Saturday, 27 April 2013

करनी होगी बच्चियों की हिफाजत




आसिफ इकबाल

आखिर कहां है वो कानून जो महिलाओं के लिए दिल्ली गैंगरेप के बाद बनाया गया था। उन आरोपियों  को तीन  महीने  के अन्दर  सजा की बात हुई थी, लेकिन अभी भी उनका कुछ नहीं हुआ। बलात्कार पीड़ित के लिए स्पेशल डॉक्टरों की सेल बनाने पर सहमति हुई थी, जो अभी तक अमल में नहीं आई। कहां गए वो एक हजार करोड़ रुपये, जो महिला सुरक्षा के लिए बजट में पारित किए गए थे। दिल्ली में एक बार फिर दरिंदगी ने अपना सिर उठाया और  इस बार इस दरिंदगी का शिकार पांच साल की मासूम बच्ची हुई। वो बच्ची, जिसे हर आदमी भैया, चाचा या मामा की तरह दिखता है। दिल्ली पुलिस गैंगरेप कांड के बाद फिर सो गई थी। इस दौरान और बलात्कार की कई वारदातें दिल्ली में हुईं, लेकिन इस घटना ने एक बार फिर बेशर्म पुलिस प्रशासन पर सवाल खड़े कर दिए हैं। लगता है देश की पुलिस को जगाने के लिए धरने-प्रदर्शन करना जरूरी हो गया है। एक तरफ तो बच्ची के साथ बलात्कार होता है, तो दूसरी तरफ उसके मां-बाप को पुलिस दो हजार रुपये देकर मुह बंद कराना चाहती है और बेशर्मी की हद पार करते हुए उस बच्ची के मां-बाप से कहती है जाओ खुद ढूंढ लो जाकर। इस कांड से ठीक दो दिन पहले अलीगढ़ में भी एक पांच साल की बच्ची की बलात्कार के बाद हत्या कर दी जाती है और इंसाफ मांगने पर उसके घरवालों को सड़क पर दौड़ा -दौड़ाकर पुलिस लाठियों से पीटती है और ऊपर से कहती है कि बच्ची के साथ रेप होते किसने देखा है।

आखिर कब तक पुलिस अपनी जिम्मेदारी से बचती रहेगी। पुलिस पर तब तक लगाम नहीं कसी जा सकती, जब तक अपने काम के प्रति पुलिस नेतृत्व की जवाबदेही तय नहीं की जाएगी। पुलिस नेतृत्व से जवाब मांगना जरूरी है।  इन्हें सस्पेंड या बर्खास्त करने के बजाए इन पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए, ताकि इन्हें भी सजा का एहसास हो। आइए जरा गौर फरमाते हैं कि पुलिस क्या है? गृहरक्षा विभाग के अन्तर्गत आनेवाला विभाग होने से देश की कानून-व्यवस्था को संभालने का काम पुलिस के हाथ ही होता है। आपराधिक गतिविधियों को रोकने, अपराधियों को पकड़ने, अपराधियों के द्वारा किए जानेवाले अपराधों की खोजबीन करने, देश की आंतरिक सम्पत्ति की रक्षा करने और जो अपराधी हैं और उनका अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य जुटाना और राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा पुलिस का कार्य है। लेकिन अब इनका काम सिर्फ राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा तक ही सीमित  रह गया है। दरअसल, देश के हर कोने में बलात्कार की घटनाएं होती हैं। उन सभी घटनाओं को दबाने का काम भी पुलिस ही करती है। यहां 2008-09 की एक घटना का जिक्र जरूरी लगता है, जब मेरी पत्रकारिता की दाढ़ी-मूंछ निकल रही थी। जिला कानपुर देहात के थाना गजनेर से गुजर रहा था कि पुलिस थाने के बाहर खड़े एक गरीब किसान ने मुझे रोककर बताया कि उसकी सात साल की बेटी के साथ बलात्कार किया गया है और थानेदार साहब रिपोर्ट नहीं लिख रहे हैं। तब मैं एक टीवी चैनल को खबरें भेजा करता था। मेरे साथ कैमरामैन भी था, शायद उसी को देखकर उस किसान ने समझ लिया था कि हम पत्रकार हैं।

 अक्सर हम पत्रकारों को इंसान के दु:ख दर्द से पहले खबर दिखती है। जब हम थाने के अन्दर पहुंचे, तो थानेदार साहब मुझे नहीं जानते थे। मैंने उनसे कहा कि इस आदमी की बेटी के साथ बलात्कार हुआ है आप रिपोर्ट क्यों नहीं लिखते? थानेदार साहब ने रिपोर्ट लिखने से ये कहते हुए इनकार कर दिया कि उस लड़की के साथ बलात्कार नहीं हुआ है। हमारी और उनकी बात इतनी बढ़ गई कि थानेदार साहब ने हमारा कैमरा छीन लिया और हमसे बदसलूकी करने लगे। जैसे-तैसे निपटारा कराकर हम वहां से निकले और सीधे अस्पताल पहुंचे जहां पीड़ित भर्ती थी। डॉक्टर ने बताया कि लड़की के साथ बलात्कार नहीं हुआ है, लेकिन जब वहां मौजूद एक नर्स से चुपके से पूछा तो उसने बताया कि लड़की के साथ बहुत क्रूरता से बलात्कार किया गया है। मैंने खबर भी चलाई, लेकिन उसका कोई फायदा नहीं हुआ, क्यूंकि बलात्कार करने वाला स्थानीय विधायक का कोई खास बंदा था। चूंकि मामला एक छोटे से गांव से जुड़ा था, जहां न तो विरोध-प्रदर्शन करने वाले होते हैं और न ही मीडिया का वो रोल देखने को मिलता है, जो दिल्ली जैसे शहरों में मिलता है। गरीब की बेटी थी, जिसकी आवाज हुकूमत के कानों तक नहीं पहुंच सकी। लेकिन अगर पुलिस चाहती, तो उस गुनाहगार को सजा जरूर मिल सकती थी।

 आपको ये बात जानकर हैरानी होगी कि जिस थानेदार की मैं बात कर रहा हूं, वो कुंडा के डीएसपी हत्याकांड में भगोड़े साबित किए गए पुलिस अधिकारियों में से एक हैं और आज निलंबित होकर घर में मस्त हैं। समाज को बच्चियों की हिफाजत करनी होगी। दहेज की वजह से कन्या भ्रूण हत्या को बढ़ावा मिला है, अगर बच्चियों के साथ ऐसे ही अमानवीय बर्ताव होते रहे तो जो लोग कन्या भ्रूण हत्या से दूर हैं, वो भी इससे अछूते नहीं रहेंगे। लाख कानून बना दिए जाएं, लाख फास्ट ट्रैक कोर्ट बना दिए जाएं, लेकिन जब तक पुलिस अपने कर्तव्यों का निर्वहन सही से नहीं करेगी, तबतक किसी भी अपराधी को कोई भी कोर्ट सजा नहीं  दे सकता, क्यूंकि प्रथम दृष्टया पुलिस ही घटना के सारे सबूत इकठ्ठा करती है। जिस दिन पुलिस सुधर जाएगी, उसी दिन से शैतान इस समाज से गायब हो जाएंगे।
                                                           (लेखक द सी एक्सप्रेस से जुड़े हैं)

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