Monday, 10 December 2012

यहां अपना-पराया कोई नहीं


कोलकाता टेस्ट में •ाारत की शर्मनाक हार से पूरा देश स्तब्ध है। विश्व विजेता का ताज अपने सिर में सजाकर घूम रही टीम इंडिया, अंग्रेज बल्लेबाजों के संयम के सामने नौसिखिओं की तरह जूझती नजर आई। मनमानी पिच के बावजूद •ाी धोनी के धुरंधर पानी •ारते नजर आए। अपनी धरती, अपना अंबर होते हुए अब और क्या चाहिए टीम इंडिया को देशवासियों के लिए एक अदद जीत नसीब कराने के लिए। घर के शेर, घर में ही ढेर हो गए। एक तरफ कप्तान धोनी हार का ठीकरा बल्लेबाजों के सिर फोड़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ बीसीसीआई सीनियर गेंदबाजों को अलविदा कहकर अपनी नाक बचा रहा है। किसको सही माना जाए, धोनी या बीसीसीआई को। अगर मैदान में खड़े धोनी ने बल्लेबाजों को कोसा, तो बीसीसीआई ने गेंदबाजों को क्यों निकाला या ये कहा जाए कि बीसीसीआई बल्लेबाजों को निकालना ही नहीं चाहता, चाहे बल्लेबाज कितना •ाी टीम का बेड़ा गर्क करते रहें। क्रिकेट की टेÑनिंग लेने वाला बच्चा •ाी बता सकता है कि जिस पिच पर अंग्रेज बल्लेबाजों ने पांच सौ से ऊपर स्कोर पहुंचाया, वही पिच •ाारतीय बल्लेबाजों के लिए बंजर हो गई। बात साफ है कि दो टेस्ट मैचों में लगातार हार से नई चयन समिति की •ाी इज्जत दांव पर लग गई है। •ाला हो मीडिया का कि अ•ाी तक उसकी नजर चयन समिति से दूर है। बीसीसीआई द्वारा युद्ध स्तर पर जहीर खान, हर•ाजन सिंह और युवराज को बाहर करना कहीं न कहीं ये दर्शाता है कि इन्हें बलि का बकरा बनाकर, दूसरे बल्लेबाजों की पेशानी में पड़ते बलों को सीधा किया है। चयन समिति ने इन खिलाड़ियों को निकालकर कुछ नया नहीं किया है। खराब फॉर्म से जूझ रहे जहीर को तो इस टेस्ट के बाद बाहर होना ही था, हर•ाजन •ाी काफी दिनों बाद वापसी के बावजूद असर नहीं दिखा पाए। रही बात युवराज की, तो कहीं न कहीं उनको अन्य बल्लेबाजों से कमतर आंका गया। आखिर कब तक बीसीसीआई बूढ़े शेरों को रिकॉर्ड के नाम पर टीम में ठूंसती रहेगी। क्यों करीबियों को टीम के करीब रखा जाता है। आईसीसी की ताजा टेस्ट रैंकिंग के अनुसार कोई •ाी •ाारतीय बल्लेबाज टॉप टेन में जगह नहीं बना पाया है। •ाारतीय बल्लेबाजों की शुरुआत 19वें पायदान से सचिन तेंदुलकर करते हैं। इसके बाद 21वें पर सहवाग और 23वें पर चेतेश्वर पुजारा हैं, जबकि बॉलिंग में प्रज्ञान ओझा एकमात्र •ाारतीय गेंदबाज हैं, जो रैंकिंग में पांचवें पायदान पर हैं। मतलब साफ है कि जिन बल्लेबाजों को बीसीसीआई सजावट के तौर पर टीम में रखकर शो•ाा बढ़ा रहा है, उनमें से एक •ाी टॉप टेन की सूची में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में नाकाम रहा है, जबकि गेंदबाजों की नाक रखते हुए प्रज्ञान टॉप टेन में बरकरार हैं। वर्तमान में चल रहे रणजी मैचों पर यदि गौर फरमाया जाए, तो कई ऐसे बल्लेबाज मिल जाएंगे, जो दोहरा शतक लगाकर शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं। फॉर्म में चल रहे ये बल्लेबाज •ाी बीसीसीआई की चयन समिति की अनदेखी के कारण रणजी तक ही सीमित रह जाते हैं। देश के हालात ऐसे हैं कि राजनीति एक खेल है और खेल में राजनीति है, जिसे आम इंसान सिर्फ जीत-हार तक ही समझ पाता है। इससे ज्यादा नहीं। बीसीसीआई को अपने स्तर और विवेक से फैसले लेने चाहिए। मीडिया की खबरों, किसी खास खिलाड़ी या रिकॉर्ड बनवाने के लिए चयन नहीं होना चाहिए। रिकॉर्ड किसी एक खिलाड़ी की जागीर नहीं होते। ये तो एक निरंतर प्रक्रिया है, जो सिर्फ बदलाव के साथ ही एक-दूसरे से आगे निकलते हैं और बदलाव प्रकृति का नियम हैं।

Thursday, 11 October 2012


मलाला से डरता तालिबान


हजरत मुहम्मद (सल.) ने फरमाया कि एक विद्वान के कलम की स्याही एक शहीद के खून से •ाी ज्यादा पाक होती है और इल्म हासिल करना हर मुसलिम औरत व मर्द पर फर्ज (जरूरी) है। फिर पाक कलमा लिखा झंडा लेकर चलने वाले तालिबान ने उस 14 साल की छात्रा मलाला युसुफजई को अपनी गोली का शिकार क्यों बनाया,जो सिर्फ इल्म और बुनियादी हक को हासिल करना चाहती थी। मलाला को उस वक्त गोली का शिकार बनाया गया जब वो अपनी साथी लड़कियों के साथ स्कूल वैन से घर वापस आ रही थी। हमलावर ने बस को रुकवाकर पहले तो मलाला की पहचान की, फिर उसे सिर और पेट में गोली मार दी। फिलहाल मलाला का पेशावर के अस्पताल में इलाज चल रहा है और डॉक्टर उसे खतरे से बाहर बता रहे हैं। इस वक्त पूरा पाकिस्तान इस बहादुर लड़की की सलामती के लिए दुआ कर रहा है और पाकिस्तानी हुकूमत ने पाकिस्तानी एयर लाइंस के एक एंबुलेंस विमान को पूरी तरह से तैयार रखा है ताकि किसी •ाी आपातकाल में मलाला को विदेशी इलाज के लिए •ोजा जा सके। मलाला का कसूर सिर्फ इतना था कि उसने 2009 में पाकिस्तान के स्वात इलाके में फैले आतंकी संगठन तहरीके तालिबान पाकिस्तान द्वारा जारी किए गए फरमान पर अमल नहीं किया था। जब मलाला सिर्फ 11 साल की थी तब तालिबान ने फरमान जारी किया था कि कोई •ाी लड़की स्कूल या कॉलेज पढ़ने नहीं जाएगी। अगर कोई •ाी लड़की ऐसा करती है तो उसके चेहरे पर तेजाब डाल दिया जाएगा। उस वक्त मलाला ने फरमान की परवाह ना करते हुए स्कूल जाना जारी रखा और अपनी साथी लड़कियों को •ाी प्रोत्साहित किया कि वो इस फरमान की खिलाफत करें। तब मलाला और साथी छात्राएं सादे कपड़ों में शॉल के नीचे किताबें छुपाकर स्कूल जाती थीं। इसके बाद मलाला ने बीबीसी के लिए उर्दू डायरी लिखी और स्वात में हो रहे तालिबानी अत्याचार के बारे में तफ्सील से लिखा। तालिबान के खिलाफ इस कदम को उठाने के बाद मलाला को पाकिस्तान में राष्ट्रीय शांति पुरस्कार से नवाजा गया और 2011 में अंतरराष्ट्रीय बाल शांति पुरस्कार के लिए •ाी मलाला का नाम शामिल किया गया। इस तरह मलाला पहली पाकिस्तानी लड़की बनीं, जिन्हें ये रुतबा हासिल हुआ। बताया जा रहा है कि त•ाी से मलाला के पिता जियाउद्दीन युसुफजई और खुद मलाला तालिबानियों के निशाने पर थे, लेकिन मलाला को तालिबानियों ने पहले शिकार बनाया। मलाला के पिता बताते हैं कि जब मलाला का जन्म हुआ था तो हमने अपनी बेटी का नाम अफगानिस्तान की बहादुर नायिका मलालई के नाम पर रखा था, जिन्होंने अफगानिस्तान-ब्रिटिश युद्ध के दौरान अपनी बहादुरी से दुश्मन के दांत खट्टे कर दिए थे। जियाउद्दीन आगे बताते हैं कि आज लगता है कि उनका अपनी बेटी का नाम मलाला रखना सही फैसला था और उन्हें अपनी बेटी पर फख्र हैं। तालिबान का मतलब विद्यार्थी होता है, लेकिन मलाला और इन विद्यार्थियों में काफी फर्क है। एक विद्यार्थी (मलाला) जो समाज में शांति व औरतों की तरक्की के लिए कलम का हथियार उठा रही है, तो दूसरी तरफ ये कैसे विद्यार्थी (तालिबान) हैं, जो बंदूक की जबान से इस्लाम में बताए गए औरतों के हुकूकों पर पाबंदी का फैसला कर रहे हैं। अब यहां ये कहना मुश्किल हो जाएगा कि कौन इस्लाम में दिए गए हुकूकों (अधिकारों) को नि•ााने और अमल करने की कोशिश कर रहा है? बहरहाल, पाकिस्तानी सेना और अमेरिका के संयुक्त अ•िायान के तहत स्वात से खदेड़े जा रहे तालिबान कुछ •ाी करने को तैयार हैं। वो औरतों को शिक्षा से महरूम रखना चाहते हैं, ताकि आने वाली नस्लें अशिक्षित होकर उनकी (तालिबान) राह पर कुर्बान होती रहें।

Friday, 3 August 2012

राजनीति के कीचड़ में फेंका पत्थर


आसिफ इकबाल
•ा्रष्टाचार के खिलाफ अ•ाी तक मुहिम 'आंदोलन' के जरिए चल रही थी, लेकिन अब टीम अन्ना ने 'राजनीति' में उतरने की इच्छा जाहिर की है। उस राजनीति में, जिसके खेल में आत्मसम्मान, ईमानदारी, समाजसेवा, देश सेवा बगैराह दांव पर लगाने पड़ते हैं। अन्ना ने देशवासियों से राजनीतिक दल बनाने की राय मांगी है। अब जनता के बहुमत से टीम अन्ना, 'अन्ना पार्टी' में तब्दील होने जा रही है। सवाल ये उठता है कि क्या अन्ना पार्टी देश की गंदी राजनीति में उतरकर •ा्रष्टाचार के खिलाफ  जनलोकपाल को पारित करा सकती है। क•ाी-क•ाी गंदगी को साफ करने के लिए गंदगी में उतरना पड़ता है। ठीक उसी तरह टीम अन्ना ने गंदी राजनीति में उतरने की इच्छा जाहिर की। लेकिन क्या अन्ना पार्टी राजनीति के कायदे कानून या खेल की चालों को अपने हिसाब से चल पाएगी। कहते हैं राजनीति में 'सबकुछ' जायज है, लेकिन अन्ना पार्टी 'सबकुछ' वाला मंत्र नहीं अपना सकती है। धनबल और बाहुबल की राजनीति में अन्ना पार्टी अपने आप को कहा खड़ा पाती है। लोकपाल, •ा्रष्टाचार व कालेधन  को अपना मुद्दा बनाकर राजनीति में उतरने के बाद अन्ना को दूसरे राजनीतिक दलों से कड़ा सामना करना पड़ सकता है। •ा्रष्टाचार और •ा्रष्ट नेताओं की बात करने वाले अन्ना के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी फंड की होगी, जो उन्हें ईमानदार लोगों से जमा करना होगा। किसी •ाी ऐसी फर्म या कंपनी का पैसा पार्टी के लिए हराम होगा जो दागी व्यक्ति से आए। वैसे अन्ना ने आम जनता से चंदा इकट्ठा करने की गुजारिश की है। इसके अलावा पार्टी के उम्मीदवारों का चुनाव किस प्रकार किया जाएगा। टीम अन्ना अपने उम्मीदवार को ईमानदारी का सर्टिफिकेट कैसे देगी। ईमानदारी कोई पत्थर की मूर्ति नहीं, जो एक बार बना दी तो ताउम्र के लिए फुरसत। ये इंसानी फितरत की एक क्रिया है, जो वक्त के साथ इंसान को ईमानदार से बेइमान बना सकती है। ऐसे में अन्ना पार्टी क्या करेगी, जब उसका ही नेता अगर •ा्रष्ट निकल गया। राजनीति में जातिवाद और क्षेत्रवाद ने अच्छी पकड़ बना रखी है। क्या अन्ना का •ा्रष्टाचार का मुद्दा वहां काम कर पाएगा। हमारे देश की जनता विकास पर कम जाति और क्षेत्र के नाम पर निजाम बनाती है। •ाले ही बड़े शहरों में अन्ना पार्टी को सफलता हासिल हो जाए, लेकिन गांवों, कस्बों में •ा्रष्टाचार मुद्दे को समझने वाले बहुत ही कम लोग हैं। ये आबादी ज्यादातर अपने क्षेत्र और जाति को देखकर वोट करती है। यही वजह है कि अन्ना पार्टी को सबसे ज्यादा नुकसान क्षेत्रीय दलों से उठाना पड़ सकता है। अन्ना पार्टी का अहम इम्तिहान सरकार बनाने के दौरान होगा। किसी •ाी दल को बहुमत न मिलने की दशा में अन्ना पार्टी क्या करेगी। किसे देगी अपना समर्थन, क्योंकि उसके अनुसार हर दल •ा्रष्ट और हर नेता •ा्रष्टाचारी है। फिर कैसे अन्ना पार्टी अपने आप को संसद में मजबूत कर पाएगी। अन्ना हजारे ने कहा है कि वो कहीं से •ाी चुनाव नहीं लड़ेंगे, लेकिन उनका सपोर्ट पार्टी के साथ रहेगा। एक टीवी चैनल को दिए गए ताजा बयान में कुमार विश्वास, मनीष सिसोदिया और अरविंद केजरीवाल ने •ाी पार्टी बनाने के पक्ष में हाथ उठाए हैं पर चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है। ऐसे में पार्टी की कमान कौन सं•ाालेगा, किसे बनाया जाएगा पार्टी का नेता। अन्ना के राजनीतिक दल बनाने के फैसले से ही इस आंदोलन में दोफाड़ हो गए हैं। आंदोलन में शामिल आम आदमी के बीच कानाफूसी होने लगी है। कुछ राजनीतिक दल बनाने व कुछ न बनाने के पक्ष में हैं। अन्ना के आंदोलन में लोगों का जनसैलाब देखने को मिला। लाखों हाथों में तिरंगे झंडे लहराते दिखे। अ•ाी तक अन्ना के आंदोलन और केंद्र सरकार को कोसने वाली जनता की अग्निपरीक्षा अब शुरू होने वाली है। अब अन्ना को संसद में मजबूत करने के लिए देश के लोगों को उनका सहयोग करना होगा। वरना माना जाएगा कि जनता का आंदोलनों में बेहिसाब इकट्ठा होकर नारे लगाना, महज एक दिखावा था। राजनीतिक दल बनाने की मंशा के बीच अब ये देखना होगी कि अन्ना के सहयोगी बाबा रामदेव को कहां जगह मिलती है। कहीं ऐसा तो नहीं कि अन्ना पार्टी के साथ-साथ रामदेव पार्टी •ाी खड़ी हो जाए। अन्ना के इस फैसले पर देश के स•ाी राजनीतिक दलों ने खुशी जाहिर की है। उनका कहना है कि राजनीति में उतरने के बाद अन्ना को पता चल जाएगा कि राजनीति क्या है और देश को कैसे चलाया जाता है। खैर, अन्ना ने गंदी राजनीति में पत्थर फेंका है, आगे देखते हैं कि क्या होता है।

Saturday, 21 July 2012

क्रिकेट ही क्यों


क्रिकेट ही क्यों


आसिफ इकबाल
26 नवंबर 2008, मुंबई के ताज होटल पर आतंकियों का हमला और पाकिस्तान से हर तरह से •ाारत ने रिश्ते खत्म कर लिए, जिसमें से खेल •ाी शामिल है। जैसा कि अटकलें लगाई जा रही थीं, उसके अनुसार बीते सोमवार को बीसीसीआई ने घोषणा की कि पाकिस्तानी खिलाड़ी दिसंबर में तीन एकदिवसीय और दो टी-20 मैच खेलने के लिए •ाारत की सरजमीं पर कदम रखेंगे। क्रिकेट के शौकीन लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई कि दुनिया के सबसे रोमांचक मुकाबले को एक बार फिर उनकी आंखे देखेंगी। बीसीसीआई की घोषणा के साथ ही पूर्व क्रिकेटर सुनील गावस्कर का इस श्रृंखला को लेकर विरोध सामने आया। सुनील गावस्कर, जिनका क्रिकेट जगत में आला मर्तबा है, का कहना है कि जबतक मुंबई हमले का मामला हल नहीं हो जाता, तबतक पाकिस्तान को खेलने के लिए •ाारत नहीं बुलाना चाहिए। बेशक गावस्कर का बयान पूरी तरह से जायज है, पर सवाल ये उठता है कि एक क्रिकेटर ने क्रिकेट का विरोध क्यों किया?, जबकि आजतक •ाारत-पाक क्रिकेट संबंधों को लेकर किसी •ाी •ाारतीय या पाकिस्तानी खिलाड़ी ने नकारात्मक टिप्पणी नहीं की है। तो फिर ऐसे में गावस्कर का इस सीरीज का विरोध करना किस दिशा की ओर संकेत देता हैं। कहीं गावस्कर को सचिन, अजहर, सिद्ध्नू , कीर्ति आजाद खिलाड़ियों की तरह संसद •ावन तो नहीं दिख रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि गावस्कर ने •ाी मौके को •ाुनाते हुए, इस तरह का राजनीतिक बयान देकर राजनीति की दुनिया में दस्तक देनी चाही हो। गावस्कर ने कहा कि मुंबईकर होने के नाते मैं ये कहना चाहूंगा कि जब तक ताज हमले में पाकिस्तान कोई कार्रवाई नहीं करता, •ाारत को पाक के साथ क्रिकेट नहीं खेलना चाहिए। गावस्कर •ाारतीय से अचानक मुंबईकर कैसे हो गए। शायद गावस्कर को मुंबईकरों का आसरा चाहिए, क्योंकि हो सकता है •ाविष्य में उनको मुंबईकरों की जरूरत पड़ जाए। दरअसल सचिन तेंदुलकर के राज्यस•ाा सदस्य बनने के साथ ही खिलाड़ियों में राजनीति में उतरने की उत्सुकता बढ़ गई है। जो कुछ •ाी खिलाड़ियों में राजनीति को लेकर हिचकिचाहट थी वो खत्म हो रही है। संसद •ावन पर हमले के बाद •ाी पाकिस्तान कई बार •ाारत का दौरा कर चुका है। तब गावस्कर ने विरोध नहीं किया, लेकिन अब अचानक गावस्कर का विरोधी स्वर क्यों मुखर हो गया। नि:संदेह हमें पाकिस्तान से हर तरह के संबंध खत्म कर देने चाहिए। लेकिन अगर खेल में संबंध खत्म करने की बात आती है तो सिर्फ क्रिकेट और हॉकी को ही क्यों बलि का बकरा बनाया जाता है। बाकी खेल वैसे ही होते हैं। कुश्ती, कबड्डी, बॉक्सिंग, टेनिस व दूसरे खेलों पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जाता है। इनकी •ाी पाकिस्तानी टीमें •ाारत नहीं आनी चाहिए। टेनिस में •ाारत के महेश •ाूपति और पाकिस्तान के ऐसामुल हक की जोड़ी नहीं बननी चाहिए। दरअसल शुरू से ही दोनों देशों के लोगों ने कला, संस्कृति और खेल को राजनीति और दुश्मनी से अलग रखा है। जिस तरह से संगीत के क्षेत्र में •ाारत के लोगों ने पाकिस्तानी गायकों आतिफ असलम, राहत फतेह अली खान, नुसरत फतेह अली खान, मेहदी हसन, गुलाम अली को जैसे फनकारों को पलकों पर बिठाया है, ठीक उसी तरह जगजीत सिंह, किशोर कुमार, मोहम्मद रफी, बिस्मिल्लाह खान, लता मंगेशकर, देवानंद जैसे फनकारों को इज्जत दी। सचिन तेंदुलकर को पाकिस्तान में सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है। पाकिस्तान के पूर्व कप्तान वसीम अकरम पाकिस्तान में कम और •ाारत में ज्यादा नजर आते हैं, बल्कि वो तो कोलकाता नाइट राइडर्स के बॉलिंग कोच •ाी हैं। उनपर अंगुली क्यों नहीं उठाई जाती। बेशक पाकिस्तान हमारे लिए मुश्किल पैदा करता है, लेकिन दोनों सरहदों के पार एक आम इंसान रूहानी सुकून चाहता है, जो सिर्फ खेल और संगीत से उसको मिलता है। •ाारत-पाक क्रिकेट मैच का रोमांच दुनिया में सबसे जुदा होता है, जिसपर दुनिया के स•ाी देश अपनी नजर गड़ाए रहते हैं। •ाले ही पूर्व क्रिकेटर, सांसद कार्ति आजाद ने गावस्कर की हां में हां मिलाई हो, लेकिन सच तो ये है कि किसी •ाी क्रिकेट खिलाड़ी ने क•ाी •ाी क्रिकेट का विरोध नहीं किया, चाहे वो •ाारत-पाक के बीच क्रिकेट मुकाबला हो या किसी अन्य देश का। •ाारत को पाकिस्तान से हर तरह के रिश्ते खत्म कर लेने चाहिए, लेकिन इसमें सिर्फ क्रिकेट को ही न चुना जाए।

Wednesday, 11 July 2012

सम्पादकीय पर आमिर


सम्पादकीय पर आमिर


आसिफ इकबाल
आमिर खान। हिंदुस्तान के लिए कोई अनजाना नाम नहीं है। शायद ही कोई होगा, जो आमिर को न जानता हो। हिंदी फिल्मों के मिस्टर 'परफैक्शनिस्ट' अब अखबारों के सम्पादकीय पन्ने पर नजर आ रहे हैं। शायद ही कोई •ाारतीय इतिहास में अ•िानेता हो, जिसने अखबारों के सम्पादकीय पेज पर जगह बनाने में कामयाबी हासिल की हो। हमेशा मीडिया से दूरी बनाए रहने वाला ये सुपर स्टार अचानक मीडिया से कैसे जुड़ गया, इस राज को तो बखूबी आमिर के अलावा और कोई नहीं जानता। एक फिल्म करने के लिए 40 करोड़ का मेहनताना लेने वाला शख्स देश•ार के शहरों की खाक छानने लगा। आज आमिर के लग•ाग हर प्रतिष्ठित अखबार में कॉलम आना ये बताता है कि आमिर रुपहले पर्दे के कलाकार ही नहीं, वरन एक अच्छे लेखक •ाी बनते जा रहे हैं। स्टार प्लस के धारावाहिक सत्यमेव जयते से छोटे पर्दे पर कदम रखने के साथ ही आमिर को सराहना के साथ-साथ विरोध का •ाी सामना करना पड़ा। विरोध ऐसा कि प्रतिष्ठित मेडिकल संस्था आईएमए ने आमिर के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का मन बना लिया, लेकिन आमिर ने संस्था से माफी मांगने से इनकार कर दिया। सत्यमेव जयते के पहले एपीसोड से ही आमिर की आलोचना शुरु हो गई। आलोचकों का कहना था कि •ाले ही आमिर ने सत्यमेव जयते के स्लोगन को ले लिया हो, पर सच्चाई तो ये है कि आमिर कोई समाजसेवा नहीं कर रहे हैं। वो तो सिर्फ पैसे कमाने के लिए सत्यमेव जयते जैसे •ाावनात्मक स्लोगन का सहारा ले रहे हैं। बात •ाी सही हैं। आमिर ने समाजसेवा का ठेका थोड़ी ले रखा है। आमिर •ाी इस देश के आम नागरिकों में से एक हैं। समाजसेवा का काम तो नेताआों, अधिकारियों का होता है, जो देश की आजादी के बाद से जनता की किस तरह से सेवा कर रहे हैं, वो बखूबी दिखाई देता है। रही बात सत्यमेव जयते से पैसे कमाने की, तो सरकार को •ाी जनहित में कोई सूचना देने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ते हैं, जिनमें नेताओं और संबंधित अधिकारियों का कमीशन •ाी शामिल होता है। आमिर को अगर पैसा ही कमाना था, तो वो फिल्म निर्माण और एक्टिंग के अलावा विज्ञापन से करोड़ों की कमाई कर सकते हैं। एक वेबसाइट के अनुसार आमिर की वार्षिक आय 12 मिलियन डॉलर है। आमिर ने एक टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में खुलासा किया था कि सत्यमेव जयते की शूटिंग की वजह से इन्होंने बहुत से विज्ञापनों को छोड़ दिया, जिनसे उन्हें सत्यमेव जयते के निर्माण में लगने वाली रकम से कई गुना ज्यादा कमाई हो सकती थी। सवाल ये उठता है कि आमिर को अगर कमाई ही करनी थी, तो वो छोटे पर्दे पर इस तरह के धारावाहिक पर पैसा लगाने के बजाए, बिग बॉस, रोडीज, इमोशनल अत्याचार, सच का सामना या लोगों को रातोंरात करोड़पति बना देने वाले धारावाहिकों में निवेश कर सकते थे। वैसे •ाी दर्शकों और आलोचकों में इस तरह के धारावाहिकों पर आलोचना करने लायक कुछ नहीं मिलता है। लोगों की धड़कने बढ़ाने वाले और पैसे जिताने वाले एंकर्स की कोई आलोचना नहीं करता है। शायद ऐसे कार्यक्रम देश व संस्कृति को चुनौती नहीं देते हैं। सालाना15 मिलियन डॉलर कामने वाले शाहरुख, 13.5 मिलियन डॉलर कमाने वाले अक्षय कुमार, 6 मिलियन डॉलर कमाने वाले वाले सलमान खान और 3 मिलियन डॉलर कमाने वाले अमिता•ा बच्चन को ऐसा क्यों नहीं लगता है कि सत्यमेव जयते जैसे धारावाहिक बनाने पर अच्छी खासी रकम को खींचा जा सकता है। दरअसल किसी •ाी अ•िानेता के पास इतना वक्त नहीं है कि वो देश •ार में घूमकर अपना कीमती वक्त बर्बाद कर सके। •ाले ही आमिर की कुछ लोग आलोचना कर रहे हों, पर सच्चाई तो ये है कि देश का हर पीड़ित खासो-आम इंसान आमिर की प्रशंसा कर रहा है। आमिर खान ने आलोचकों की परवाह किए बगैर सत्यमेव जयते को जारी रखा है। सत्यमेव जयते को लेकर मीडिया ने आमिर का •ारपूर साथ दिया और आमिर •ाी अब हर हफ्ते अपने लेखों के जरिए वि•िान्न अखबारों के संपादकीय पन्ने पर नजर आ रहे हैं, जो ये बताता है कि सत्यमेव जयते के जरिए ही आमिर ने अखबारों के मुख्य पृष्ठ तक जगह बनाई।

Tuesday, 10 April 2012

अपनी हिफाजत

आप सभी को अवगत कराना चाहता हूं कि इस व्यंग्य को मैंने तब लिखा था जब जनरल वीके सिंह सेना अध्यक्ष थे और रियारमेंट से पहले बोल रहे थे कि हमारी सेना के पास उच्च कोटि के हथियार नहीं हैं. चौकीदार-वीके सिंह चौधरी - अमेरिका प्रधान मंनमोहन सिंह (तत्कालीन प्रधानमंत्री)



गांव के लोगों में खुसर-पुसर मची थी। स•ाी गफलत में थे कि आखिर गांव में चल क्या रहा है। पूरा गांव झम्मनलाल को ढूंढ रहा था। इतने में झम्मनलाल कंधे पर कई लाठियां लादकर देश की अर्थव्यवस्था की तरह डगमगाता चला आ रहा था। लोगों ने झम्मन का अफवाहों की तरह स्वागत किया। क्योंकि हमारे गांव के लोग अफवाहों को हाथोंहाथ लेते हैं। झम्मनलाल ने इससे पहले क•ाी इतना सम्मान नहीं पाया था। घसीटे ने झम्मन के कंधों से लाठियां उतारीं और पूछा: क्या बात है झम्मन, इतनी सारी लाठियां लेकर क्यों आ रहे हो? 

झम्मन: अबे पहले पानी पिला, प्यास से गला सूख रहा है। तुम्हें तो अपनी जान की फिकर है नहीं, और जो तुम्हारी जान-माल की हिफाजत के लिए  ये सब कर रहा है, उसे मार डालो प्यासा। घसीटे ने तुरंत झम्मन को पानी का गिलास पकड़ाते हुए कहा: आखिर माजरा क्या है? 

झम्मन: क्या माजरा-माजरा करते हो। कहीं माजरा के चक्कर में तुम सब की मजार न बन जाए। तुम्हें तो पता है कि हमारे पड़ोसी गांव हमसे कितना चिढ़ते हैं। जहां देखते हैं तरी, वहीं बिछा लेते हैं दरी। गांव के कितने खेतों में उनके बिजूका खड़े होकर हमारे जानवरों को डरा रहे हैं। हमारे गांव के प्रधान ऐसे हैं कि वो खुद  बिजूका बनकर हमे डराते हैं। वो गांव का चौकीदार पता नहीं क्या-क्या बोलता फिर रहा है। 
घसीटे: तुमने मजार की बात कर दी, अब मुझे डर लग रहा है। अब झम्मन बता •ाी दो क्या बात है। झम्मन: दरअसल बात है हमारे गांव के चौकीदार की। घसीटे: अरे वो चौकीदार जो बोल रहा था कि वो हमाए लल्ला से छोटा है। सबने कह तो दिया था कि हां •ााई तुम छोटे हो। अब क्या ये बोल रहा है कि मुझे दोबारा जनम लेना है?

 झम्मन : हां, हां वही। उसने प्रधान को चिट्ठी लिखी थी कि गांव में सुरक्षा के इंतजाम ठीक नहीं हैं। उसकी लाठी को महंगाई की वजह से तेल नहीं मिल पाया। जिसकी वजह से वो कमजोर हो गई है। रात को पहरा देने के लिए लालटेन में •ाी तेल नहीं है। कुल मिलाकर झेलो मुसीबत। वो चिट्ठी प्रधान तक पहुंचने से पहले अपने गांव के काबिल लेखू पत्रकार के पास पहुंच गई और उसने गांव की समस्याओं के साथ-साथ इस समस्या को •ाी अखबार में छाप दिया। बात पड़ोसी गांवों को •ाी पता चल गई। मैं जा रहा था शहर, तो मैंने रास्ते में देखा कि पड़ोसी गांव के लोग अपनी लाठी को तेल पिला रहे थे, नए-नए बिजूके खड़े कर रहे थे। उन्हें पता चल गया है कि हमारा चौकीदार अगर ये बात बोल रहा है तो सही होगी। नाश हो इस चौकीदार का। इतने साल से चौकीदारी कर रहा है, पहले कुछ नहीं बोला। जब जाने वाला है तो अचानक इसे गांव की सुरक्षा व्यवस्था खराब लगने लगी। 

घसीटे ने सहमकर कहा: तो चलो सरपंच ननकू से शिकायत करते हैं पड़ोसियों की। एक वही हैं जो हमारी फरियाद ध्यान से सुनते हैं।

 झम्मन: नाम मत लो ननकू का। कल की बात सुनी तुमने, पहले तो ननकू बोले कि जो आदमी हमारे गांव में आग लगा गया था और  पड़ोसी गांव में छिपा बैठा है, उसका पता बताने वाले को ईनाम दिया जाएगा। जब उस आदमी ने बोल दिया कि मैं तुम्हारी औकात जानता हूं। अपने निर्णय को बदलो, वरना तुमसे लाठियां खरीदना बंद। तुम्हें तो पता है कि सरपंच लाठियां बेचकर ही अपना काम चलाते हैं। तो आज वो हमसे बोल रहे हैं कि हमने उसके अपराध के सबूत लाने के लिए ईनाम घोषित किया है। और तुम्हें तो पता है कि हमारे सबूतों का इन पर कितना असर होता है। अपने गांव के माननीय जब इनके गांव जाते हैं तो कपड़े उतरवाकर चेक करके सबूत मांगते हैं। हम सूखे से जूझ रहे हैं। एक गांव से पानी की नहर लानी थी तो सरपंच ने बोल दिया कि तुम्हारे गांव के खेत सूखते हैं, तो सूखने दो। तुम उस गांव से नहर नहीं निकाल सकते। क्योंकि वो गांव सरपंच पर लाठी ताने खड़ा है। •ाइया दुनिया •ार में लाठियां चल रही हैं। इसलिए चौकीदारों के •ारोसे मत रहो और अपनी हिफाजत खुद करो। 

Monday, 2 April 2012

ये कैसी है खुजली


आसिफ इकबाल
गर्मी की चिलचिलाती धूप में झम्मनलाल बरगद के पेड़ के नीचे लेटा अपनी पीठ खुजला रहा था। घसीटे  ने अचानक नारद मुनि की तरह प्रकट होकर झम्मन की चारपाई पर अपनी तशरीफ रखते हुए सवाल दागा, ''अरे झम्मन क्या हुआ, पाीठ में कोई तकलीफ है क्या?'' झम्मन ने करवट लेकर घसीटे की जामुन की तरह काली शक्ल देखी और बोला, ''गर्मी की वजह से पीठ में खुजली हो रही थी, तो खुजला रहा था। वैसे इस खुजली का अपना मजा है। जब होती है, तो इसे खुजलाने में जन्नत का मजा आता है। वैसे •ाी जब आदमी के पास कोई काम-धाम न हो तो उसे खुजली होना लाजमी है।'' घसीटे ने माथे पर बल डालते हुए पूछा, ''मतलब। '' झम्मन, ''अरे यार घसीटे त•ाी कहता हूं मेंटॉस खा और दिमाग की बत्ती जला, क्योंकि अपने गांव में बिजली की कमी है, तो लोगों के दिमाग कमजोर हो गए हैं।'' ''ओह, तो अब समझ में आया कि आपका दिमाग चाचा चौधरी की तरह कम्प्यूटर से •ाी ज्यादा तेज क्यों है। ये सब मेंटॉस का कमाल है। वैसे तुम खुजली की बात कर रहे थे।'' घसीटे ने झम्मन की याद्दाश्त बढ़ाते हुए कहा।

 झम्मन, ''अरे हां, देखो घसीटे, खुजली कई प्रकार की होती है।'' घसीटे ने बीच में बात काटते हुए कहा, ''मुझे पता है दाद, खाज, खुजली।'' झम्मन, ''मैं जानता हूं कि तुमने बीसी में बीएससी की है।'' घसीटे, ''ये बीसी क्या होता है?'' झम्मन, ''बीसी मतलब •ााईचारा। जैसे हमारा और तुम्हारा •ााईचारा है। अब बचे-खुचे दिमाग को ज्यादा खर्च मत करों, वरना आगे की सोच खत्म हो जाएगी।'' झम्मन ने अपनी बात को जारी रखा और बोला, ''खुजली कई प्रकार की होती है, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक।'' ''तो झम्मन •ाइया तुम्हें कौन सी खुजली है।'' घसीटें ने पूछा। झम्मन, ''अब मेरे हाथ में खुजली हो रही है। चुपचाप बात सुन वरना, अपनी खुजली मिटाऊं फिर...'' घसीटे, ''ठीक है झम्मन बोलो। मैं समझ गया तुम्हें शारीरिक खुजली है।'' झम्मन ने झल्लाते हुए कहा, ''चुप हो जा मेरे दादा। तेरे मुंह में बहुत खुजली है।'' घसीटे ने अपने मुंह में लगाम लगा ली। झम्मन आगे बोला, '' शारीरिक खुजली का मतलब, जो खुजली हमारे बदन के किसी •ााग में होती है। आर्थिक खुजली का मतलब धन-दौलत से है। जब हाथ में खुजली होती है, तो लोग कहते हैं कि या तो धन आएगा या फिर जाएगा। ये खुजली नेताओं और अधिकारियों को ज्यादा होती है। '' घसीटे ने बात को फिर काटते हुए पूछा, ''अ•ाी तो तुम बोल रहे थे कि चुप हो जा, वरना मेरे हाथ में खुजली होने लगेगी। तो क्या हिंसा •ाी आर्थिक खुजली में आती है।''

झम्मन ने अपने गुस्से पर काबू पाते हुए कहा, ''जैसे तुझे समझने में सुविधा हो, वैसे समझता जा। इसके बाद मानसिक खुजली। मानसिक खुजली इंसान को तब होती है, जब वो किसी समस्या को सुलझाने का •ारसक प्रयास करता है। अपने देश में ऐसे लोगों की तादाद सबसे ज्यादा है। इसे दिमागी खुजली के नाम से •ाी जाना जाता है। जब कोई समस्या सुलझ जाती है, तो दिमागी खुजली अपने-आप मिट जाती है। इसके बाद नंबर आता है सामाजिक खुजली का। इससे पीड़ित व्यक्ति किसी काम का नहीं होता है। जिसे प्यार से पुकारा जाता है, न काम का, न काज का दुश्मन अनाज का।'' घसीटे बीच में बोल पड़ा, ''जैसे तुम। कल तुम्हारी अम्मा •ाी तो यही बोल रही थीं।''

झम्मन को गुस्सा तो आया, पर कड़वी दवा की तरह उसे निगलकर बात को जारी रखा, ''ऐसे इंसान के पास कोई काम नहीं होता है, तो उसे खुजली होती है कि फालतू में बैठने से पहले कुछ किया जाए। जैसे अपने गांव के चौकीदार को देख लो। उसके पास कुछ काम तो है नहीं। दिन•ार सोता रहता है और रात को •ाी। कल गांव के प्रधान से रोना रो रहा था कि हमारे पास अच्छी लाठी नहीं है। रात में पहरा देने के लिए लालटेन नहीं है। कैसे करें गांव की सुरक्षा? फिर क्या था, पड़ोस के गांव वालों ने सुन ली वो बात और होने लगी उनके दिमागी खुजली के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक खुजली। और तुम्हें तो पता है कि जब तक खुजली न मिटे, चैन नहीं पड़ता है। पिछले चार साल से चौकीदारी कर रहा है, तब न दिखी उसे गांव पर खतरा। अब जब प्रधान ने एक दिन उसकी जगह दूसरे चौकीदार को रखने की बात कही, तो गांव पर संकट आ गया। अब इस बात को लेकर गांव में राजनीतिक खुजली होने लगी है। अब तुम्हें राजनीतिक खुजली के बारे में बताने की जरूरत नहीं है। ये खुजली न तो क•ाी मिटी है और न ही क•ाी मिटेगी। अब चल जरा मेरी पीठ खुजा। बहुत खुजली हो रही है।'' झम्मन ने घसीटे से उम्मीद •ारे स्वर में कहा।

Saturday, 24 March 2012

बेरोजगारी की लट्ठमार होली



आसिफ इकबाल 

घसीटे गुस्से में ऐसे बड़बड़ाता चला जा रहा था, जैसे सीधे जाकर कोई नई क्रांति लिख देगा। वैसे घसीटे के लिए ये कोई नई बात नहीं थी, ये तो उसकी खानदानी आदत है। इसके पिता भी सामाजिक जंगी थे। सोशल सिस्टम से इतनी जंग लड़ी कि घर के सामानों में ज़ंग लग गई। बेचारे घसीटे के पिता लोटेलाल नई क्रांति लिखते-लिखते सरकारी अस्पताल के मृत्यु पंजीकरण रजिस्टर में अपना नाम लिखा बैठे। गए थे सरकारी अस्पताल की बदहाल व्यवस्था पर धरना देने, अस्पताल में पानी इतना भरा था कि पैर फिसला और खुद ही धरे रह गए। सिर पर टूटी दीवार का एक पत्थर लगा और उनके जिस्म की आक्सीजन बाहर आकर प्रदूषण बन गई। लगता है दिमाग की उसी चोट ने घसीटे के  दिमाग को प्रभावित कर रखा है। इसमें घसीटे को क्या दोष देना। चलो पूछा जाए आखिर माजरा क्या है जो घसीटे इतना गुस्सा है।


 ‘‘अरे घसीटे, क्यों भांप के इंजन की तरह हांफ रहे हो, आखिर माजरा क्या है मुझे भी तो बताओ?’’ घसीटे ने गुस्से से झम्मन की तरफ देखा और बोला, ‘‘देखो,  यार झम्मन एक तो वैसे भी मेरी चादर फटी पड़ी है और ऐसी फटी है कि उसकी रफू करने वाला कोई नहीं है। और तुम हो कि’’....झम्मन ने घसीटे के गुस्से को भांपते हुए अपने चेहरे को अपने जज्बातों से तुरंत डिस्कनेक्ट किया और गंभीर होकर पूछा, ‘‘आखिर बात क्या है? ’’ घसीटे: ‘‘क्या बताएं झम्मन, तुम्हें तो पता है कि मैंने कितनी मेहनत से पढ़ाई-लिखाई की, क्या-क्या नहीं किया डिग्री पाने के लिए। स्कूल में मस्टराइन की सब्जी लाता था, उनके बच्चे को सुसु कराता था। माट साब की साइकिल धोता था, राशन की लाइन में लगकर उनका मिट्टी का तेल भी मैं लाता था। दिन-दिन भर धोबी के गधे की तरह लगा रहता था और जब थोड़ा बहुत टाइम मिलता था, तो सो जाता था। पढ़ने का समय नहीं मिलता था फिर भी मैंने डिग्री हासिल कर ली। और इस डिग्री ने ऐसी गत बनाई कि पूरा बदन टूट रहा है।’’ झम्मन ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘घसीटे डिग्री का बदन टूटने से क्या ताल्लुक?’’ घसीटे ने चिल्लाते हुए कहा, ‘‘यार लगता है महंगाई बढ़ने से तुम्हारी रोटी के लाले पड़ गए हैं। तभी तुम फोकट में मेरा दिमाग खाकर अपना पेट भर रहे हो।’’ झम्मन ने माहौल को समझकर घसीटे को सम्मान देते हुए कहा, ‘‘घसीटे भाई, बात तो बताओ।’’ घसीटे: ‘‘क्या बताएं झम्मन, लखनऊ गए थे धरना-प्रदर्शन करने।’’ झम्मन: ‘‘फिर क्या हुआ?’’ घसीटे: ‘‘तो फिर होना क्या था, खेली गई लट्ठमार होली।’’


झम्मन: तो लखनऊ क्यों बोल रहे हो, लट्ठमार होली तो बरसाना में होती है!’’ घसीटे: तुम्हें तो पूरी कहानी निबंध में समझानी पड़ती है। अरे यार नौकरी के लिए कर रहे थे सरकार के खिलाफ धरना प्रदर्शन। तुम्हें तो पता है मैं अपने पिता से कितना प्रभावित हूं। मैं भी बढ़-चढ़कर अपनी आवाज माइक से बुलंद कर रहा था। फिर क्या था, चलवा दी सरकार ने पानी की बौछार के साथ लठ। बस फर्क इतना था कि होली के पानी में रंग होता है और ये पानी बेरंग होकर भी सरकार का रंग छोड़ रहा था। कोई कार के पीछे था, तो कोई दीवार फांदकर भाग रहा था। शहर को पानी की सप्लाई के लिए सरकार के पास पानी नहीं होता है, लेकिन जब हम गरीब आंदोलन करते हैं तो पता नहीं फालतू पानी बहाने के लिए कहां से आ जाता है। तुम्हें तो पता है कि मुझे पानी से कितना डर लगता है।


 इसी पानी की वजह से ही मेरे पिताजी खर्च हो गए थे। मैंने चिल्लाना शुरू कर दिया, जल ही जीवन है, जल ही जीवन है...जब इससे नहीं माने तो मैंने महात्मा गांधी की लाठी का सहारा लिया और भाषण देने लगा, महात्मा गांधी के पास भी तुम लोगों के जैसी लाठी थी, लेकिन उन्होंने हमेशा अंहिसा का पाठ पढ़ाया और तुम लोग इससे हिंसा फैला रहे हो। प्रशासन के लिए सरकार के आदेश से बड़ा कुछ नहीं होता है। सबने सोचा यही धरने का मुख्या नेता है. जमकर चली लाठी और खुलकर पड़ी बौछार, न पूर्व सरकार और न वर्तमान सरकार, अपने लिए तो सब बेकार, क्योंकि हम हैं  बेरोजगार, जो जिंदगी भर खाते रहेंगे सरकार की मार, अब चलता हूं यार, मां कर रही है घर में इंतजार’’...ये कहता हुआ घसीटे आगे बढ़ गया।

Friday, 16 March 2012

सुपरमैन न बैटमैन, सिर्फ कॉमनमैन



अरे दादा इतने परेशान क्यों दिख रहे हो? आखिर माजरा क्या है? क्या ममता दीदी ने वित्त मंत्री बदलने के लिए सरकरार  से सिफारिश की है? क्योंकि रेल बजट को पेश करने के बाद रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी के सिर पर तलवार लटक रही है। सुना है आपने भी ऐसा बजट पेश कर दिया कि लेने के देने पड़ गए। दादा ने माथे पर सवालिया निशान बनाते हुए पूछा: तुम्हें कैसे पता? झम्मनलाल: क्या बात करते हो दादा, नाम तो नहीं पता, लेकिन एक शायर ने क्या खूब कहा है कि इश्क और मुश्क छुपाए नहीं छुपते हैं। दादा: अब बजट से इश्क और मुश्क का क्या ताल्लुक? झम्मनलाल: हां, वो तो मुझे भी नहीं पता, लेकिन बोल दिया तो बोल दिया। और एक बार जो मैं बोल देता हूं तो....खैर छोड़िए आज सल्लू की वांटेड फिल्म देख ली, तो थोड़ा फिल्मी हो गया। जिस तरह आपने बजट पेश कर दिया तो कर दिया। अब चाहे वो किसी को समझ में आए या न आए। चलिए मजाक से हटकर बात करता हूं।

दरअसल जब मैं आपके पास आ रहा था तो मुझे एक कॉमनमैन मिला। बेचारा बड़ा दुखी था। दादा: अब ये कॉमनमैन कौन है? झम्मनलाल: अरे आप कॉमनमैन को नहीं जानते? दादा: नहीं, झम्मनलाल: लेव कर लेव बात। दुनिया में एक कॉमनमैन ही तो है, जो सुनने में लगता है कि ही-मैन, सुपरमैन, बैटमैन या स्पाइडरमैन की तरह बड़ा ताकतवर होगा, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। ये लोग तो संकट आने पर मोचक बन जाते हैं, लेकिन कॉमनमैन हमेशा संकट के लिए रोचक बन जाता है। संकट को कॉमनमैन काफी पसंद है। जब देखों तब कॉमनमैन के पीछे पड़ा रहता है। भौतिक सुख इसके लिए भूत की तरह होते हैं। अगर आपका कभी अपने वायुयान या मोटर कार से पैदल सड़क पर घूमने का इत्तेफाक पड़े, तो किसी भी राह चलते आदमी से बात कर लेना। उससे पूछना, कैसे हो भाई? वो बोलेगा: अब क्या बताएं कैसे हैं, इतनी कम इनकम में कैसे बच्चों की पढ़ाई लिखाई होगी, महंगाई ने कमर तोड़ रखी है। मतलब यह कि कॉमनमैन हमेशा रोता मिलेगा। परेशानी इसके दाएं और मुसीबत इसके बाएं खड़ी रहती है। आप बुरा मत मानना, हो सकता है ये सरकार को गाली भी दे दे। आप कॉमनमैन को क्या जानो। जब कुर्सी पर बैठने का समय आता है, तो ये बिना चश्मे के आपको स्टेचू आॅफ लिबर्टी की तरह दूर से दिखाई पड़ जाते हैं। लेकिन सत्ता का चश्मा लगने के बाद आपकी दूर और पास दोनों की नजर खराब हो जाती है। फिर तो आपको अपने दामन के दाग भी दिकाई नहीं देते। चलो अब कौन बनेगा करोड़पति खेलना बंद करता हूं और सवाल-जवाब पर विराम लगाते हुए बताता हूं कि ये कॉमनमैन कौन है। कॉमनमैन मतलब भटकती आत्मा और धरती का बोझ। दादा ने आश्चर्यचकित होकर पूछा: मतलब! झम्मनलाल हंसते हुए: हाहाहा...क्या बताएं दादा, मजाक की थोड़ी आदत मुझे पड़ गई है। कॉमनमैन को हिंदी में कहते हैं आम आदमी। इसकी ''आमदनी'' में न तो ये कभी आम खा पाता है और उधार की ''देनी'' हमेशा इसके साथ जुड़ी रहती है। जो देश में सबसे ज्यादा तादाद में होते हुए भी कुछ खास लोगों में आम बना रहता है। चुनिंदा लोगों को खास बनाने में ये बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है। और तो और खास बनाने के बाद अपनी परेशानी को भूलकर जश्न भी मनाता है। बिल्कुल उसी तरह से जैसे बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना। अब देखिए आपको भी तो इसने आम से खास बनाया है। शुक्र मनाइए कि आम आदमी की याद्दाश्त बहुत कमजोर होती है।

बड़ी जल्दी पिछली बातों को भूल जाती है। वरना आप भी अबतक खास से आम बन गए होते। सुना है आपने इसकी जेब काट ली। अब क्या ये भी काम शुरू कर दिया? दादा: किसने कहा यह? मैं क्यों किसी की जेब काटूंगा? झम्मनलाल: अरे ये मैं थोड़ी कह रहा हूं। ये तो बाहर एक कॉमनमैन चिल्लाता जा रहा था कि दादा बजट की अटैची में कैंची लेकर संसद भवन गए थे, जिससे कॉमनमैन की जेब काटी गई। इन्हीं बातों के दरमियां एक आदमी चिल्लाता निकला सचिन ने शतकों का शतक पूरा कर लिया, सचिन ने शतकों का शतक पूरा कर लिया...उस आदमी को देखकर झम्मनलाल बोला: चलो शुक्र है कि इस देश में रुलाने वालों के अलावा कुछ खास लोग खुशी देने वाले भी हैं...शुक्रिया सचिन

Friday, 9 March 2012

आवाम ने सपा को नहीं, अखिलेश को चुना है


स•ाी समीकरणों को धता बताते हुए समाजवादी पार्टी ने यूपी में पूर्णबहुमत से अपना परचम फहरा दिया। सपा की शानदार जीत और बसपा को मिली हार ने ये साबित कर दिया कि जनता को समझ पाना हर किसे के बस की बात नहीं। बसपा सुप्रीमों मायावती ने हार का ठीकरा पूरी तरह से कांग्रेस, •ााजपा, मीडिया और मुसलमान के ऊपर फोड़ा। जबकि सच्चाई तो ये है कि बसपा की हार की वजह खुद मायावती ही हैं। •ाले ही मायावती इनको कोस रही हों, लेकिन उत्तर प्रदेश की आवाम ने सपा को नहीं बल्कि युवा नेता अखिलेश यादव को वोट दिया है। सपा अपनी जीत पर जो इतना इतरा रही है, वो सिर्फ अखिलेश की मेहनती और बेदाग होना है। यूपी की आवाम ने समाजवादी पार्टी को नहीं, बल्कि अखिलेश यादव को वोट दिया है। क्योंकि जनता को किसी •ाी दल में ऐसा चेहरा नहीं दिखा, जो उनके प्रदेश के मुस्तकबिल को नई रौशनी दे सके। अखिलेश ही एकमात्र ऐसा चेहरा दिखा, जो •ा्रष्टाचार की कालिख से बेदाग था और जिसमें प्रदेश की आवाम से रूबरू होने की अजीब कला है।

चुनाव प्रचार के दौरान अखिलेश के बयानों में कोई •ाी ऐसी बात नहीं बोली गई, जिससे आवाम या चुनाव आयोग को कोई परेशानी हुई हो। इस बात से साफ जाहिर होता है कि अखिलेश ने कितनी कुशलता से एक परिपक्व नेता की मिसाल पेश की, जबकि सालों से राजनीति कर रहे उनसे दोगुनी उम्र के नेताओं को गलत बयानबाजी की वजह से मीडिया और चुनाव आयोग का कोप•ााजन बनना पड़ा। यहां तक कि मुलायम सिंह यादव को •ाी चुनाव प्रचार के दौरान गलत बयानबाजी की वजह से आवाम और चुनाव आयोग से माफी मांगनी पड़ी थी। राहुल गांधी को अखिलेश से बेहतर आंका जा रहा था। अखिलेश समझ चुके थे कि यदि जाति और धर्म के नाम पर सरकार बनती है, तो •ााजपा यूपी और देश में राज कर रही होती। पेट की •ाूख से बड़ी आवाम के लिए कोई चीज नहीं होती। जिस वजह से वो एक जमीनी कार्यकर्ता की तरह साइकिल से चलकर उत्तर प्रदेश की आावाम से मुखातिब हुए। देश •ार का मीडिया राहुल के ग्लैमर को कांग्रेस की जीत के रूप में देख रहा था। लेकिन राहुल •ाी राजनीति के खेल में कच्चे निकले और सरेआम सपा के घोषणापत्र को फाड़कर उन्होंने राजनीतिक समझ का बखूबी परिचय दे दिया। अखिलेश के बयानों में उत्तर प्रदेश के विकास के सिवा कुछ नहीं था, जबकि अन्य दलों ने जाति और धर्म के नीम पर आवाम को अपने हक में करना चाहा। मुलायम सिंह को अखिलेश पर पूरा •ारोसा था, इसलिए उन्होंने क•ाी •ाी उनकी बात को नहीं टाला। यहां तक कि विधानस•ाा चुनाव में टिकट के बंटवारे से लेकर दागियों को बाहर करने के फैसले पर •ाी उन्होंने पूरी तरह से चुप्पी साधे रखी और अपने चहेते साथी आजम खान के गुस्से का शिकार हुए। अखिलेश का चुनावी एजेंडा पहले से ही साफ था। इसका नमूना उन्होंने दागी नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाकर दे दिया था। सपा की गुंडाराज की छवि को बदलना उनका पहला मकसद था। सपा की जीत में अन्ना के •ा्रष्टाचार के खिलाफ जारी आंदोलन को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। अन्ना ने जो आंदोलन चला रखा है, उसका गहरा असर देश की जनता पर है। पिछले कुछ महीनों में •ा्रष्टाचार विरोध की जो आंधी चली, उसने देश के नौजवान से लेकर बूढ़े तक को सत्ता बदलने पर मजबूर कर दिया। जहां मायावती मीडिया और मुसलमानों को सपा की जीत और बसपा की हार का जिम्मेदार ठहरा रही हैं, वो पूरी तरह से गलत है।
 मीडिया ने पूरी तरह से राहुल गांधी की जमकर पब्ल्सिटी की। प्रियंका के चेहरे से कैमरा नहीं हटा। यहां तक कि उनके पति रॉबर्ट वाड्रा को •ाी •ाविष्य में यूपी के तारणहार के रूप में पेश कर दिया। रही बात अन्य लोगों की, तो मायावती अपने पिछले कार्यकाल को रिवर्स करके गौर फरमाएं तो उन्हें •ा्रष्टाचार और हत्याओं की तस्वीर साफ नजर आएगी। आवाम ने सपा को जिताया नहीं, बल्कि •ा्रष्टाचार को हराया है। पूरे उत्तर प्रदेश में खड़ी हाथियों व बसपा सुप्रीमों की मूर्तियां और एनआरएचएम घोटाला चीख-चीखकर •ा्रष्टाचार की गवाही दे रहा है। मुस्लिम वोट तो वैसे •ाी सपा का पारंपरिक वोट रहा है। जैसा कि कयास लगाए जा रहे हैं कि यूपी विधानस•ाा चुनाव ही लोकस•ाा चुनाव 2014 तस्वीर को संवारेंगे, एकदम सही है। •ा्रष्टाचार मुद्दे ने काम करना शुरू कर दिया है। लोगों को एक ऐसे नेता की तलाश है, जो पूरी तरह से पाक-साफ हो। और इसी का नतीजा है कि आवाम ने सपा को नहीं, अखिलेश को वोट दिया है। आवाम को सपा से नहीं, बल्कि अखिलेश से उम्मीदें हैं। इस जीत से सपा को खुशफहमी में रहने की जरूरत नहीं है। अगर आवाम ने उन्हें जिताया है, तो उसे अपनी गुंडाराज की छवि बदलकर, लोगों को यूपी को एक बेहतर प्रदेश की तस्वीर दिखानी होगी। सपा के पास यूपी में आगे •ाी राज करने का सुनहरा मौका है, उसके लिए उसे अखिलेश की सोच पर काम करना होगा।

Wednesday, 7 March 2012

मुर्गी नहीं, कुर्सी छीन ली


झम्मनलाल अपनी खचाड़ा साइकिल में बैठकर बाजार जा रहे थे कि अचानक उनकी नजर नुक्कड़ में उदास बैठी बहनजी पर पड़ी।  झम्मनलाल से रहा नहीं गया और वो पूछ बैठा, ''अरे बहनजी इतनी उदास क्यों बैठी हो? तुम्हारे चेहरे पर हमेशा हंसी की लाली रहती थी। वो कहां गुम हो गई। क्या मुंबई से सैंडल लेकर अ•ाी तक विशेष विमान नहीं आया क्या? ईरान ने पेट्रोल महंगा कर रखा है, कहीं रास्ते में विमान का ईंधन तो नहीं खत्म हो गया। आखिर माजरा क्या है? चेहरे पर क्यों उदासी छाई है, क्या तुम्हारी किसी ने मुर्गी चुराई है?''

 बहनजी ने उदासी •ारे लहजे में कहा, ''क्यों मजाक करते हो चाचा? किसी ने मेरी मुर्गी नहीं, बल्कि मेरी कुर्सी छीन ली है। क्या-क्या नहीं किया था, उस कुर्सी के लिए। कई लोगों को पकड़कर इंजीनियरों की एक टीम बनाई। इन्हीं इंजीनियरों ने खून-पसीना एक करके या ये कहें कि लोगों का खून पीकर इस कुर्सी को तैयार किया। जब ये कुर्सी बनकर तैयार हुई, तो सालों तक इसके न टूटने की गारंटी दी गई। पर पता नहीं कुर्सी को किसकी नजर लग गई। मैंने सोचा चलो कुछ विकास किया जाए। तेजी से विलुप्त हो रहे हाथियों को संरक्षित करने के लिए उनकी मूर्तियां खड़ी करवाईं, सोचा कि आने वाली नस्ले डायनासोर की तरह हाथियों को •ाी याद रखेंगी, लेकिन यहां के लोगों को •ाविष्य की बिल्कुल चिंता नहीं है।''

 झम्मनलाल, ''लगता है आपकी कुर्सी छीनने में इन हाथियों का बहुत बड़ा हाथ है। इन्हीं हाथियों ने तुम्हारी लुटिया डुबा दी। अरे कितना पैसा लगाया तुमने हाथियों की फौज खड़ी करने में, कितने नाजों से पाला इन्हें, दुनिया जमाने से बैर लिया, लेकिन सिला क्या मिला, छिनवा दी न कुर्सी। मैंने तो पहले ही कहा था कि कुत्ता पालो, बिल्ली पालो, घोड़ा पालो, रट्टू तोता यानी मिट्ठू बेटा पालों। क्योंकि ये सब वफादार प्राणी होते हैं। पर तुमने तो गलतफहमी के साथ-साथ हाथी पाल लिए। यहां राजेश खन्ना की फिल्म हाथी मेरा साथ थोड़ी चल रही है कि हाथी पे हाथी की फौज खड़ी करती चली जा रही हो। जितना पैसा नकली हाथियों पर खर्च कर दिया, उतना अगर असली हाथियों पर करतीं तो जिंदगी •ार उसी में बैठकर चुनावी प्रचार करतीं। इससे चुनाव प्रचार का खर्च •ाी बचता और हाथी •ाी संरक्षित हो जाते। अब जिसकी कुर्सी उसके हाथी। मुझे तो डर है कि अब बेचारे हाथियों का क्या होगा। तुमने अपनी •ाी तो मूर्तियां लगवाई हैं, क्या तुम्हें •ाी संरक्षण की आवश्यकता है? तुम्हें •ाी •ाविष्य में लोग टिकट खरीदकर देखने आएंगे। और तुम कुछ ज्यादा ही बोलती हो। दुनिया•ार में हाथियों की कीमत बढ़ाकर बताने की क्या जरूरत थी? खुला हाथी लाख का, ढंका हाथी सवा लाख का। अरे ये कंगाल लोग क्या जाने रुपये की अहमियत। लाख के सवा लाख ही तो किए थे, बताइए कुर्सी ही छिनवा दी।'' बहनजी, ''अरे झम्मनलाल, मेरे सिर पर हाथ रख।''

झम्मनलाल, ''अब कौन सी कसम खिलाने वाली हो सिर पर हाथ रखवाकर?, मैं अपना वोट दे चुका हूं।'' ''अरे नहीं, जरा मेरे माथे पर हाथ रखकर देख, कहीं बुखार तो नहीं है मुझे? झम्मनलाल, '' बहनजी तुम्हें तो बहुत तेज बुखार है। लगता है तुमने कुर्सी छिनने की घटना दिल पर ले ली है। चलो हकीम साहब के पास, देसी जड़ीबूटी की दवा दिलवा देता हूं। '' बहनजी, ''नहीं, मुझे हॉस्पिटल ले चलों।''

झम्मनलाल, ''इसके लिए तो सरकारी अस्पताल जाना पड़ेगा और मुझे वहां जाकर अपनी शामत थोड़ी बुलवानी है। वहां सुना है डॉक्टर नहीं, सीबीआई वाले सबका आॅपरेशन कर रहे हैं। पता चला है कि वहां के कई डॉक्टरों ने इतनी दवाई खा ली कि दुनिया से रुखसत हो गए। और ये दवा किसने खिलाई उसको ढूंढ रहे हैं। बहनजी, '' तो झम्मन, जहां तू चाहे मुझे ले चल।''

झम्मनलाल, '' ले तो चलूंगा, पर मेरे पास तो •ाई साइकिल है और इसमें तुम बैठोगी नहीं।'' बहनजी, '' अरे झम्मन, मुसीबत में तू किसी में •ाी बैठाएगा तो बैठ जाऊंगी, पर मुझे यहां से ले चल।''

Monday, 27 February 2012

जनता का स्वयंवर

आसिफ इकबाल
लोकतंत्र के जश्न की चुनावी धुन पर सभी मगन हैं। क्या छोटे, क्या बड़े सभी उत्साह से एक ही लाइन में बटन दबाने के लिए खड़े। वोटिंग के लिए उत्साह इतना कि लाइन की धक्का मुक्की से आपस में ही लड़े। इसके बाद पीछे से सुरक्षाबलों के डंडे भी झेलने पड़े। घर आने पर वहीं पुराने भाषण सुनने पड़े, क्या मिला तुम्हें वहां खड़े-खड़े? बर्बाद हो गए इस चक्कर में बड़े-बड़े। अब साफ करो बर्तन जो सुबह से हैं गंदे पड़े। अब वो नेता कहां रहे भाई? आजादी के बाद बापू जो सादगी, ईमानदारी, टोपी, चश्मा और डंडा देश के नेताओं को दे गए थे, तो सादगी देश के विकास में देखने को मिलती है और ईमानदारी स्विस बैंक में सेफ है। टोपी तो नेताओं ने जनता को पहना रखी है और चश्मे पर भ्रष्टाचार की कालिख पुत गई है। बचा डंडा, तो उसे आम आदमी की सेवा में लगा रखा है। कुछ नौजवान नेता अन्ना की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को चीटिंग मान इसकी खिलाफत कर रहे हैं। उनका कहना है कि जब देश को लूटने का उनका नंबर आया, तो अन्ना भ्रष्टाचार पर पाबंदी लगाने के लिए आंदोलन करने बैठ गए। भई मामला थोड़ा टेलीविजन टाइप का है। जैसे राखी सावंत ने टेलीविजन में स्वयंवर रचाकर अपने लिए दुनिया का सबसे सुंदर, सुशील, संस्कारी और धनी वर का चुनाव करके ये साबित किया था कि उन्हें दुनिया का सबसे योग्य वर मिल गया है। लेकिन कुछ ही दिनों बाद वहीं सुंदर, सुशील, संस्कारी और अमीर अचानक 'सुंदर से बंदर', 'सुशील से जलील', 'संस्कारी से व्याभिचारी' और 'अमीर से फकीर' हो गया। फिर किस्मत ने मारी लात, तो उछल पड़ी बारात। बात को अन्ना के आंदोलन की तरह लंबा न खींचते हुए मुद्दे पर आता हूं। दरअसल, यूपी में चुनावी बयार बह रही है। प्रदेश की स्थिति कुछ राखी सावंत के स्वयंवर की तरह हो गई है। यहां जनता बनी है राखी सावंत और सरकार बनी है भावी वर। जनता इस चुनावी स्वयंवर के जरिए अपने भावी पति का चुनाव हर तरह से ठोक-बजाकर कर रही है। सभी दलों ने अपने उम्मीदवार रूपी दागी दूल्हों को काले धन की तरह खोपचे में छिपा दिया है और नौजवान, सुंदर, सुशील, संस्कारी दूल्हों को इस स्वयंवर में जनता रूपी दुल्हन को अपने आगोश में लेने के लिए उतार दिया है। जनता को पूरी उम्मींद है कि भावी पति उसकी अच्छी तरह से देखभाल करेगा, उसका भविष्य सुधारेगा। खैर अभी तो स्वयंवर टेलीविजन के एपीसोड की तरह चल रहा है। कुछ दिन बाद जनता वोटमाला पहनाकर अपना दूल्हा चुन लेगी। कुछ दिनों, महीनों या सालों बाद जनता को पता चलेगा कि उसने जिस पति में दुनिया की सारी खूबी देखीं, वो तो उसकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा है। राखी सावंत ने कुछ ही दिनों में सगाई के बाद वर में बुराई देखकर रिश्ता तोड़ लिया था, लेकिन राखी रूपी जनता को अगले पांच साल तक इंसाफ करने का मौका नहीं मिलेगा। फिर कौन करेगा 'राखी का इंसाफ?' पांच साल तक तो उसे सरकार रूपी पति की मनमानी को अन्ना के मौन व्रत की तरह चुपचाप रहकर सहना पड़ेगा। बेचारी जनता तो राखी की तरह बेशर्म है नहीं, जो मीडिया भी उसकी बात रख सके। जनता अपनी वोटमाला उसी वर के गले में डाले,जो उसका उसी तरह ख्याल रख सके,जैसे किसी दल की सरकार होने पर इंसान से ज्यादा जानवरों (हाथियों) का रखा जाता है।



Saturday, 25 February 2012

किस्सा इडियट बॉक्स का


रात को पति की नींद अचानक खुल गई। ऐसा लगा कि कहीं कोई औरत रो रही है। डरते-डरते पति देव ने लाइट जलाई तो देखा कि पत्नी की आंखों से गंगा-जमना कि तरह दो धाराएं बह रही हैं। पति ने पत्नी के कुछ बोलने से पहले सुबह से लेकर शाम तक की अपनी गतिविधियों को स्कैन कर डाला कि कहीं उसने जाने-अंजाने में पत्नी को कुछ बोल तो नहीं दिया। आखिरकार जब पत्नी से रोने की वजह पूछी तो पत्नी की जवाब था कि फला चैनल पर आने वाले फला धारावाहिक की फला औरत का पति कई दिनों से लापता है। क्या वो वापस घर आ पाएगा? इनकों अपने से ज्यादा दूसरों की फिक्र है। भई ये हाल है हमारे देश में टीवी का। टीवी वालों को भी चैन नहीं है कि वो किसी को चैन से सोने दें। घर की शांति व्यवस्था को भंग करने में टीवी ने विश्व कीर्तिमान स्थापित कर रखा है।

 घर मे सुख शान्ति बनाए रखने के लिए एक सिस्टम होता है। पत्नी वित्तमंत्री है, सास रक्षामंत्री है, ससुर विदेशमंत्री और साली लोक सम्पर्क मंत्री होती है। अब सभी का सोचना ये होता है कि पति प्रधानमंत्री होता होगा, लेकिन बेचारा पति प्रधानमंत्री नहीं, जनता होता है। जिसकी घर में एक नहीं चलने वाली होती है। एक तो दिन भर गधे जैसा काम करे और रात में जैसे ही टीवी के सामने थोड़ा मनोरंजन करने के लिए बैठे तो पीछे से आवाज आती है कि सुनिए जरा फला चैनल लगाना, आज उसमें फला का बेटा, फला को लेकर भागने वाला है। लो फिर भैंस गई पानी में। पति महोदय को टीवी पर चल रहे मैच में देखना है कि लोगों को बेसब्री से अपने शतकों के शतक का प्रशाद भगवान सचिन कब देंगे, लेकिन अगर चैनल चेंज नहीं किया तो पता चला कि प्रशाद के चक्कर में घर में खाना ही नहीं मिला। कहने को तो हमारे देश को पुरुष प्रधान कहा जाता है, पर दुनिया में इसकी छवि महिला प्रदान देश की है।

देश को महिला प्रधान बनाने का पूरा श्रेय टीवी यानी इडियट बॉक्स को जाता है। जिसने सभी को इडियट बना रखा है। कौन कहता है कि हमारे देश की महिलाएं अबला हैं। आज टीवी में प्रसारित होने वाले धारावाहिकों में महिलाएं क्या नहीं कर रही हैं। सारे के सारे धारावाहिक महिला प्रधान होते हैं। घर के मर्द आराम फरमाते हैं और महिलाएं उनके दुश्मनों से पंगा लेकर पूरा बिजनेस संभालती हैं। मजाल है कि घर का मर्द उनके सामने कुछ बोल जाए। ये भी एक बहुत बड़ा कारण है मर्दों का सीरियल पसंद न करने का। कुछ महिलाएं तो ऐसी है, जिन्हें देखकर मरहूम अमरीश पुरी की आत्मा भी कांप जाती है। धारावाहिकों में कुछ महिलाएं तो ऐसी हैं, जिनसे पूरा गांव-शहर थर्राता है। दरअसल महिलाओं के टीवी से चिपकने के कई जायज कारण हैं। सास इसलिए टीवी से चिपकी रहती हैं कि बहु को कैसे काबू में किया जाए और बहु इसलिए कि सास को कैसे काबू में किया जाए। एक दूसरे को फंसाने के नए-नए कॉपीराइट आइडिए धारावाहिकों से ही कॉपी किए जाते हैं। पाकिस्तान में भारतीय धारावाहिकों के हिट होने में पता चला है कि वहां के मर्द और औरतें दोनों ही यहां के धारावाहिकों को पसंद करते हैं। क्योंकि वहां के आतंकी इन धारावाहिकों की खलनायिकाओं से खतरनाक आइडियों को आत्मसात कर रहे हैं। कुछ किरदारों को तो उन्होंने अपना आदर्श बना लिया है। धारावाहिकों का सबसे गहरा सदमा घर के मर्द को झेलना पड़ता है।

धारावाहिकों में किराए के कपड़े और ज्वैलरी पहनने वाली महिलाओं को देखकर पत्नी की डिमांड बढ़ जाती है। शादियों में भी महिलाओं में चर्चा का विषय यही होता है कि देखा फला सीरियल में उसने क्या किया, उसका क्या हुआ। धारावाहिक में अगर प्रेमिका अपने प्रेमी के साथ भागती है, तो यही महिलाएं वाह-वाह करती है, लेकिन अगर पड़ोस की कोई लड़की अपने प्रेमी संग फुर्र हो जाए तो उसके चाल चलन पर अंगुलियां उठने लगती हैं। भला है कि घर की महिलाएं ही सीरियल पसंद कर रही हैं, क्या होगा जब मर्द भी टीवी से चिपक जाएंगे?

Friday, 24 February 2012

हमें दुश्मन का पता है



आसिफ इकबाल
देश की राजधानी दिल्ली से जुड़े  एक शहर में लड़की की उसके नौकर समेत हत्या कर दी जाती है। केस खुला हुआ होता है, पर उस  केस को सुलझाने में हमारी पुलिस को कई सालों बाद सफलता मिलती है। दिल्ली में इजरायली दूतावास के पास कार में विस्फोट होता है। इसकी जांच करने के लिए इजरायल से विशेष जांच दल आता है। और हमारे देश की सुरक्षा एजेंसी उनकी फाइल पकड़ के खड़ी रहती हैं। जांच के नाम पर अमेरिकी कुत्ते भी भारत के महापुरुषों की समाधि में आकर टांग उठाकर मूत जाते हैं। और हमारे देश की सुरक्षा एजेंसी के काबिल सिपाही कुत्ते के मूत की जांच में जुट जाते हैं कि इनके कुत्ते क्या खाते हैं, जो हमसे ज्यादा अच्छी तरह से जानकारी जुटा लेते हैं। इनका बस चले तो ये विदेशी सुरक्षा एजेंसियों से ये कहने लगें कि इन कुत्तों के गले का पट्टा हमारे गले में क्यों नहीं डाल देते। हमारे गले में तो वैसे भी सत्ता का पट्टा डला होता है। आप के पास तो दुनिया की सत्ता का पट्टा है। आप तो कई देशों के गले में पट्टा डाले हुए हैं। किसी की मजाल जो आपके सामने भौंक जाए।

विदेशी जांच दल में आए एक अमेरिकी अधिकारी ने देसी सुरक्षा एजेंसी के अधिकारी से सवाल किया, तुम्हारे रहते हमें तुम्हारे देश में क्यों आना पड़ता है। देसी अधिकारी:, दरअसल हमारे पास और भी बहुत से काम हैं। हम आपकी तरह फ्री नहीं रहते हैं। अब यही देखिए, 9/11 के बाद से आपके लिए काम का टोटा हो गया है। न तो आपके यहां कोई बड़ी आतंकी घटना हुई और न ही कोई बड़ा घोटाला हुआ, जबकि हमारे पास तो इतना काम है कि इसे निपटाने के लिए आप जैसे लोगों को काम देना पड़ता है ताकि आपके भी बच्चे पलते रहें। हमारे देश के रहनुमा काफी दयालु स्वभाव के हैं। आपके राष्ट्रपति जी तो खुद आए थे नौकरी मांगने यहां। अब हमारे यहां नौकरी तो हैं नहीं, इसी प्रकार आपकी मदद कर देते हैं। यहां आपके लायक काम करने की पूरी गांरटी है। अब यहीं देखिए कि जहां आप खड़े हैं, पता नहीं कब यहां भी विस्फोट हो जाए। और आपकी जांच करने के लिए कोई दूसरा दल विदेश से रवाना कर दिया जाए। विदेशी जांच दल का अधिकारी छिटक के दूर खड़ा हो जाता है। देसी अधिकारी: अरे साहब डरिए नहीं, जिस जांच के लिए आप यहां तशरीफ लाए हैं, वो हमें पता है कि ये विस्फोट किसने करवाया है। हमारा सबसे बड़ा सहयोगी मीडिया है, जो विस्फोट के दस मिनट के अंदर पूरी दुनिया को ये बात बता देता है कि घटना में किसका हाथ है। फिर हमें बोलने की कोई जरूरत ही नहीं होती है। विदेशी अधिकारी:, सुना है आपकी सीआईडी बहुत तेजी से केस को सॉल्व कर देती है। देसी अधिकारी:, अरे आप भी लगता है मेरी बीवी की तरह टीवी के नशेड़ी हैं। आपके पास कोई काम नहीं है, तो दिन भर टीवी से चिपके रहते होगे। और इसी वजह से आपने टीवी वाली सीआईडी को देख लिया होगा। भला आप ही बताइए, एक घंटे में कहीं केस सॉल्व किया जाता है क्या? हम पूरी तरह से केस को स्टडी करने के बाद ही किसी नतीजे में पहुंचते हैं। अब समझ में आया कि लादेन को मारने में आप लोगों को इतना टाइम क्यों लगा। आपके पास भी तो जेम्स बांड था, तो पकड़ लेते दो घंटे में पिक्चर की तरह। ऐसे तो हमारे पास शक्तिमान, क्रिश और रॉ-वन भी हैं, जो पलक झपकते ही दुश्मनों को ढेर कर देते हैं। सबसे बड़ा हथियार साउथ के सुपर स्टार रजनीकांत हैं, जो असंभव को संभव करने के लिए जाने जाते हैं और अभी तक उनके इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं पड़ी। बात करते हैं आप भी। चलिए आप जांच करिए, हमें और भी बहुत से काम हैं, नेताजी का फोन आया है कि किसी नेता को पार्टी से निकाल दिया है और उन्हें शक है कि उसने अपने पद में रहकर बहुत माल कमाया है। हमारे देश में तो जांच का सबसे बड़ा विषय यही है भैया। विदेशी अधिकारी जाते हुए देसी अधिकारी का मुंह ताकता रह गया और अपनी कार्यप्रणाली की जांच करने लगा। जय हिंद!


Monday, 20 February 2012

गाड़ी डरा रही है



गाड़ी बुला रही है, सीटी बजा रही है। लेकिन बेचारा झम्मनलाल गाड़ी की सीटी सुनकर परेशान हो जाता है। सीटी की आवाज सुनकर किसी सस्पेंस फिल्म की तरह सोच में पड़ जाता है कि क्या वो अपने दोस्त की शादी में इंदौर पहुंच पाएगा। दरअसल, तीन महीने बाद इंदौर में उसके दोस्त की शादी है। पिछले हफ्ते झम्मन ने अखबार में खबर पढ़ी कि रेलवे ने किराया बढ़ाने का मन बना लिया है। रेलवे का तर्क है कि यात्रियों की सुरक्षा और बढ़ती रेल दुर्घटनाओं को देखते हुए यह कदम उठाना जरूरी हो गया है। अब घर के सामान की खरीददारी में अठन्नी-चवन्नी बचाने वाले झम्मन के ऊपर किराए का अतिरिक्त बोझ बढ़ जाने से गंतव्य तक पहुंचने में संकट खड़ा हो रहा है। झम्मन का तर्क है कि जिस मंत्रालय के मंत्री ने आईआईएम जैसे अति विशिष्ट संस्थान के छात्रों को मैनेजमेंट का पाठ पढ़ाया, उसका ही विभाग अपना मैनेजमेंट खुद क्यों नहीं बना पाया। आखिर उन्होंने अपने कार्यकाल में ऐसा क्या किया कि दूसरा मंत्री आते ही अचानक रेलवे ब्लेड लेकर यात्रियों की जेब काटने पर उतारू हो गया। अगर इनका बस चलता, तो पटना से दिल्ली, मुंबई, चेन्नई तक के लिए लोकल ट्रेन की व्यवस्था कर देते। रेल मंत्रालय को ये बात सुनिश्चित करनी चाहिए कि ट्रेन समय से स्टेशनों में पहुंचेंगी। क्योंकि रेलवे ट्रैक पर आत्महत्या करने वाला मरने के इंतजार में भूख से मर जाएगा, पर गाड़ी टाइम से नहीं आएगी। रेल मंत्रालय को ये भी सुनिश्चित करना चाहिए कि यात्रियों की सुविधाओं की कमी नहीं होगी, खाना अच्छी क्वालिटी का होगा, स्टेशनों में उचित दामों में सामान मिलेगा, वहां साफ-सफाई होगी, जेब कतरे जेल में आराम करेंगे और यात्रियों को बैठने के लिए सीट मिलेगी। क्योंकि लोगों की भीड़ को देखते हुए कुछ ट्रेनों का नाम गाय-भैंस एक्सप्रेस होना चाहिए। अगर यूपी की मुख्यमंत्री रेल मंत्री होतीं, तो गाड़ियों के नाम क्या होते इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। हो सकता है गरीब रथ एक्सप्रेस, हाथी रथ एक्सप्रेस बन जाती। लेकिन झम्मन को अभी तक एक बात समझ में नहीं आ रही है कि रेलवे अभी तक जो किराया यात्रियों से वसूलता था, वो किस बात का था। उसमें क्या ये सब सुविधाएं देने का वादा नहीं था। अब झम्मन को डर लग रहा है कि अगर किसी भी संगठन ने रेलवे द्वारा बढ़ाए जा रहे किराए का विरोध किया और किराया नहीं बढ़ा तो उसके जानमाल के खतरे की जिम्मेदारी कौन लेगा। फिर तो यात्रियों की सुरक्षा राम भरोसे हो जाएगी। अगर भविष्य में कभी रेल दुर्घटना होती है, तो रेल मंत्रालय ये कहकर अपना पल्ला झाड़कर एक तरफ खड़ा होकर कहेगा कि हमने तो पहले ही कहा था कि अपनी सुरक्षा के लिए अलग से दक्षिणा चढ़ानी होगी। आप जितने पैसे से टिकट खरीदते हैं, वो तो मंत्रियों की ही जेबें नहीं भर पाता है, यात्रियों की सुरक्षा कहां से हो। जो लोग किराया बढ़ाने की दलील दे रहे हैं, उनके लिए तो सरकार फ्री में एसी के टिकट मुहैया कराती है। लेकिन रेल में सबसे ज्यादा सफर झम्मनलाल जैसे लोग करते हैं, जिन्हें अपनी हिफाजत के लिए सरकार को अतिरिक्त धन देना होगा। वाह रे झम्मनलाल ...आसिफ इकबाल


Sunday, 19 February 2012

राष्ट्रीय शर्म



कितने शर्म की बात है कि दिल्ली में कोई पटाखा फोड़ गया। प्रधानमंत्री की तरफ से बयान आया कि कितनी शर्मनाक बात है। वैसे अपने देश में ऐसी कई घटनाएं हो जाती हैं, जो राष्ट्रीय शर्म का कारण बनती हैं। हमने अपने अंदर से  शर्मीला स्वभाव इस तरह से निकाल दिया है, जैसे मुलायम सिंह ने अमर सिंह को। देश में कुपोषण और भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, इस पर भी प्रधानमंत्री कहते हैं कि कितने शर्म की बात है। कितने भी बड़े आतंकवादी हमले हो जाए, बयान एक ही होता है, कितने शर्म की बात है। शर्म भी ये बात सुन-सुनकर बोर हो गई है कि जब लोगों को शर्म नहीं आती है, तो बार-बार उस पर आरोप लगाकर उसे बदनाम क्यों किया जा रहा है। शर्म ने भी कोर्ट में अर्जी दाखिल करने का मन बना लिया है कि हर घटना राष्ट्रीय शर्म की बात क्यों होती है। करता कोई और है और आरोप शर्म पर लगाए जाते हैं। मेरा सबसे ज्यादा नुकसान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ने किया है। मुझे दरकिनार करके इसका सहारा लेकर कुछ भी बोल और कर दिया जाता है। कर्नाटक की विधानसभा में मंत्री पोर्न फिल्म देखते हैं और आरोप शर्म पर मढ़ दिया जाता है। आज जो शर्म की जो बात की जा रही है, असल में वो अब रही कहां। किसी लड़की को कोई लड़का छेड़ता है, तो उसका कहना होता है कि शर्म नहीं आती। इसी तरह नेताओं को झूठे वादे करने में शर्म नहीं आती, बालिकाओं को अधनंगे कपड़े पहनने में शर्म नहीं आती, सरकार को जनता का धन अपनी दानवकद मूर्तियां लगवाने में शर्म नहीं आती, प्रशासन को बिगड़ती सामाजिक व्यवस्था देखकर शर्म  नहीं आती और पुलिस को बढ़ते अपराध देखकर शर्म नहीं आती। शर्म का तर्क है कि जब मैं किसी के साथ जुड़ी नहीं हूं, तो मुझे खामखा बदनाम क्यों किया जा रहा है। प्रधानमंत्री या किसी भी मंत्री को बोलने से पहले ये सोच लेना चाहिए कि यहां पर सभी ने ये मुहावरा आत्मसात कर रखा है, 'जिसने की शर्म, उसके फूटे कर्म'। मुझे तो लगता है कि मेरा नाम शर्म है, इसलिए मेरे कर्म ज्यादा फूटे हैं। जब सब बेशर्म हो गए हैं तो शर्म का क्या काम। मैं तो वैसे भी दुनिया से विलुप्त होती जा रही हूं। मेरे संरक्षण की किसी को भी फिक्र नहीं है। देश में टाइगर को बचाने की मुहिम चल रही है, कन्याओं को बचाने की मुहिम चल रही है और न जाने किसे-किसे बचाने की मुहिम चल रही है, लेकिन मुझे बचाने की किसी को भी फिक्र नहीं है। ये भी एक राष्ट्रीय शर्म की बात हो सकती है। देखा जाए तो देश से क्या पूरी दुनिया से शर्म पतली गली से निकल ली है। जहां आतंकियों को कहीं भी विस्फोट करने में शर्म नहीं है, तो एटमी हथियार का हव्वा खड़ा करके, किसी भी देश में कब्जा जमाने में अमेरिका को शर्म नहीं आती है। इतना सबकुछ ये दुनिया वाले करते हैं और फिर कहते हैं कि ये एक राष्ट्रीय शर्म की बात है। शुक्र है यही दुनिया के रखवाले ही मुझे इलेक्शन में वोटर की तरह याद कर लेते हैं। वैसे मेरी जगह बेशर्मी ने ले ली है। जहां देखों वहां आपको बेशर्मी खड़ी मिल जाएगी, चाहे वो गली हो, गांव हो, शहर हो, शादी हो, पार्टी हो, मनोरंजन हो, राजनीति हो, खेल हो, जेल हो या फिर किसी आइटम की सेल हो। अब तो मुझे ही अपना दुखड़ा रोते-रोते शर्म आ गई। शायद मेरी व्यथा सुनने के बाद किसी को शर्म आ जाए।

हम सब कुत्ते हैं



आसिफ इकबाल
अक्सर लोग आवेश में आकर अपने दुश्मनों को बद्दुआ दे देते हैं कि कुत्ते की मौत मरेगा। इसी तरह से कुछ मुहावरे भी कुत्तों के सम्मान को ठेस पहुंचाते हुए आम इंसानों द्वारा बनाए गए हैं। मसलन, कुत्ते की तरह क्यों भौंक रहा है, कुत्ते की नस्ल वगैरह, वगैरह...। भले ही किसी जमाने में कुत्ते को कुत्ते की नजर से देखा जाता हो, पर आज के दौर में कुत्ते ने देश में बढ़ते भ्रष्टाचार की तरह तेजी से तरक्की की है। इंसानों ने कुत्ते की आदतों को काफी हद तक आत्मसात करना शुरू कर दिया है। और हो भी क्यों न। आजकल कुत्ते अच्छा खा रहे हैं, बड़ी-बड़ी महंगी गाड़ियों में घूम रहे हैं। हसीन महिलाओं की गोद में खेलते कुत्ते जवान इंसानों के अरमानों पर पानी फेरते नजर आते हैं। बडेÞ-बड़े अफसरों के पास लोगों से मिलने का टाइम नहीं है, पर कुत्ते में अपने लाडले बच्चे का अक्स देखकर पूरा टाइम देते है। पूरी फैमिली इस कुत्ते के आगे कुत्ता बनी रहती है। धार्मिक ग्रंथों से ज्यादा लोग कुत्ता पालने के साहित्य में रुचि दिखा रहे हैं। लगता है यही कुत्ता इनका उद्धार करने वाला है। दरअसल, कुत्ता पालने के पीछे भी एक राज है। मालिक और कुत्ते की कहानी तो जगजाहिर है। मौजूदा परिवेश में कुत्ते की वफादारी से काफी सबक लिया जा रहा है। बॉस कुत्ता इसलिए पाल रहा है कि वो अपने नीचे के कर्मचारियों के नेचर के बारे में जान सके, उसकी वफादारी को पहचान सके। कर्मचारी इसलिए कुत्ता पाल रहा है कि वो अपने बॉस के प्रति किस तरह से वफादार बने, इसका पता लगा सके।
समय के साथ-साथ कुत्ते को भी अकल आई और उसने अपने नेचर में बदलाव किया। इंसानों पर कई सालों की रिसर्च के बाद उसने पाया कि किस तरह इनके घर में घुसा जा सकता है। कुत्ते ने इंसानों की संस्कृति को आत्मसात किया, अपनी नस्ल के कुत्तों के अलावा अपने मालिक के घर की तरफ आंख उठाने वाले पर भौंकना शुरू कर दिया। आखिर उसे भी तो अपनी वफादारी का सबूत मालिक को पेश करना है। ऐसे कुत्ते की ऊंची शान को देखते हुए, गली के कुत्तों को ईर्ष्या होना स्वाभाविक है। वो भी हर ऊंचे रसूखदार इंसान को देखकर भौंकने के बजाए पूंछ हिलाने लगे। शायद इन गली छाप कुत्तों को ये नहीं पता कि जो कुत्ता इतनी ठाठ-बाट से रह रहा है, वो कोई ऐसा-वैसा कुत्ता नहीं । उसको ऐशो-आराम विरासत में मिला है। उसके पूर्वज भी इस सुख को भोगते रहे हैं। आज भी उनकी नस्लों का ऐशो आराम की जिंदगी पर एकछत्र राज है। तुम ठहरे गली के कुत्ते, अगर अभी भी तुम्हें अकल नहीं आई, तो तुम्हारी नस्लें आगे भी गली के कुत्ते की तरह रहेंगी। अब गली का कुत्ता सोच में पड़ गया कि किस तरह से बदलाव लाया जाए, जो उसकी आने वाली नस्लें सुकून से ऐशो-आराम की जिंदगी जी सकें।