Friday, 9 March 2012

आवाम ने सपा को नहीं, अखिलेश को चुना है


स•ाी समीकरणों को धता बताते हुए समाजवादी पार्टी ने यूपी में पूर्णबहुमत से अपना परचम फहरा दिया। सपा की शानदार जीत और बसपा को मिली हार ने ये साबित कर दिया कि जनता को समझ पाना हर किसे के बस की बात नहीं। बसपा सुप्रीमों मायावती ने हार का ठीकरा पूरी तरह से कांग्रेस, •ााजपा, मीडिया और मुसलमान के ऊपर फोड़ा। जबकि सच्चाई तो ये है कि बसपा की हार की वजह खुद मायावती ही हैं। •ाले ही मायावती इनको कोस रही हों, लेकिन उत्तर प्रदेश की आवाम ने सपा को नहीं बल्कि युवा नेता अखिलेश यादव को वोट दिया है। सपा अपनी जीत पर जो इतना इतरा रही है, वो सिर्फ अखिलेश की मेहनती और बेदाग होना है। यूपी की आवाम ने समाजवादी पार्टी को नहीं, बल्कि अखिलेश यादव को वोट दिया है। क्योंकि जनता को किसी •ाी दल में ऐसा चेहरा नहीं दिखा, जो उनके प्रदेश के मुस्तकबिल को नई रौशनी दे सके। अखिलेश ही एकमात्र ऐसा चेहरा दिखा, जो •ा्रष्टाचार की कालिख से बेदाग था और जिसमें प्रदेश की आवाम से रूबरू होने की अजीब कला है।

चुनाव प्रचार के दौरान अखिलेश के बयानों में कोई •ाी ऐसी बात नहीं बोली गई, जिससे आवाम या चुनाव आयोग को कोई परेशानी हुई हो। इस बात से साफ जाहिर होता है कि अखिलेश ने कितनी कुशलता से एक परिपक्व नेता की मिसाल पेश की, जबकि सालों से राजनीति कर रहे उनसे दोगुनी उम्र के नेताओं को गलत बयानबाजी की वजह से मीडिया और चुनाव आयोग का कोप•ााजन बनना पड़ा। यहां तक कि मुलायम सिंह यादव को •ाी चुनाव प्रचार के दौरान गलत बयानबाजी की वजह से आवाम और चुनाव आयोग से माफी मांगनी पड़ी थी। राहुल गांधी को अखिलेश से बेहतर आंका जा रहा था। अखिलेश समझ चुके थे कि यदि जाति और धर्म के नाम पर सरकार बनती है, तो •ााजपा यूपी और देश में राज कर रही होती। पेट की •ाूख से बड़ी आवाम के लिए कोई चीज नहीं होती। जिस वजह से वो एक जमीनी कार्यकर्ता की तरह साइकिल से चलकर उत्तर प्रदेश की आावाम से मुखातिब हुए। देश •ार का मीडिया राहुल के ग्लैमर को कांग्रेस की जीत के रूप में देख रहा था। लेकिन राहुल •ाी राजनीति के खेल में कच्चे निकले और सरेआम सपा के घोषणापत्र को फाड़कर उन्होंने राजनीतिक समझ का बखूबी परिचय दे दिया। अखिलेश के बयानों में उत्तर प्रदेश के विकास के सिवा कुछ नहीं था, जबकि अन्य दलों ने जाति और धर्म के नीम पर आवाम को अपने हक में करना चाहा। मुलायम सिंह को अखिलेश पर पूरा •ारोसा था, इसलिए उन्होंने क•ाी •ाी उनकी बात को नहीं टाला। यहां तक कि विधानस•ाा चुनाव में टिकट के बंटवारे से लेकर दागियों को बाहर करने के फैसले पर •ाी उन्होंने पूरी तरह से चुप्पी साधे रखी और अपने चहेते साथी आजम खान के गुस्से का शिकार हुए। अखिलेश का चुनावी एजेंडा पहले से ही साफ था। इसका नमूना उन्होंने दागी नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाकर दे दिया था। सपा की गुंडाराज की छवि को बदलना उनका पहला मकसद था। सपा की जीत में अन्ना के •ा्रष्टाचार के खिलाफ जारी आंदोलन को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। अन्ना ने जो आंदोलन चला रखा है, उसका गहरा असर देश की जनता पर है। पिछले कुछ महीनों में •ा्रष्टाचार विरोध की जो आंधी चली, उसने देश के नौजवान से लेकर बूढ़े तक को सत्ता बदलने पर मजबूर कर दिया। जहां मायावती मीडिया और मुसलमानों को सपा की जीत और बसपा की हार का जिम्मेदार ठहरा रही हैं, वो पूरी तरह से गलत है।
 मीडिया ने पूरी तरह से राहुल गांधी की जमकर पब्ल्सिटी की। प्रियंका के चेहरे से कैमरा नहीं हटा। यहां तक कि उनके पति रॉबर्ट वाड्रा को •ाी •ाविष्य में यूपी के तारणहार के रूप में पेश कर दिया। रही बात अन्य लोगों की, तो मायावती अपने पिछले कार्यकाल को रिवर्स करके गौर फरमाएं तो उन्हें •ा्रष्टाचार और हत्याओं की तस्वीर साफ नजर आएगी। आवाम ने सपा को जिताया नहीं, बल्कि •ा्रष्टाचार को हराया है। पूरे उत्तर प्रदेश में खड़ी हाथियों व बसपा सुप्रीमों की मूर्तियां और एनआरएचएम घोटाला चीख-चीखकर •ा्रष्टाचार की गवाही दे रहा है। मुस्लिम वोट तो वैसे •ाी सपा का पारंपरिक वोट रहा है। जैसा कि कयास लगाए जा रहे हैं कि यूपी विधानस•ाा चुनाव ही लोकस•ाा चुनाव 2014 तस्वीर को संवारेंगे, एकदम सही है। •ा्रष्टाचार मुद्दे ने काम करना शुरू कर दिया है। लोगों को एक ऐसे नेता की तलाश है, जो पूरी तरह से पाक-साफ हो। और इसी का नतीजा है कि आवाम ने सपा को नहीं, अखिलेश को वोट दिया है। आवाम को सपा से नहीं, बल्कि अखिलेश से उम्मीदें हैं। इस जीत से सपा को खुशफहमी में रहने की जरूरत नहीं है। अगर आवाम ने उन्हें जिताया है, तो उसे अपनी गुंडाराज की छवि बदलकर, लोगों को यूपी को एक बेहतर प्रदेश की तस्वीर दिखानी होगी। सपा के पास यूपी में आगे •ाी राज करने का सुनहरा मौका है, उसके लिए उसे अखिलेश की सोच पर काम करना होगा।

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