्मनलाल, ''अब कौन सी कसम खिलाने वाली हो सिर पर हाथ रखवाकर?, मैं अपना वोट दे चुका हूं।'' ''अरे नहीं, जरा मेरे माथे पर हाथ रखकर देख, कहीं बुखार तो नहीं है मुझे? झम्मनलाल, '' बहनजी तुम्हें तो बहुत तेज बुखार है। लगता है तुमने कुर्सी छिनने की घटना दिल पर ले ली है। चलो हकीम साहब के पास, देसी जड़ीबूटी की दवा दिलवा देता हूं। '' बहनजी, ''नहीं, मुझे हॉस्पिटल ले चलों।''

झम्मनलाल, ''इसके लिए तो सरकारी अस्पताल जाना पड़ेगा और मुझे वहां जाकर अपनी शामत थोड़ी बुलवानी है। वहां सुना है डॉक्टर नहीं, सीबीआई वाले सबका आॅपरेशन कर रहे हैं। पता चला है कि वहां के कई डॉक्टरों ने इतनी दवाई खा ली कि दुनिया से रुखसत हो गए। और ये दवा किसने खिलाई उसको ढूंढ रहे हैं। बहनजी, '' तो झम्मन, जहां तू चाहे मुझे ले चल।''

झम्मनलाल, '' ले तो चलूंगा, पर मेरे पास तो •ाई साइकिल है और इसमें तुम बैठोगी नहीं।'' बहनजी, '' अरे झम्मन, मुसीबत में तू किसी में •ाी बैठाएगा तो बैठ जाऊंगी, पर मुझे यहां से ले चल।''