Wednesday, 7 March 2012

मुर्गी नहीं, कुर्सी छीन ली


झम्मनलाल अपनी खचाड़ा साइकिल में बैठकर बाजार जा रहे थे कि अचानक उनकी नजर नुक्कड़ में उदास बैठी बहनजी पर पड़ी।  झम्मनलाल से रहा नहीं गया और वो पूछ बैठा, ''अरे बहनजी इतनी उदास क्यों बैठी हो? तुम्हारे चेहरे पर हमेशा हंसी की लाली रहती थी। वो कहां गुम हो गई। क्या मुंबई से सैंडल लेकर अ•ाी तक विशेष विमान नहीं आया क्या? ईरान ने पेट्रोल महंगा कर रखा है, कहीं रास्ते में विमान का ईंधन तो नहीं खत्म हो गया। आखिर माजरा क्या है? चेहरे पर क्यों उदासी छाई है, क्या तुम्हारी किसी ने मुर्गी चुराई है?''

 बहनजी ने उदासी •ारे लहजे में कहा, ''क्यों मजाक करते हो चाचा? किसी ने मेरी मुर्गी नहीं, बल्कि मेरी कुर्सी छीन ली है। क्या-क्या नहीं किया था, उस कुर्सी के लिए। कई लोगों को पकड़कर इंजीनियरों की एक टीम बनाई। इन्हीं इंजीनियरों ने खून-पसीना एक करके या ये कहें कि लोगों का खून पीकर इस कुर्सी को तैयार किया। जब ये कुर्सी बनकर तैयार हुई, तो सालों तक इसके न टूटने की गारंटी दी गई। पर पता नहीं कुर्सी को किसकी नजर लग गई। मैंने सोचा चलो कुछ विकास किया जाए। तेजी से विलुप्त हो रहे हाथियों को संरक्षित करने के लिए उनकी मूर्तियां खड़ी करवाईं, सोचा कि आने वाली नस्ले डायनासोर की तरह हाथियों को •ाी याद रखेंगी, लेकिन यहां के लोगों को •ाविष्य की बिल्कुल चिंता नहीं है।''

 झम्मनलाल, ''लगता है आपकी कुर्सी छीनने में इन हाथियों का बहुत बड़ा हाथ है। इन्हीं हाथियों ने तुम्हारी लुटिया डुबा दी। अरे कितना पैसा लगाया तुमने हाथियों की फौज खड़ी करने में, कितने नाजों से पाला इन्हें, दुनिया जमाने से बैर लिया, लेकिन सिला क्या मिला, छिनवा दी न कुर्सी। मैंने तो पहले ही कहा था कि कुत्ता पालो, बिल्ली पालो, घोड़ा पालो, रट्टू तोता यानी मिट्ठू बेटा पालों। क्योंकि ये सब वफादार प्राणी होते हैं। पर तुमने तो गलतफहमी के साथ-साथ हाथी पाल लिए। यहां राजेश खन्ना की फिल्म हाथी मेरा साथ थोड़ी चल रही है कि हाथी पे हाथी की फौज खड़ी करती चली जा रही हो। जितना पैसा नकली हाथियों पर खर्च कर दिया, उतना अगर असली हाथियों पर करतीं तो जिंदगी •ार उसी में बैठकर चुनावी प्रचार करतीं। इससे चुनाव प्रचार का खर्च •ाी बचता और हाथी •ाी संरक्षित हो जाते। अब जिसकी कुर्सी उसके हाथी। मुझे तो डर है कि अब बेचारे हाथियों का क्या होगा। तुमने अपनी •ाी तो मूर्तियां लगवाई हैं, क्या तुम्हें •ाी संरक्षण की आवश्यकता है? तुम्हें •ाी •ाविष्य में लोग टिकट खरीदकर देखने आएंगे। और तुम कुछ ज्यादा ही बोलती हो। दुनिया•ार में हाथियों की कीमत बढ़ाकर बताने की क्या जरूरत थी? खुला हाथी लाख का, ढंका हाथी सवा लाख का। अरे ये कंगाल लोग क्या जाने रुपये की अहमियत। लाख के सवा लाख ही तो किए थे, बताइए कुर्सी ही छिनवा दी।'' बहनजी, ''अरे झम्मनलाल, मेरे सिर पर हाथ रख।''

झम्मनलाल, ''अब कौन सी कसम खिलाने वाली हो सिर पर हाथ रखवाकर?, मैं अपना वोट दे चुका हूं।'' ''अरे नहीं, जरा मेरे माथे पर हाथ रखकर देख, कहीं बुखार तो नहीं है मुझे? झम्मनलाल, '' बहनजी तुम्हें तो बहुत तेज बुखार है। लगता है तुमने कुर्सी छिनने की घटना दिल पर ले ली है। चलो हकीम साहब के पास, देसी जड़ीबूटी की दवा दिलवा देता हूं। '' बहनजी, ''नहीं, मुझे हॉस्पिटल ले चलों।''

झम्मनलाल, ''इसके लिए तो सरकारी अस्पताल जाना पड़ेगा और मुझे वहां जाकर अपनी शामत थोड़ी बुलवानी है। वहां सुना है डॉक्टर नहीं, सीबीआई वाले सबका आॅपरेशन कर रहे हैं। पता चला है कि वहां के कई डॉक्टरों ने इतनी दवाई खा ली कि दुनिया से रुखसत हो गए। और ये दवा किसने खिलाई उसको ढूंढ रहे हैं। बहनजी, '' तो झम्मन, जहां तू चाहे मुझे ले चल।''

झम्मनलाल, '' ले तो चलूंगा, पर मेरे पास तो •ाई साइकिल है और इसमें तुम बैठोगी नहीं।'' बहनजी, '' अरे झम्मन, मुसीबत में तू किसी में •ाी बैठाएगा तो बैठ जाऊंगी, पर मुझे यहां से ले चल।''

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