Tuesday, 24 February 2015

वक़्त कैसे वो त्वारीख़ दोहरा रहा है

वक़्त कैसे वो त्वारीख़ दोहरा रहा है
कोई आ रहा है, कोई जा रहा है
ऐ मेरे मौला करम कर दे मुझपे
वो क्यों आ रहा है, वो क्यों जा रहा है

उसे मैंने चाहा जिसे तूने भेजा
इन सांसों में फिर न बसा कोई दूजा
फिर कोई आख़िर क्यों भा रहा है
 कोई आ रहा है, कोई जा रहा है

मेरे आंसुओं की क़दर भी न जानी
हर इक पल की ग़लती भी मैंने मानी
ज़ुल्मी को जन्नत फिर दिखला रहा है
कोई आ रहा है, कोई जा रहा है

सिवाय दर्द क यहां कुछ न मिलेगा
 कौन है जो मेरे ज़ख़्मों को सिलेगा
 अरमान फिर से सितम ढा रहा है
कोई आ रहा है, कोई जा रहा है

2 comments:

  1. ऐ मेरे मौला करम कर दे मुझपे
    वो क्यों आ रहा है, वो क्यों जा रहा है
    kash ! wah khatkhataa k ataa aur aap darwaaza hi na kholte, hahaha.
    pyari poem!! jite rahiye

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  2. lori...is mehfil mein log bedhadak chale aate hain aur puchte baad me hain .. ;)

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