Thursday, 4 May 2017

चलो आज थोड़ा वक्त सा हो जाऊं

कभी ख़ुद को पाऊं कभी खो जाऊं
चलो आज थोड़ा वक्त सा हो जाऊं
इन लम्हों को कर दूं ज़रा आवारा
थोड़ा सा हंस लूं थोड़ा रो जाऊं

चलता रहूं दिन रात
करता रहूं बातों में बात
कहां ठहरूं कहां सो जाऊं
चलो आज थोड़ा वक्त सा हो जाऊं

सफ़र में मेरे संग होते बहुत हैं
किसको रोकूं सब खोते बहुत हैं
यादों के दरिया में ख़ुद को डुबो जाऊं
चलो आज थोड़ा वक्त सा हो जाऊं

कुछ अरमां ,कुछ  सपने साथ चलते हैं
कुछ बनते हैं मिसाल, कुछ हाथ मलते हैं
कहीं आसमां तो कहीं ज़मीं हो जाऊं
चलो आज थोड़ा वक्त सा हो जाऊं...

No comments:

Post a Comment