Monday, 19 January 2015

आइने में देखकर अपना चेहरा

आइने में देखकर अपना चेहरा
सिहर गया बदन मेरा
अचानक कुछ बदल गया था
अजीब बदसूरती में ढल गया था
बरस रही थी उस पर फिटकार
जैसे किसी ने थूका हो बार-बार
नफरतें बालों से टपक रही थीं
लबों से गालियां लिपट रही थीं
बद्दुआएं रेंग रहीं थीं माथे पर
मनहूसियत का लग रहा था घर
जिल्लत आंखों से झांक रही थी
शरम तो खड़ी मुंह ताक रही थी
जबां हौले से रही थी दुत्कार
हर तरफ से लग रहा था मक्कार
अरमान के चेहरे से खून रिस रहा था
मोहब्बत का नामोनिशा नहीं दिख रहा था...









6 comments:

  1. कल 21/जनवरी/2015 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  2. बेहद उम्दा सोच के साथ लिखी गई कविता

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  3. शायद इसलिए ही मन में कोमलता और प्रेम होना चाहिए ... जो मन में हो बाहर जो दीखता है ...

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