Saturday, 27 April 2013

हम सब सरबजीत के गुनाहगार


15 जनवरी 2013 सुबह के पौने आठ बजे कोट लखपत जेल लाहौर में बंद भारतीय कैदी चमेल सिंह जेल परिसर में मौजूद एक नल के नीचे बैठकर कपड़े धो रहे थे। वहां से गुजरने वाले दो हवलदारों और जेल सुप्रिटेंडेंट ने चमेल को वहां कपड़े धोने से मना किया। जेल सुप्रिटेंडेंट ने जातिसूचक टिप्पणी करते हुए उनसे कहा कि क्या ये जेल उनके बाप की है कि कहीं भी बैठकर कपड़े धोने लगोगे। इस बात पर चमेल सिंह के प्रतिक्रिया व्यक्त करने पर वो लोग भड़क गए और उन्हें तबतक पिटते रहे, जब तक चमेल की जान नहीं निकल गई। 48 वर्षीय चमेल जम्मू के अखनूर तहसील के रहने वाले थे और पाकिस्तान ने उनपर जासूसी का आरोप लगाया था। इसके बाद उन लोगों ने मजिस्टेÑट की गैर मौजूदगी में दूसरे भारतीय कैदियों मकबूल अली, मोहम्मद फरीद, कुलदीप कुमार, जावेद, शबू  और लखुराम नाथ से उस पेपर पर दस्तखत करवाए, जिसमे ये लिखा था कि चमेल की हार्ट अटैक से मौत हुई है। चमेल सिंह की लाश 12 दिनों तक जिन्नाह हॉस्पिटल के मुर्दाघर में पड़ी रही। ठीक तीन महीने बाद इसी कोट लखपत जेल में सरबजीत सिंह पर दो कैदी ईंट और तश्तरी से हमला करते हैं। सरबजीत को आईसीयू में वेंटीलेटर में रखा गया है और वो जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं।                                                                                                                                                                                                                                                                                सरबजीत पर हमला करने वाले कैदियों ने सुबह उनके साथ बैठकर रोज की तरह चाय पी थी। जब सरबजीत सिंह को हॉस्पिटल में दाखिल किया गया, तो उन्होंने पुलिस वर्दी की पैंट और एक फटी शर्ट पहन रखी थी। इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है की जेल में सरबजीत के पास पहनने को कपड़े भी नहीं थे। अफजल गुरु और कसाब की फांसी के बाद भारतीय खूफिया एजेंसी रॉ की सूचना को भी भारत सरकार ने तवज्जो नहीं दी, जिसमें सरबजीत पर हमले की आशंका जताई गई थी। अब भारत सरकार सरबजीत पर हुए हमले का विरोध पाकिस्तान सरकार से दर्ज करा रही है। विपक्ष भी केन्द्र सरकार को कमजोर बता रहा है। पूरे देश में गुस्सा पनपा हुआ है, मीडिया भी सरबजीत ही सरबजीत दिखा रहा है। लेकिन ये सब उस वक्त कहां थे, जब चमेल सिंह को जेल में पीट-पीटकर मार डाला गया। कहां था विपक्ष, कहां था मीडिया। जिस तरह से सरबजीत के लिए आज आवाज उठाई जा रही है, ठीक इसी तरह चमेल मामले में सरकार, विपक्ष, मीडिया और पूरा देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को बेनकाब करता, तो आज सरबजीत अस्पताल में न होते। क्या चमेल सिंह भारतीय नहीं थे? कोट लखपत वही जेल है, जहां भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई थी। जुल्फिकार अली भुट्टो को भी इसी जेल में फांसी दी गई थी। इस जेल की अगर वर्तमान हालत पर गौर करें तो पता चलता है कि 4000 लोगों के लिए बनाई गई इस जेल में 17000 कैदी किस तरह जिंदगी से जूझ रहे होंगे। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को जब कैद किया गया था, तब इस जेल  में उनके लिए एक स्पेशल कमरे को खासतौर पर तैयार किया गया था। आइए जरा गौर फरमाते हैं कि भारतीय कैदियों को किन-किन समस्यायों से जूझना पड़ता है पाकिस्तान की जेलों में। जब कैदियों के परिवारों द्वारा इनसे मिलने के लिए दौरा किया जाता है, तो इन्हें जेलों से स्थानांतरित कर दिया जाता है। दशकों से बंद कैदियों और उनके परिवारवालों में शारीरिक परिवर्तन आ जाता है, जिससे कि उनकी शिनाख्त में मुश्किल पैदा होती है। कैदियों की शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और चिकित्सा की स्थिति असामान्य है। कई कैदियों ने इस्लाम कुबूल कर लिया, अपने नाम बदल लिए, जिससे की उन्हें ढूंढने में परेशानी होती है। अपने देश, समाज और परिवारवालों की मदद न मिल पाने से कई कैदी अवसाद में चले गए है और पाकिस्तान के वफादार बनकर उनके लिए जासूसी कर रहे है। कई कैदी जेल में कत्ल कर दिए जाते हैं और अवसाद की वजह से बहुत से पागल हो गए है, जो अब अपने परिवारवालों को भी नहीं पहचानते है। जेल स्टाफ और खुफिया एजेंसियां उन्हें जानकारी देने के नाम पर पीटते हैं, पाकिस्तान की भाषा उर्दू होने की वजह से कैदियों को उनसे क्या लिखवाया जा रहा है, ये समझ में नही आता और वो किसी भी पेपर पर दस्तखत कर देते हैं, जिससे उनकी कानूनी लड़ाई कमजोर हो जाती है। खाने में सिर्फ नॉन वेज दिया जाता है, जिसको पाकिस्तानी हो या हिंदुस्तानी, किसी भी धर्म का हो, उसी खाने को खाना पड़ता है। पाकिस्तान का ह्यूमन राइट्स भी ये मानता है की पाकिस्तानी जेलों की स्थिति काफी भयानक है और वहां के कैदी दंगों का नेतृत्व करते हैं। पाकिस्तान का जेल प्रशासन त्योहारों के मौके पर कैदियों से मिलने आनेवाले हर शख्स से मोटी रकम वसूल करते हैं। खैर वजह जो भी हो, लेकिन सरबजीत की इस हालत के लिए पाकिस्तान के साथ-साथ भारत सरकार, विपक्ष, मीडिया और खुद हम सब जिम्मेदार हैं, जो क्रिया पर ही प्रतिक्रिया करना जानते हैं और इसके बाद सब भूल जाते हैं। हम सब को जागना होगा।    

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