Monday, 19 January 2015

चलो तुम ही बना लो अपनी जिंदगी,


चलो तुम ही बना लो अपनी जिंदगी,
शायद तुम्हें अपनी खोई हुई जिंदगी मिल जाए
वो हंसी जो तुमने कभी महसूस की थी,
 वो आजादी की उड़ान तुम्हारे जज्बातों में थी
गुम हो गई थी किसी ‘अरमान’ के बंधनों में बंधके,
कितना जालिम रहा होगा वो वक्त
हर पल महसूस की होगी घुटन तुमने,
जार-जार खून के आंसू रोती होगी,
गले लगा लेती होगी हंस के उस दरिंदे के सारे जुल्म,
 कैद कर रखा था पिंजरे में
कल्पना से परे थी क्रूरता उसकी,
 सोचने भर से सिहरन दौड़ जाती है
आज भी उस खौफनाक चेहरे की नजरें
गड़ी हुई महसूस करती होगी जिस्म में
वो खूनी पंजे उसके, जो दिन रात नोंचते थे
 चील कौवों की तरह बदन
तड़प जाती होगी दिन रात ख्वाबों का बलात्कार होते देखकर
शैतान था, करता भी क्या,
आदत हो गई थी हैवानियत की
रहम करता भी तो कैसे,
जहन में जहर जो भरा था......

No comments:

Post a Comment