Saturday, 19 July 2014

ख़ामोशी की चादर अक्सर ओढ़ लेती है रात

ख़ामोशी की चादर अक्सर ओढ़ लेती है रात 
कितनी तनहा है ये किससे करेगी बात

मुद्दतों से लगता है जैसे सोई नहीं
अंधेरों के सन्नाटे में कहीं खोई नहीं

मैं तो किसी की याद में जाग रहा हूँ
उजाले से अंधेरे की तरफ भाग रहा हूँ

तू किससे अपना मुंह छिपाती है
जो हर रोज नकाब ओढ़कर चली आती है

क्या तेरा भी कोई महबूब था
जिसे चाहा तूने खूब था

रात  ने कहा मैं मजबूर हूं
खूबसूरत उजालों से दूर हूं

मेरा काम नींद को ख्वाब से मिलाना है
मेरी वजह से परवाना शमा का दीवाना है

तन्हाई का मारा मेरा साथी है
मेरे वजूद से ही दिये में बाती है

यादें सजातीं हैं मेरे आंगन में महफ़िल
खेलते रहते हैं जुगनू  गोद में झिलमिल

जब बेदर्द दिन तुझे 'अरमान' सताता है
मेरे आगोश में आकर ही तू चैन पाता है...

8 comments:

  1. एक से बढ़कर एक ..... बेहतरीन पंक्तियाँ

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    1. रचना की प्रशंसा के लिए सादर आभार मोनिका जी,,,

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  2. बहुत ही खूबसूरत सब्द विन्यास। हर पंक्ति छू जाती है।

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  3. सादर शुक्रिया आपका,,,

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  4. ख़ामोशी की चादर अक्सर ओढ़ लेती है रात 
    कितनी तनहा है ये किससे करेगी बात...

    Beautiful ..loved it !

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  5. बहुत सुन्दर अहसास हैं आपके....

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